अरवल का इतिहास: प्राचीन मगध से आधुनिक जिले तक की पूरी कहानी

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अरवल का इतिहास

बिहार के दक्षिण-मध्य हिस्से में स्थित अरवल का इतिहास केवल वर्ष 2001 में बने एक नए जिले की कहानी नहीं है। यह क्षेत्र प्राचीन मगध की ऐतिहासिक भूमि, बौद्ध और जैन परंपराओं, कृषि संस्कृति, स्वतंत्रता आंदोलन और आधुनिक बिहार के सामाजिक इतिहास से जुड़ा रहा है।

आज अरवल बिहार के 38 जिलों में शामिल है और मगध प्रमंडल का हिस्सा है। लेकिन प्रशासनिक जिले के रूप में इसकी पहचान अपेक्षाकृत नई है। इससे पहले यह क्षेत्र लंबे समय तक जहानाबाद का हिस्सा रहा। बिहार सरकार के जिला पोर्टल के अनुसार अरवल जिला अगस्त 2001 में जहानाबाद से अलग होकर अस्तित्व में आया।

अरवल की पहचान सोन नदी, उपजाऊ कृषि भूमि, ग्रामीण संस्कृति और कई धार्मिक एवं ऐतिहासिक स्थलों से भी जुड़ी है। जिले का मुख्यालय अरवल शहर सोन नदी के किनारे स्थित है।

प्राचीन काल में अरवल और मगध का संबंध

अरवल के प्राचीन इतिहास को समझने के लिए पूरे मगध क्षेत्र के इतिहास को समझना जरूरी है। आज का अरवल जिस भौगोलिक क्षेत्र में स्थित है, वह ऐतिहासिक रूप से मगध जनपद की व्यापक सांस्कृतिक और राजनीतिक परिधि का हिस्सा रहा है।

भारत के प्राचीन इतिहास में मगध को 16 महाजनपदों में एक प्रमुख शक्ति माना जाता है। छठी शताब्दी ईसा पूर्व में मगध के राजनीतिक प्रभाव में तेजी से विस्तार हुआ। हर्यक वंश के राजा बिंबिसार के समय मगध की शक्ति मजबूत हुई और आगे चलकर यह क्षेत्र भारतीय इतिहास की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक शक्तियों में शामिल हुआ। अरवल के वर्तमान क्षेत्र की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि इसी मगध क्षेत्र से जुड़ी मानी जाती है।

इसी दौर में बौद्ध और जैन धर्म का भी मगध क्षेत्र में व्यापक प्रभाव बढ़ा। भगवान बुद्ध और भगवान महावीर ने मगध क्षेत्र में भ्रमण किया और अपने धार्मिक विचारों का प्रचार किया। इसलिए अरवल और आसपास का क्षेत्र उस व्यापक ऐतिहासिक भूभाग का हिस्सा रहा, जहां प्राचीन भारत की धार्मिक और दार्शनिक परंपराओं का विकास हुआ।

अरवल जिले के आसपास मिलने वाले प्राचीन अवशेष इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को और महत्वपूर्ण बनाते हैं। कुरथा क्षेत्र के घेज़न/घेजन से बुद्ध की पत्थर की प्रतिमाओं के मिलने का उल्लेख जिला जनगणना पुस्तिका में किया गया है। इन प्रतिमाओं को पटना संग्रहालय में सुरक्षित रखे जाने की जानकारी भी आधिकारिक ऐतिहासिक विवरण में मिलती है।

इससे यह स्पष्ट होता है कि अरवल की धरती केवल कृषि और ग्रामीण जीवन के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं थी, बल्कि आसपास के मगध क्षेत्र की धार्मिक-सांस्कृतिक गतिविधियों से भी इसका संबंध रहा।

मौर्य काल और बौद्ध प्रभाव की विरासत

मगध के इतिहास में मौर्य साम्राज्य का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। चंद्रगुप्त मौर्य और सम्राट अशोक के समय मगध की राजनीतिक शक्ति बहुत बड़े भूभाग तक फैल गई थी।

अरवल के आसपास के क्षेत्र में बौद्ध परंपरा से जुड़े अवशेषों का उल्लेख इस बात की ओर संकेत करता है कि यह भूभाग प्राचीन धार्मिक गतिविधियों के प्रभाव क्षेत्र में था। जिला जनगणना पुस्तिका में मकदुमपुर क्षेत्र की करंचौपर गुफा के संबंध में भी बौद्ध प्रचारकों से जुड़ी परंपरा का उल्लेख मिलता है। हालांकि यह स्थान वर्तमान अरवल जिले के बाहर है, लेकिन इससे यह समझने में मदद मिलती है कि पुराने जहानाबाद-मगध क्षेत्र में बौद्ध गतिविधियों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि कितनी व्यापक थी।

इसलिए अरवल के इतिहास को केवल आधुनिक प्रशासनिक सीमाओं में देखना सही नहीं होगा। आज जिन क्षेत्रों को अलग-अलग जिले के रूप में देखा जाता है, वे प्राचीन काल में एक ही बड़े सांस्कृतिक और राजनीतिक क्षेत्र का हिस्सा रहे थे।

मध्यकाल में अरवल क्षेत्र की पहचान

मध्यकालीन इतिहास के बारे में अरवल के लिए उपलब्ध स्थानीय स्रोत प्राचीन मगध या आधुनिक जिला गठन की तुलना में कम विस्तृत हैं। फिर भी क्षेत्र में मौजूद धार्मिक स्थलों और पुराने बस्तियों के नाम से इसकी सामाजिक-सांस्कृतिक निरंतरता दिखाई देती है।

अरवल जिले में आज मखदूम शाह का मजार, मधुश्रवा आश्रम, गौतम बुद्ध मंदिर, फखरपुर मंदिर और अन्य धार्मिक स्थल प्रमुख पहचान रखते हैं। जिला प्रशासन इन स्थानों को जिले के महत्वपूर्ण पर्यटन स्थलों में शामिल करता है।

मखदूम शाह का मजार इस क्षेत्र की सूफी परंपरा से जुड़ी धार्मिक विरासत को दर्शाता है। वहीं दूसरी ओर मधुश्रवा और गौतम बुद्ध मंदिर जैसे स्थल अरवल की बहुधार्मिक एवं बहुपरंपरागत सांस्कृतिक पहचान को सामने रखते हैं।

यही विविधता अरवल के सामाजिक इतिहास की खास विशेषता है। यहां की पहचान किसी एक धार्मिक या सांस्कृतिक परंपरा तक सीमित नहीं रही, बल्कि अलग-अलग परंपराओं ने समय के साथ क्षेत्र की संस्कृति को प्रभावित किया।

अंग्रेजी शासन और स्वतंत्रता आंदोलन में अरवल क्षेत्र

ब्रिटिश शासन के दौरान आज का अरवल अलग जिला नहीं था। यह क्षेत्र अलग-अलग प्रशासनिक व्यवस्थाओं के माध्यम से बड़े जिलों का हिस्सा रहा और बाद में जहानाबाद के प्रशासनिक ढांचे में आया।

अरवल क्षेत्र के ग्रामीण समाज में किसान और कृषि मजदूर बड़ी संख्या में रहे हैं। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान किसानों और ग्रामीणों की राजनीतिक सक्रियता ने इस क्षेत्र के सामाजिक जीवन को प्रभावित किया।

भारत सरकार के आजादी का अमृत महोत्सव डिजिटल जिला रिपॉजिटरी में अरवल क्षेत्र से जुड़े कई स्वतंत्रता सेनानियों का उल्लेख मिलता है। इनमें सरयू सिंह, करू सिंह और श्यामबिहारी लाल जैसे नाम शामिल हैं।

सरयू सिंह का संबंध वर्तमान अरवल जिले के कुरथा क्षेत्र से बताया गया है। वे किसान आंदोलन से जुड़े और 1939 में मजहियावां किसान सत्याग्रह में भाग लिया। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भी उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। कुरथा में पुलिस थाने पर तिरंगा फहराने की कोशिश और उसके बाद हुई पुलिस कार्रवाई का उल्लेख उनके जीवनवृत्त में मिलता है। बाद में उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेजा गया।

करू सिंह भी मजहियावां क्षेत्र से जुड़े स्वतंत्रता सेनानी थे। वे किसान सभा और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े और 1931 के सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान जेल गए। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में कुरथा थाना कांड से उनका नाम जुड़ता है।

श्यामबिहारी लाल के बारे में उपलब्ध सरकारी डिजिटल रिकॉर्ड में बताया गया है कि उन्होंने 1942 में कुरथा क्षेत्र के युवाओं को संगठित किया और पुलिस थाने पर तिरंगा फहराने के प्रयास में गंभीर रूप से घायल हुए। कुरथा बाजार में उनकी प्रतिमा भी स्थापित है।

इस तरह स्वतंत्रता आंदोलन में अरवल क्षेत्र के ग्रामीण समाज की भागीदारी को स्थानीय इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा सकता है।

1947 के बाद अरवल क्षेत्र में प्रशासनिक बदलाव

भारत की स्वतंत्रता के बाद भी अरवल एक स्वतंत्र जिला नहीं था। प्रशासनिक दृष्टि से यह क्षेत्र बड़े जिलों का हिस्सा बना रहा।

बिहार के प्रशासनिक इतिहास में लगातार जिले बनाए और पुनर्गठित किए गए। गया के बड़े क्षेत्र से समय के साथ औरंगाबाद, नवादा और जहानाबाद जैसे जिले अलग हुए। 1 अगस्त 1986 को जहानाबाद जिला बनाया गया, जिसके बाद आज के अरवल क्षेत्र का बड़ा हिस्सा जहानाबाद जिले में शामिल रहा।

यही प्रशासनिक क्रम आगे चलकर अरवल जिले के गठन की आधारभूमि बना।

1986 की अरवल पुलिस फायरिंग: इतिहास का दर्दनाक अध्याय

अरवल के आधुनिक इतिहास में 19 अप्रैल 1986 की घटना का विशेष स्थान है। उस समय अरवल अलग जिला नहीं था और यह जहानाबाद के अंतर्गत आने वाला क्षेत्र था।

सुप्रीम कोर्ट के 1986 के मामले के रिकॉर्ड के अनुसार उस दिन अरवल में गरीब किसानों और भूमिहीन लोगों की एक सभा के दौरान पुलिस फायरिंग हुई। अदालत के रिकॉर्ड में कम से कम 21 लोगों की मौत और कई लोगों के घायल होने का उल्लेख है। मामले की पृष्ठभूमि में भूमि विवाद और सभा से संबंधित परिस्थितियों का भी उल्लेख किया गया था।

घटना के बाद जांच और मुआवजे को लेकर कानूनी प्रक्रिया चली। सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 1986 में मामले की सुनवाई करते हुए मृतकों के लिए मुआवजे और घायलों के लिए मुआवजे के संबंध में निर्देश दिए। अदालत के रिकॉर्ड में यह भी दर्ज है कि बिहार सरकार ने घटना की न्यायिक जांच कराई थी।

इस घटना को लेकर अलग-अलग स्रोतों में मृतकों की संख्या अलग-अलग बताई गई है। इसलिए इतिहास लिखते समय सरकारी/न्यायिक रिकॉर्ड में दर्ज कम से कम 21 मौतों का उल्लेख करना अधिक सावधानीपूर्ण है।

अरवल फायरिंग ने इस क्षेत्र के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास पर गहरा प्रभाव डाला। भूमि, किसान, मजदूर और ग्रामीण सामाजिक संबंधों से जुड़े संघर्षों की चर्चा में यह घटना लंबे समय तक महत्वपूर्ण बनी रही।

1990 के दशक का सामाजिक संघर्ष और अरवल

1980 और 1990 के दशक में मध्य बिहार के कई जिलों में भूमि, सामाजिक असमानता, किसान संगठनों, भूमिहीन मजदूरों और निजी सेनाओं से जुड़े संघर्ष देखने को मिले।

आज अरवल जिले में आने वाले कुछ इलाकों का इतिहास भी इस दौर की घटनाओं से जुड़ा रहा। उस समय ये इलाके अविभाजित जहानाबाद जिले का हिस्सा थे।

लक्ष्मणपुर बाथे और शंकरबिगहा जैसी घटनाएं इसी व्यापक सामाजिक संघर्ष के इतिहास का हिस्सा हैं। इन घटनाओं को समझते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि उस समय वर्तमान अरवल जिला प्रशासनिक रूप से अस्तित्व में नहीं था।

शंकरबिगहा में 25 जनवरी 1999 को हुई हिंसक घटना में 23 लोगों की मौत का उल्लेख समकालीन और बाद के न्यायिक रिपोर्टिंग स्रोतों में मिलता है। यह गांव उस समय अविभाजित जहानाबाद जिले में था और बाद में अरवल जिले का हिस्सा बना।

लक्ष्मणपुर बाथे की घटना भी दिसंबर 1997 की है। बाद की रिपोर्टों में इस घटना को वर्तमान अरवल क्षेत्र से जोड़ा जाता है। इन घटनाओं ने मध्य बिहार के सामाजिक इतिहास पर लंबे समय तक प्रभाव डाला।

इन घटनाओं को किसी एक पक्ष की दृष्टि से देखने के बजाय उस दौर के भूमि संबंधों, सामाजिक तनाव और ग्रामीण हिंसा के व्यापक संदर्भ में समझना जरूरी है।

2001 में बना अरवल जिला

अरवल के आधुनिक इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक मोड़ 20 अगस्त 2001 है।

बिहार सरकार की अधिसूचना के आधार पर पुराने जहानाबाद जिले से अरवल अनुमंडल को अलग करके नया अरवल जिला बनाया गया। भारत की जनगणना की जिला पुस्तिका भी 20 अगस्त 2001 की अधिसूचना को अरवल जिला बनने की आधार तारीख के रूप में दर्ज करती है।

जिला बनाने का उद्देश्य प्रशासन को स्थानीय स्तर पर अधिक प्रभावी बनाना और क्षेत्र की प्रशासनिक निगरानी को आसान बनाना था।

नए जिले का मुख्यालय अरवल शहर बनाया गया। शुरुआत से ही जिले में एक अनुमंडल और पांच प्रखंडों की प्रशासनिक संरचना रही।

वर्तमान में ये पांच प्रखंड हैं—

  • अरवल
  • कलेर
  • करपी
  • कुर्था
  • सोनभद्र-बंशी-सूर्यपुर

जिला प्रशासन के अनुसार अरवल में एक अनुमंडल और पांच प्रखंड हैं।

सोन नदी ने अरवल के इतिहास और जीवन को कैसे प्रभावित किया?

अरवल की भौगोलिक पहचान में सोन नदी का बहुत बड़ा योगदान है। अरवल शहर सोन नदी के किनारे स्थित है और सोन नदी इस क्षेत्र की प्राकृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

सोन नदी आगे चलकर गंगा नदी तंत्र का हिस्सा बनती है। नदी के कारण क्षेत्र में कृषि और जल संसाधनों का ऐतिहासिक महत्व रहा है।

अरवल की भूमि मुख्य रूप से मैदानी और जलोढ़ प्रकृति की है। केंद्रीय भूजल बोर्ड के अनुसार जिले का बड़ा हिस्सा क्वाटरनरी युग के जलोढ़ निक्षेपों से बना है, जिनमें रेत, गाद और चिकनी मिट्टी शामिल है।

यही प्राकृतिक परिस्थितियां कृषि को यहां की अर्थव्यवस्था का आधार बनाने में मदद करती हैं।

अरवल की अर्थव्यवस्था और कृषि परंपरा

अरवल की अर्थव्यवस्था लंबे समय से कृषि पर आधारित रही है। जिला प्रशासन के अनुसार धान, गेहूं और मक्का यहां की प्रमुख फसलें हैं।

जिले में बड़े औद्योगिक केंद्रों की तुलना में खेती और उससे जुड़े ग्रामीण रोजगार का महत्व अधिक रहा है। सिंचाई की उपलब्धता के बावजूद बिजली और आधारभूत ढांचे से जुड़ी चुनौतियों का उल्लेख जिला प्रशासन के आर्थिक विवरण में किया गया है।

इसलिए अरवल का इतिहास केवल राजनीतिक घटनाओं से नहीं, बल्कि खेत, किसान, नदी और ग्रामीण समाज के इतिहास से भी जुड़ा है।

अरवल के प्रमुख ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल

अरवल जिले में कई ऐसे स्थान हैं जो इसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करते हैं।

1. मधुश्रवा आश्रम

मधुश्रवा अरवल के प्रमुख धार्मिक और पर्यटन स्थलों में शामिल है। जिला प्रशासन इसे जिले के प्रमुख पर्यटन स्थलों की सूची में रखता है।

2. गौतम बुद्ध मंदिर

गौतम बुद्ध से जुड़ा यह स्थल अरवल की बौद्ध विरासत की पहचान को सामने लाता है। जिले के पर्यटन विवरण में इसे प्रमुख स्थल के रूप में शामिल किया गया है।

3. मखदूम शाह का मजार

यह स्थल अरवल की सूफी और मुस्लिम धार्मिक विरासत से जुड़ा महत्वपूर्ण स्थान है। जिला प्रशासन के पर्यटन पोर्टल पर इसका उल्लेख प्रमुख स्थलों में किया गया है।

4. फखरपुर मंदिर

फखरपुर पंचायत में स्थित यह मंदिर स्थानीय धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है।

5. अगनूर जल विद्युत परियोजना

कलेर क्षेत्र में स्थित अगनूर जल विद्युत परियोजना जिले के महत्वपूर्ण स्थलों में शामिल है और अरवल की आधुनिक विकास यात्रा का भी हिस्सा है।

अरवल की प्रशासनिक पहचान आज कैसी है?

2011 की जनगणना के अनुसार अरवल जिले की आबादी 7,00,843 थी। जिला प्रशासन के वर्तमान पोर्टल पर जिले का क्षेत्रफल करीब 634.23 वर्ग किलोमीटर, 5 प्रखंड और 65 ग्राम पंचायतों का उल्लेख है।

जिला प्रशासन के अनुसार अरवल में एक अनुमंडल है। जिले में अरवल, कलेर, करपी, कुर्था और सोनभद्र-बंशी-सूर्यपुर प्रखंड शामिल हैं।

अरवल की प्रशासनिक पहचान बनने के बाद स्थानीय स्तर पर सरकारी कार्यालयों, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पंचायत और अन्य प्रशासनिक सुविधाओं के विस्तार की प्रक्रिया आगे बढ़ी।

अरवल के इतिहास की सबसे बड़ी खासियत क्या है?

अरवल का इतिहास कई अलग-अलग कालखंडों को जोड़ता है।

एक ओर इसकी जड़ें प्राचीन मगध की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से जुड़ी हैं। दूसरी ओर बौद्ध और जैन परंपराओं का प्रभाव इस पूरे क्षेत्र के सांस्कृतिक इतिहास में दिखाई देता है।

मध्यकाल में धार्मिक और सूफी परंपराओं से जुड़े स्थल विकसित हुए। ब्रिटिश काल और स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ग्रामीण समाज तथा किसान आंदोलनों की भूमिका सामने आई।

स्वतंत्रता के बाद जहानाबाद जिले का गठन हुआ और अंततः 2001 में अरवल को अलग जिला बनाया गया।

आधुनिक इतिहास में 1986 की अरवल पुलिस फायरिंग और 1990 के दशक की ग्रामीण हिंसा जैसी घटनाएं भी इस क्षेत्र के सामाजिक इतिहास का हिस्सा हैं। इन घटनाओं को समझना अरवल के आधुनिक सामाजिक बदलावों को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

अरवल जिले का इतिहास: एक नजर में

काल/वर्षमहत्वपूर्ण घटना
प्राचीन कालक्षेत्र का संबंध व्यापक मगध क्षेत्र से
छठी शताब्दी ईसा पूर्वमगध के राजनीतिक और सांस्कृतिक विस्तार का दौर
मौर्य कालमगध और बौद्ध परंपरा का व्यापक प्रभाव
मध्यकालविभिन्न धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराओं का विकास
ब्रिटिश कालक्षेत्र बड़े प्रशासनिक जिलों का हिस्सा रहा
1930–1940 का दशकस्वतंत्रता और किसान आंदोलनों में स्थानीय भागीदारी
1942कुरथा क्षेत्र में भारत छोड़ो आंदोलन से जुड़ी घटनाएं
1986अरवल पुलिस फायरिंग
1990 का दशकमध्य बिहार के ग्रामीण सामाजिक संघर्षों का प्रभाव
20 अगस्त 2001जहानाबाद से अलग होकर अरवल जिला बना
वर्तमानमगध प्रमंडल का स्वतंत्र जिला

अरवल का इतिहास क्यों पढ़ना चाहिए?

अरवल का इतिहास बिहार के उस हिस्से की कहानी है जिसे अक्सर केवल ग्रामीण या कृषि क्षेत्र के रूप में देखा जाता है। लेकिन इसके पीछे प्राचीन मगध की विरासत, बौद्ध संस्कृति, स्वतंत्रता आंदोलन, किसान आंदोलनों और आधुनिक प्रशासनिक बदलावों की लंबी कहानी मौजूद है।

यहां की सोन नदी ने भौगोलिक पहचान बनाई, कृषि ने अर्थव्यवस्था को आधार दिया और सामाजिक आंदोलनों ने आधुनिक इतिहास को प्रभावित किया।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आज का अरवल एक अपेक्षाकृत नया जिला जरूर है, लेकिन इसकी ऐतिहासिक जड़ें काफी पुरानी हैं। जिला 2001 में बना, लेकिन अरवल क्षेत्र की कहानी उससे हजारों वर्ष पहले के मगध इतिहास तक जाती है।

अरवल का इतिहास: FAQs

अरवल जिला कब बना था?

अरवल जिला 20 अगस्त 2001 को पुराने जहानाबाद जिले से अलग करके बनाया गया था।

अरवल पहले किस जिले का हिस्सा था?

अरवल जिला बनने से पहले यह क्षेत्र जहानाबाद जिले का हिस्सा था।

अरवल किस प्रमंडल में आता है?

अरवल मगध प्रमंडल का हिस्सा है।

अरवल की प्रमुख नदी कौन सी है?

सोन नदी अरवल की प्रमुख भौगोलिक पहचान है। अरवल शहर सोन नदी के किनारे स्थित है।

अरवल में कितने प्रखंड हैं?

अरवल जिले में पांच प्रखंड हैं—अरवल, कलेर, करपी, कुर्था और सोनभद्र-बंशी-सूर्यपुर।

अरवल की प्रमुख फसलें कौन सी हैं?

धान, गेहूं और मक्का अरवल की प्रमुख फसलों में शामिल हैं।

अरवल के प्रमुख ऐतिहासिक स्थल कौन-कौन से हैं?

मधुश्रवा आश्रम, गौतम बुद्ध मंदिर, मखदूम शाह का मजार और फखरपुर मंदिर जिले के प्रमुख धार्मिक एवं पर्यटन स्थलों में शामिल हैं।

अरवल का संबंध प्राचीन मगध से कैसे है?

भारत की जनगणना की जिला पुस्तिका में अरवल क्षेत्र को पुराने जहानाबाद क्षेत्र के माध्यम से प्राचीन मगध की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से जोड़ा गया है।

1986 में अरवल में क्या हुआ था?

19 अप्रैल 1986 को अरवल में पुलिस फायरिंग की घटना हुई थी। सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार कम से कम 21 लोगों की मौत हुई और कई लोग घायल हुए। बाद में मुआवजे और जांच से संबंधित न्यायिक प्रक्रिया हुई।

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