जितिया व्रत 2026: जानिए कथा, पूजा विधि, नियम और पारण का सही समय
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👉 WhatsApp से जुड़ेंभारत के कई राज्यों में मनाया जाने वाला जितिया व्रत मातृत्व, संतान के प्रति प्रेम और परिवार की मंगलकामना से जुड़ा प्रमुख लोकपर्व है। जितिया व्रत को जीवित्पुत्रिका, जिउतिया या जिउतिया व्रत भी कहा जाता है। बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में इसका विशेष महत्व है। इस व्रत में माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और सुरक्षा की कामना करती हैं। परंपरा के अनुसार मुख्य व्रत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है।
जितिया व्रत 2026 में कब है?
साल 2026 में जीवित्पुत्रिका यानी जितिया व्रत 3 अक्टूबर, शनिवार को रखा जाएगा। इससे पहले 2 अक्टूबर को नहाय-खाय की परंपरा होगी और 4 अक्टूबर को पारण किया जाएगा।
पंचांग के अनुसार 2026 में आश्विन कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 3 अक्टूबर की सुबह करीब 7:59 बजे शुरू होकर 4 अक्टूबर की सुबह 5:51 बजे तक रहेगी। उदया तिथि और प्रदोष से जुड़े निर्णय के आधार पर 3 अक्टूबर को मुख्य व्रत रखा जा रहा है।
बिहार में प्रकाशित पंचांग आधारित रिपोर्टों के अनुसार 4 अक्टूबर को सुबह 7:30 बजे के बाद पारण की परंपरा बताई गई है। अलग-अलग स्थानों के पंचांग में कुछ मिनट का अंतर हो सकता है, इसलिए स्थानीय पंचांग के अनुसार समय देखना उचित रहेगा।
जितिया 2026 का पूरा कार्यक्रम
| दिन | तारीख | क्या होगा |
|---|---|---|
| पहला दिन | 2 अक्टूबर 2026 | नहाय-खाय |
| दूसरा दिन | 3 अक्टूबर 2026 | निर्जला व्रत, जीमूतवाहन पूजा और कथा |
| तीसरा दिन | 4 अक्टूबर 2026 | पारण |
इस तरह जितिया का पूरा अनुष्ठान तीन दिनों की परंपरा में पूरा होता है।
जितिया व्रत क्यों रखा जाता है?
जितिया व्रत का मुख्य उद्देश्य संतान के मंगल की कामना माना जाता है। धार्मिक और लोकमान्यताओं में कहा जाता है कि माताएं इस कठिन व्रत के माध्यम से अपनी संतान की दीर्घायु, अच्छे स्वास्थ्य और सुरक्षित जीवन की प्रार्थना करती हैं।
पुरानी परंपराओं में यह व्रत विशेष रूप से पुत्र की लंबी आयु से जोड़ा जाता था। समय के साथ कई परिवारों में इसका भाव व्यापक हुआ है और माताएं बेटे-बेटी दोनों की सुख-समृद्धि तथा कुशलता के लिए व्रत रखती हैं।
इस पर्व का सबसे भावुक पक्ष मां और संतान के बीच का रिश्ता है। लगभग पूरे दिन-रात निर्जला उपवास, पूजा, कथा और संतान के लिए प्रार्थना इसे दूसरे सामान्य व्रतों से अलग बनाती है।
जितिया व्रत का इतिहास और धार्मिक मान्यता
जितिया की परंपरा का केंद्र राजा जीमूतवाहन की कथा है। व्रत कथा में जीमूतवाहन को त्याग, करुणा और परोपकार का प्रतीक माना जाता है।
लोकप्रचलित कथा के अनुसार जीमूतवाहन एक धर्मपरायण और दयालु राजकुमार थे। एक दिन उन्होंने एक वृद्धा को अपने पुत्र के लिए विलाप करते देखा। पूछने पर पता चला कि नागवंश से जुड़ी एक पुरानी व्यवस्था के कारण एक नाग युवक को गरुड़ के सामने बलि के लिए जाना था।
उस युवक का नाम शंखचूड़ बताया जाता है। उसकी मां अपने पुत्र के जीवन को लेकर बेहद दुखी थी।
जीमूतवाहन ने उसकी पीड़ा देखी और युवक की जगह स्वयं बलि के लिए प्रस्तुत होने का निर्णय लिया। वह उस स्थान पर पहुंच गए जहां गरुड़ नाग को अपना आहार बनाने वाले थे।
गरुड़ ने जब जीमूतवाहन को देखा तो उन्हें नाग समझकर उठा लिया। कथा के अनुसार जीमूतवाहन ने अपनी पहचान और पूरी घटना गरुड़ को बताई।
जीमूतवाहन के त्याग और परोपकार से गरुड़ प्रभावित हुए। इसके बाद उन्होंने जीमूतवाहन को जीवनदान दिया और नागों को लेकर अपनी पुरानी व्यवस्था समाप्त करने का वचन दिया। इसी कथा को जितिया व्रत की धार्मिक परंपरा से जोड़ा जाता है।
इस कथा का मूल संदेश केवल संतान की रक्षा तक सीमित नहीं है। इसमें त्याग, दया, परोपकार और दूसरे के जीवन की रक्षा को महत्वपूर्ण बताया गया है।
नहाय-खाय क्या होता है?
जितिया पर्व की शुरुआत नहाय-खाय से होती है। 2026 में यह दिन 2 अक्टूबर को है।
इस दिन व्रती महिलाएं स्नान करके शुद्धता के साथ सात्विक भोजन ग्रहण करती हैं। क्षेत्र के अनुसार नहाय-खाय के भोजन में अलग-अलग पारंपरिक चीजें शामिल होती हैं।
बिहार के कई इलाकों में मड़ुआ की रोटी, नोनी का साग, झिंगनी/सतपुतिया की सब्जी और अन्य स्थानीय खाद्य पदार्थों की परंपरा मिलती है।
नहाय-खाय का उद्देश्य अगले दिन के कठिन उपवास के लिए शरीर और मन को तैयार करना भी माना जाता है।
ओठगन या सरगही की परंपरा क्या है?
जितिया में ओठगन या सरगही की परंपरा भी कई क्षेत्रों में प्रचलित है। इसमें व्रती महिलाएं व्रत शुरू होने से पहले निर्धारित समय पर भोजन या पारंपरिक खाद्य पदार्थ ग्रहण करती हैं।
स्थानीय परंपरा के अनुसार इसमें दही-चूड़ा, मिठाई, फल या अन्य पारंपरिक भोजन शामिल हो सकता है। 2026 के कुछ स्थानीय विवरणों में ब्रह्म मुहूर्त में ओठगन की परंपरा बताई गई है।
इसके बाद निर्जला व्रत शुरू हो जाता है। हालांकि ओठगन का समय और भोजन क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार बदल सकता है।
जितिया का मुख्य निर्जला व्रत
3 अक्टूबर 2026 को मुख्य जितिया व्रत रखा जाएगा। परंपरागत रूप से यह निर्जला व्रत होता है, यानी व्रती अन्न और जल का सेवन नहीं करती हैं।
दिनभर उपवास के बाद शाम को भगवान जीमूतवाहन की पूजा की जाती है। इसके साथ जितिया व्रत की कथा सुनने की परंपरा है।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि निर्जला व्रत कठिन होता है। किसी व्यक्ति को स्वास्थ्य संबंधी समस्या हो, गर्भावस्था हो या चिकित्सकीय कारणों से लंबे समय तक बिना पानी के रहना उचित न हो, तो धार्मिक परंपरा निभाने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेना समझदारी है।
जितिया में जीमूतवाहन की पूजा क्यों होती है?
जितिया पर्व में राजा जीमूतवाहन को मुख्य रूप से पूजा जाता है। उनकी कथा में उन्होंने अपने जीवन की चिंता किए बिना दूसरे के जीवन की रक्षा की थी।
इसी कारण उन्हें त्याग और परोपकार का प्रतीक माना जाता है। व्रती महिलाएं पूजा के दौरान संतान की लंबी आयु, स्वास्थ्य, सुरक्षा और सुखी जीवन की प्रार्थना करती हैं।
कई क्षेत्रों में जीमूतवाहन की प्रतिमा कुश से बनाकर या उनके प्रतीक रूप में पूजा की जाती है। कलश, जल, अक्षत, फूल, धूप और दीप आदि से पूजा करने की परंपरा भी मिलती है।
चील और सियारिन की पूजा का क्या महत्व है?
जितिया की लोकपरंपरा में चील्ह यानी मादा चील और सियारिन की कथा भी महत्वपूर्ण है।
कई क्षेत्रों में मिट्टी या गाय के गोबर से चील और सियारिन की प्रतीक आकृतियां बनाई जाती हैं। इन्हें सिंदूर लगाया जाता है और पूजा सामग्री अर्पित की जाती है।
इसके बाद चील्ह-सियारिन से जुड़ी लोककथा या जितिया व्रत कथा सुनी जाती है। यह परंपरा मुख्य रूप से लोकविश्वास और क्षेत्रीय रीति-रिवाजों का हिस्सा है।
यही वजह है कि जितिया की पूजा केवल एक देवी-देवता की पूजा तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इसमें स्थानीय लोकसंस्कृति की भी गहरी छाप दिखाई देती है।
जितिया पूजा की सामग्री क्या-क्या चाहिए?
जितिया की पूजा के लिए सामग्री क्षेत्र के अनुसार कुछ अलग हो सकती है। सामान्य रूप से इन चीजों की जरूरत पड़ सकती है:
- भगवान जीमूतवाहन की प्रतिमा या प्रतीक
- कुश
- कलश और जल
- अक्षत यानी साबुत चावल
- रोली, चंदन और सिंदूर
- धूप और दीप
- फूल और माला
- फल और मिठाई
- पान और सुपारी
- लौंग और इलायची
- दूर्वा
- मौली या जिउतिया धागा
- बांस की डलिया
- मिट्टी या गोबर
- सरसों का तेल
- खली
- भिगोया हुआ चना
- ठेकुआ या क्षेत्रीय प्रसाद
- दही-चूड़ा
- कथा की पुस्तक
कई परंपराओं में चील-सियारिन की आकृति बनाने के लिए मिट्टी और गोबर तथा जीमूतवाहन के लिए कुश का उपयोग किया जाता है।
जितिया पूजा विधि: घर पर कैसे करें?
सबसे पहले व्रती स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद पूजा स्थल को साफ करके वहां आवश्यक सामग्री व्यवस्थित करें।
क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार आंगन में छोटा प्रतीकात्मक पोखर या पूजा स्थल बनाया जा सकता है। कुछ जगह पाकड़ की डाल रखने की भी परंपरा है।
इसके बाद जल से भरा कलश स्थापित करें और उसके पास या ऊपर कुश से बने जीमूतवाहन के प्रतीक को रखें।
अब जीमूतवाहन को फूल, अक्षत, चंदन, धूप और दीप अर्पित करें। इसके बाद चील और सियारिन की प्रतीक आकृतियों को सिंदूर आदि अर्पित किया जाता है।
पूजा के दौरान संतान की दीर्घायु और स्वास्थ्य की कामना करें। इसके बाद जीमूतवाहन की कथा और चील-सियारिन की लोककथा सुनें।
अंत में आरती और प्रार्थना करें। अलग-अलग परिवारों में पूजा की विधि और सामग्री में अंतर हो सकता है, इसलिए अपनी पारिवारिक परंपरा का भी पालन किया जा सकता है।
डलिया भरने की परंपरा क्या है?
जितिया में डलिया भरने की परंपरा भी खास है। बांस की डलिया में फल, प्रसाद, चना, ठेकुआ और अन्य पूजन सामग्री रखी जाती है।
इसे संतान के मंगल और परिवार की समृद्धि से जोड़कर देखा जाता है। कई क्षेत्रों में महिलाएं सामूहिक रूप से डलिया भरने की रस्म पूरी करती हैं।
डलिया में रखी जाने वाली सामग्री हर इलाके में एक जैसी नहीं होती। स्थानीय परंपरा के अनुसार इसमें बदलाव दिखाई देता है।
खरजितिया क्या होता है?
जितिया के मुख्य व्रत वाले दिन को कई क्षेत्रों में खरजितिया भी कहा जाता है।
यह नाम विशेष रूप से बिहार और आसपास की लोकपरंपराओं में सुनने को मिलता है। कुछ पंचांग और स्थानीय धार्मिक परंपराओं में पहले दिन नहाय-खाय, दूसरे दिन खरजितिया और तीसरे दिन पारण की व्यवस्था बताई जाती है।
इसलिए जितिया, जिउतिया, जीवित्पुत्रिका और खरजितिया जैसे नाम अलग-अलग क्षेत्रों में एक ही पर्व की स्थानीय परंपराओं से जुड़े मिल सकते हैं।
जितिया व्रत में क्या खाना चाहिए?
नहाय-खाय और पारण के भोजन में स्थानीय खान-पान की बड़ी भूमिका होती है।
बिहार के कई क्षेत्रों में मड़ुआ की रोटी, नोनी का साग, झिंगनी/सतपुतिया की सब्जी जैसे पारंपरिक खाद्य पदार्थ बनाए जाते हैं। पारण के बाद कई घरों में विशेष पारंपरिक भोजन बनाने की परंपरा है।
बिहारशरीफ की 2026 की स्थानीय रिपोर्टों में पारण के बाद अकुड़ी भात बनाने की परंपरा का उल्लेख भी किया गया है।
हालांकि भोजन की सूची पूरे बिहार में एक जैसी नहीं होती। मिथिला, मगध, भोजपुर, सीमांचल और झारखंड के क्षेत्रों में स्थानीय खान-पान के अनुसार अंतर मिल सकता है।
जितिया व्रत के प्रमुख नियम
जितिया को कठिन व्रतों में गिना जाता है। इसके प्रमुख पारंपरिक नियम इस प्रकार समझे जा सकते हैं:
- नहाय-खाय से व्रत की शुरुआत करें।
- व्रत से पहले सात्विक भोजन करें।
- ओठगन या सरगही की स्थानीय परंपरा का पालन करें।
- मुख्य दिन निर्जला उपवास रखें।
- भगवान जीमूतवाहन की पूजा करें।
- व्रत कथा सुनें या पढ़ें।
- चील-सियारिन की लोकपरंपरा का पालन करें।
- संतान की मंगलकामना करें।
- पारण निर्धारित समय और स्थानीय पंचांग के अनुसार करें।
- पारण के बाद सात्विक भोजन से व्रत समाप्त करें।
धार्मिक आस्था के साथ स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी जरूरी है। निर्जला उपवास हर व्यक्ति के लिए समान रूप से उपयुक्त नहीं होता।
जितिया और छठ पूजा में क्या अंतर है?
जितिया और छठ दोनों ही बिहार की प्रसिद्ध धार्मिक परंपराएं हैं, लेकिन दोनों का उद्देश्य और पूजा-पद्धति अलग है।
जितिया मुख्य रूप से संतान के मंगल, स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना से जुड़ा व्रत है और इसमें जीमूतवाहन की पूजा तथा जितिया कथा की परंपरा प्रमुख है।
वहीं छठ पूजा में सूर्य देव और छठी मैया की उपासना मुख्य होती है। दोनों पर्वों में शुद्धता, उपवास और पारंपरिक भोजन की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन इनके धार्मिक अनुष्ठान अलग हैं।
जितिया व्रत का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व
जितिया केवल व्रत नहीं बल्कि बिहार और पूर्वी भारत की लोकसंस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
इस पर्व के दौरान परिवार की महिलाएं एक साथ पूजा की तैयारी करती हैं। बाजारों में फल, बांस की डलिया, पूजा सामग्री और पारंपरिक खाद्य पदार्थों की खरीदारी बढ़ जाती है।
ग्रामीण इलाकों में आज भी मिट्टी, गोबर, कुश, बांस और स्थानीय पेड़-पौधों से जुड़ी कई परंपराएं जीवित हैं। यही चीज जितिया को लोकजीवन से जोड़ती है।
इस पर्व की कथाओं में मां की ममता के साथ-साथ त्याग, परोपकार, जीवों के प्रति दया और दूसरे के जीवन की रक्षा जैसे संदेश भी दिखाई देते हैं।
जितिया व्रत से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल
जितिया व्रत 2026 में कब है?
2026 में जितिया व्रत 3 अक्टूबर, शनिवार को रखा जाएगा। 2 अक्टूबर को नहाय-खाय और 4 अक्टूबर को पारण होगा।
जितिया व्रत क्यों रखा जाता है?
यह व्रत संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य, सुरक्षा और सुख-समृद्धि की कामना से रखा जाता है।
जितिया में किसकी पूजा होती है?
मुख्य रूप से राजा जीमूतवाहन की पूजा की जाती है। कई क्षेत्रों में चील और सियारिन की लोकपरंपरा भी पूजा का हिस्सा होती है।
क्या जितिया निर्जला व्रत है?
परंपरागत रूप से मुख्य जितिया व्रत निर्जला रखा जाता है, यानी व्रती अन्न और जल ग्रहण नहीं करती।
जितिया का पारण कब होता है?
2026 में 4 अक्टूबर को पारण होगा। बिहारशरीफ की पंचांग आधारित रिपोर्ट में सुबह 7:30 बजे के बाद पारण बताया गया है। स्थानीय पंचांग के अनुसार समय में अंतर संभव है।
जितिया में कौन-सा भोजन बनाया जाता है?
नहाय-खाय में कई जगह मड़ुआ की रोटी, नोनी का साग और स्थानीय सब्जियां बनाई जाती हैं। पारण के बाद भी क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार अलग-अलग पकवान बनाए जाते हैं।
