औरंगाबाद का इतिहास: मगध से आधुनिक जिले तक की पूरी कहानी
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बिहार का औरंगाबाद जिला इतिहास, धर्म, संस्कृति और ग्रामीण सभ्यता के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र है। आज यह दक्षिण-पश्चिम बिहार का एक प्रमुख जिला है, लेकिन इसकी ऐतिहासिक पहचान वर्तमान प्रशासनिक सीमा से कहीं अधिक पुरानी है।
औरंगाबाद की कहानी प्राचीन मगध महाजनपद से जुड़ती है। बाद के समय में यह क्षेत्र मौर्य और अन्य प्राचीन राजवंशों के प्रभाव क्षेत्र में रहा। मध्यकाल में शेरशाह सूरी और मुगल प्रशासन ने यहां अपनी छाप छोड़ी। इसके बाद स्थानीय जमींदारों और राजवंशों का प्रभाव बढ़ा तथा 1857 के विद्रोह के दौरान भी इस इलाके में अंग्रेजी शासन के खिलाफ गतिविधियां हुईं।
आधुनिक प्रशासनिक इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण तारीख 26 जनवरी 1973 है। इसी दिन औरंगाबाद को स्वतंत्र जिला बनाया गया। इससे पहले यह लंबे समय तक गया जिले का अनुमंडल था। जिला गठन की सरकारी अधिसूचना 19 जनवरी 1973 को जारी हुई थी।
यानी आज का औरंगाबाद भले ही प्रशासनिक रूप से 1973 में स्वतंत्र जिला बना, लेकिन इसकी ऐतिहासिक यात्रा हजारों वर्ष पुरानी है।
प्राचीन काल में औरंगाबाद और मगध
औरंगाबाद के इतिहास की सबसे पहली बड़ी कड़ी मगध से जुड़ती है।
प्राचीन भारत में मगध केवल एक महाजनपद नहीं था, बल्कि धीरे-धीरे यह भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे शक्तिशाली राजनीतिक शक्तियों में से एक बन गया। आज का औरंगाबाद जिस क्षेत्र में स्थित है, वह प्राचीन मगध की व्यापक भौगोलिक और सांस्कृतिक सीमा का हिस्सा रहा।
भारत की जनगणना के पुराने जिला विवरण में भी औरंगाबाद के इतिहास को प्राचीन मगध के इतिहास से जोड़ा गया है। उसमें कहा गया है कि वर्तमान औरंगाबाद क्षेत्र प्राचीन मगध की ऐतिहासिक विरासत का हिस्सा रहा और इसकी संस्कृति का संबंध पुराने गया क्षेत्र से भी रहा।
मगध के इतिहास में बिंबिसार और अजातशत्रु जैसे शासकों का विशेष स्थान है। बाद में चंद्रगुप्त मौर्य ने मौर्य साम्राज्य की स्थापना की और सम्राट अशोक के समय मगध की शक्ति बहुत बड़े भूभाग तक फैल गई।
इस व्यापक ऐतिहासिक क्षेत्र में बौद्ध और जैन धर्म का भी विकास हुआ। गया, राजगीर, नालंदा और आसपास के क्षेत्रों के साथ दक्षिण बिहार के अनेक इलाके धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के केंद्र बने।
इसीलिए औरंगाबाद के इतिहास को केवल एक स्थानीय शहर का इतिहास मानना सही नहीं होगा। यह उस विशाल ऐतिहासिक भूभाग से जुड़ा है जिसने प्राचीन भारत की राजनीति, धर्म और संस्कृति को आकार दिया।
औरंगाबाद नाम कैसे पड़ा?
औरंगाबाद के नाम को लेकर इतिहास में मुगल काल की महत्वपूर्ण भूमिका दिखाई देती है।
बिहार सरकार के पर्यटन विवरण के अनुसार जिले का नाम मुगल सम्राट औरंगजेब के शासनकाल से जुड़ा है। आज के औरंगाबाद क्षेत्र में मुगल प्रशासनिक प्रभाव बढ़ने के साथ यह नाम प्रचलित हुआ।
हालांकि यह समझना जरूरी है कि नाम का आधुनिक प्रशासनिक अर्थ और क्षेत्र का प्राचीन इतिहास अलग-अलग कालखंडों से जुड़े हैं।
यानी औरंगाबाद नाम अपेक्षाकृत बाद की पहचान है, जबकि इस क्षेत्र की ऐतिहासिक जड़ें इससे बहुत पहले प्राचीन मगध तक पहुंचती हैं।
शेरशाह सूरी और मध्यकाल में औरंगाबाद
मध्यकाल में औरंगाबाद का महत्व और बढ़ा। शेरशाह सूरी के शासनकाल में यह क्षेत्र रोहतास सरकार से जुड़े प्रशासनिक ढांचे का हिस्सा था।
शेरशाह सूरी का शासन बिहार और उत्तर भारत के इतिहास में महत्वपूर्ण माना जाता है। उसने सड़क, डाक व्यवस्था, राजस्व प्रशासन और सैन्य व्यवस्था में कई बदलाव किए।
औरंगाबाद क्षेत्र से होकर जाने वाली पुरानी सड़क व्यवस्था ने भी इसे रणनीतिक महत्व दिया। बाद के समय में यही क्षेत्र उस ऐतिहासिक मार्ग से जुड़ा रहा जिसे आगे चलकर ग्रैंड ट्रंक रोड के नाम से जाना गया।
शेरशाह की मृत्यु के बाद क्षेत्र पर मुगल प्रभाव स्थापित हुआ और अकबर के शासनकाल में मुगल प्रशासन ने इसे अपने नियंत्रण में रखा। जिला प्रशासन के इतिहास विवरण में इस दौर में अफगान गतिविधियों और उन्हें दबाने के लिए मुगल प्रशासन की कार्रवाई का भी उल्लेख मिलता है।
औरंगाबाद जिले का सिरिस भी इस मध्यकालीन इतिहास की महत्वपूर्ण कड़ी है। जिला प्रशासन के अनुसार सिरिस शेरशाह और मुगल शासन के दौरान एक परगना था। यहां मुगल काल से जुड़ी एक मस्जिद भी मौजूद है, जिसका निर्माण औरंगजेब के शासनकाल से जोड़ा जाता है।
मुगल साम्राज्य के बाद स्थानीय जमींदारों का प्रभाव
मुगल साम्राज्य के कमजोर होने के बाद औरंगाबाद क्षेत्र में स्थानीय जमींदारों और प्रभावशाली परिवारों की भूमिका बढ़ी।
देव, कुटुंबा, माली, पवई, चंदनगढ़ और सिरिस जैसे इलाकों में स्थानीय जमींदारों का प्रभाव रहा। इन परिवारों और स्थानीय शासकों ने अपने-अपने क्षेत्रों में प्रशासनिक तथा सामाजिक प्रभाव बनाए रखा।
औरंगाबाद की सांस्कृतिक पहचान में राजस्थानी मूल के प्रवासियों और स्थानीय राजवंशों की भी चर्चा मिलती है। जिला प्रशासन के पर्यटन विवरण के अनुसार पवई, माली और चंदनगढ़ में पुराने किलों के अवशेष मिलते हैं और इनके राजपरिवारों के राजस्थान से आने की परंपरा बताई जाती है।
इस दौर में किले, मंदिर और स्थानीय सत्ता केंद्र क्षेत्र की पहचान का हिस्सा बने।
1857 के विद्रोह में औरंगाबाद क्षेत्र की भूमिका
भारत के इतिहास में 1857 का विद्रोह अंग्रेजी शासन के खिलाफ सबसे महत्वपूर्ण शुरुआती बड़े विद्रोहों में गिना जाता है।
बिहार में इस विद्रोह का सबसे प्रसिद्ध नाम बाबू वीर कुंवर सिंह है। जगदीशपुर के कुंवर सिंह ने अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष का नेतृत्व किया था।
औरंगाबाद जिले का संबंध भी इस संघर्ष से जुड़ता है। जिला प्रशासन के इतिहास विवरण में देव के फतेह नारायण सिंह का उल्लेख मिलता है, जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ कुंवर सिंह का समर्थन किया था।
सिरिस को भी 1857 के विद्रोह से जुड़ा ऐतिहासिक स्थान माना जाता है। जिला प्रशासन के अनुसार यह क्षेत्र राजा नारायण सिंह और 1857 के विद्रोह से जुड़े स्थानीय नायकों की गतिविधियों का केंद्र रहा।
इससे पता चलता है कि 1857 का विद्रोह केवल बड़े शहरों या प्रसिद्ध राजाओं तक सीमित नहीं था। दक्षिण बिहार के ग्रामीण और जमींदारी क्षेत्रों में भी अंग्रेजी शासन के खिलाफ असंतोष और प्रतिरोध की गतिविधियां मौजूद थीं।
अंग्रेजी शासन में औरंगाबाद
1857 के बाद ब्रिटिश प्रशासन ने पूरे बिहार में राजस्व और प्रशासनिक व्यवस्था को और मजबूत किया।
औरंगाबाद लंबे समय तक बड़े प्रशासनिक जिले के अधीन रहा। 20वीं सदी के शुरुआती दौर तक यह क्षेत्र गया जिले की प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ा रहा। भारत की जनगणना के जिला विवरण के अनुसार 1973 से पहले औरंगाबाद गया जिले का अनुमंडल था।
ब्रिटिश काल में यहां कृषि अर्थव्यवस्था का महत्व बना रहा। ग्रामीण आबादी का बड़ा हिस्सा खेती और उससे जुड़े कार्यों पर निर्भर था।
ग्रैंड ट्रंक रोड के कारण क्षेत्र का व्यापारिक और यातायात महत्व भी बढ़ा। आज भी यह सड़क औरंगाबाद की भौगोलिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
स्वतंत्रता आंदोलन और औरंगाबाद
भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में बिहार की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही। चंपारण सत्याग्रह से लेकर असहयोग आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन तक बिहार के अलग-अलग जिलों में लोगों ने भाग लिया।
औरंगाबाद क्षेत्र भी राष्ट्रीय आंदोलन की गतिविधियों से अलग नहीं रहा।
औरंगाबाद से जुड़े प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों और राजनीतिक नेताओं में सत्येंद्र नारायण सिंह का नाम महत्वपूर्ण है। भारत सरकार के आजादी का अमृत महोत्सव पोर्टल के अनुसार उनका जन्म 12 जुलाई 1917 को औरंगाबाद जिले में हुआ था। उन्होंने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया और स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राजनीतिक बंदियों के लिए कानूनी सहायता कार्यक्रमों से भी जुड़े। स्वतंत्रता के बाद वे अस्थायी संसद और फिर पहली लोकसभा के सदस्य बने।
इस दौर ने औरंगाबाद के राजनीतिक जीवन पर भी प्रभाव डाला।
1947 के बाद औरंगाबाद की नई पहचान
भारत की आजादी के बाद देश में प्रशासनिक ढांचे को व्यवस्थित करने की प्रक्रिया शुरू हुई।
आजादी के बाद भी औरंगाबाद गया जिले का हिस्सा रहा। धीरे-धीरे प्रशासनिक जरूरतों और क्षेत्र के विकास को देखते हुए अलग जिला बनाने की मांग और प्रक्रिया आगे बढ़ी।
आखिरकार 1973 में यह मांग पूरी हुई।
26 जनवरी 1973 को बना औरंगाबाद जिला
26 जनवरी 1973 औरंगाबाद के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण आधुनिक तारीख है।
बिहार सरकार के जिला पोर्टल के अनुसार सरकारी अधिसूचना संख्या 07/11-2071-72 दिनांक 19 जनवरी 1973 के आधार पर 26 जनवरी 1973 को औरंगाबाद को स्वतंत्र जिला बनाया गया। उस समय यह गया जिले से अलग होकर नया जिला बना।
के. ए. एच. सुब्रमण्यम औरंगाबाद जिले के पहले जिलाधिकारी बने, जबकि सुरजीत कुमार साहा पहले अनुमंडल पदाधिकारी थे।
जिला बनने के बाद प्रशासनिक ढांचा विकसित हुआ और औरंगाबाद ने धीरे-धीरे दक्षिण बिहार के एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक केंद्र के रूप में अपनी पहचान बनाई।
औरंगाबाद की भौगोलिक स्थिति ने इतिहास को कैसे प्रभावित किया?
औरंगाबाद की भौगोलिक स्थिति भी इसके इतिहास को समझने में महत्वपूर्ण है।
जिले के पश्चिम में सोन नदी है। इसके उत्तर में अरवल, पूर्व में गया और दक्षिण में झारखंड का पलामू क्षेत्र पड़ता है। जिला प्रशासन के अनुसार यहां मुख्य रूप से मगही बोली जाती है और कृषि लोगों की प्रमुख आजीविका में शामिल है।
सोन नदी और इसकी सहायक नदियों ने यहां की कृषि और ग्रामीण जीवन को प्रभावित किया।
औरंगाबाद की जमीन मुख्य रूप से मैदानी क्षेत्र में आती है। धान, गेहूं, चना, मसूर और रबी की अन्य फसलें यहां की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। जिला प्रशासन के आर्थिक विवरण में कृषि के साथ बिजली उत्पादन और सीमेंट उद्योग का भी उल्लेख है।
औरंगाबाद के प्रमुख ऐतिहासिक स्थल
1. देव सूर्य मंदिर
औरंगाबाद की ऐतिहासिक पहचान में देव सूर्य मंदिर का सबसे महत्वपूर्ण स्थान है।
जिला प्रशासन के अनुसार देव में स्थित सूर्य मंदिर लगभग 15वीं शताब्दी पुराना माना जाता है। स्थानीय ऐतिहासिक परंपरा इसे उमगा के चंद्रवंशी राजा भैरवेंद्र सिंह से जोड़ती है। मंदिर की संरचना लगभग 100 फीट ऊंची बताई जाती है और इसके शीर्ष की आकृति छतरी जैसी है।
बिहार पर्यटन विभाग भी देव सूर्य मंदिर को प्राचीन सूर्य मंदिर बताता है। यहां छठ पूजा के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। मंदिर की पत्थर की नक्काशी और पवित्र जलकुंड इसकी धार्मिक एवं ऐतिहासिक पहचान का हिस्सा हैं।
देव का इतिहास केवल मंदिर तक सीमित नहीं है। यहां सूर्य उपासना और छठ की परंपरा ने इस स्थान को बिहार के प्रमुख धार्मिक केंद्रों में स्थापित किया है।
2. उमगा मंदिर
उमगा औरंगाबाद का एक और महत्वपूर्ण ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्थल है।
जिला प्रशासन के अनुसार यहां का मंदिर वैष्णव परंपरा से जुड़ा है और इसकी वास्तुकला देव के सूर्य मंदिर से मिलती-जुलती है। मंदिर के निर्माण में चौकोर ग्रेनाइट पत्थरों का उपयोग किया गया है। यहां भगवान गणेश, सूर्य देव और भगवान शिव की प्रतिमाएं भी हैं।
उमगा की वास्तुकला इसे इतिहास और पुरातत्व में रुचि रखने वाले लोगों के लिए विशेष बनाती है।
3. देव कुंड
देव कुंड भी जिले का महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल है।
यहां भगवान शिव को समर्पित प्राचीन मंदिर है। महाशिवरात्रि के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।
स्थानीय धार्मिक परंपरा में देव कुंड का संबंध च्यवन ऋषि से जोड़ा जाता है। यह विवरण धार्मिक मान्यता और लोकपरंपरा के रूप में देखा जाना चाहिए।
4. अमझर शरीफ
औरंगाबाद की ऐतिहासिक पहचान केवल हिंदू धार्मिक स्थलों तक सीमित नहीं है।
अमझर शरीफ जिले का प्रमुख इस्लामी तीर्थस्थल है। यहां हजरत सैयदाना मोहम्मद जिलानी अमजहरी कादरी की प्राचीन मजार स्थित है। जिला प्रशासन के अनुसार जून के पहले सप्ताह में संत की बरसी के अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।
यह स्थल औरंगाबाद की बहुधार्मिक सांस्कृतिक विरासत को दर्शाता है।
5. पीरू और बाणभट्ट की विरासत
औरंगाबाद का पीरू भी इतिहास की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
जिला प्रशासन के अनुसार प्राचीन समय में पीरू को प्रीतिकूट कहा जाता था और इसे प्रसिद्ध संस्कृत कवि बाणभट्ट का जन्मस्थान माना जाता है। बाणभट्ट राजा हर्षवर्धन के दरबारी कवि और उनके समय के प्रमुख साहित्यकारों में शामिल थे।
इससे औरंगाबाद की पहचान साहित्यिक इतिहास से भी जुड़ जाती है।
6. पवई, माली और चंदनगढ़
पवई, माली और चंदनगढ़ में पुराने किलों के अवशेष पाए जाते हैं। जिला प्रशासन के पर्यटन विवरण में इन स्थानों को मध्यकालीन और आधुनिक इतिहास में राजस्थान से आए प्रवासियों तथा स्थानीय राजवंशों की विरासत से जोड़ा गया है।
ये स्थान यह बताते हैं कि औरंगाबाद में केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि किले और स्थानीय सत्ता केंद्रों की भी पुरानी परंपरा रही है।
7. सिरिस
सिरिस का इतिहास शेरशाह सूरी और मुगल प्रशासन से जुड़ा हुआ है।
यह क्षेत्र मध्यकाल में एक परगना था। बाद में यहां स्थानीय शासकों और 1857 के विद्रोह से जुड़े लोगों की गतिविधियों का उल्लेख मिलता है।
सिरिस की मस्जिद को भी मुगल काल, विशेष रूप से औरंगजेब के शासन से जोड़ा जाता है।
आधुनिक औरंगाबाद की प्रशासनिक पहचान
आज औरंगाबाद बिहार के 38 जिलों में शामिल है।
जिला प्रशासन के अनुसार इसका क्षेत्रफल लगभग 3,389 वर्ग किलोमीटर है। जिले में दो अनुमंडल—औरंगाबाद और दाउदनगर—तथा 11 प्रखंड हैं। जिले में 1,884 गांव दर्ज हैं।
11 प्रखंड हैं—
- औरंगाबाद
- बारुण
- मदनपुर
- नवीनगर
- ओबरा
- हसपुरा
- रफीगंज
- देव
- कुटुंबा
- दाउदनगर
- गोह
जिले की अर्थव्यवस्था में आज भी कृषि की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसके अलावा नवीनगर में बिजली उत्पादन और सीमेंट उद्योग भी आर्थिक गतिविधियों का हिस्सा हैं।
औरंगाबाद को 'बिहार का चितौड़गढ़' क्यों कहा जाता है?
औरंगाबाद को कई बार 'बिहार का चितौड़गढ़' कहा जाता है। जिला प्रशासन के इतिहास पेज पर भी यह उपनाम दर्ज है।
इस नाम के पीछे क्षेत्र की राजपूत परंपरा, स्थानीय राजवंशों और ऐतिहासिक संघर्षों की चर्चा की जाती है। हालांकि इस उपनाम को आधिकारिक प्रशासनिक नाम नहीं, बल्कि ऐतिहासिक-सामाजिक पहचान के रूप में समझना चाहिए।
औरंगाबाद के इतिहास में स्थानीय राजवंशों, जमींदारों, स्वतंत्रता सेनानियों और ग्रामीण समाज की भूमिका ने इसकी अलग पहचान बनाई।
औरंगाबाद का इतिहास एक नजर में
| काल/वर्ष | प्रमुख घटना |
|---|---|
| प्राचीन काल | क्षेत्र का संबंध मगध महाजनपद से |
| मौर्य काल | मगध साम्राज्य और बौद्ध संस्कृति का व्यापक प्रभाव |
| मध्यकाल | शेरशाह सूरी के प्रशासन में क्षेत्र का महत्व |
| मुगल काल | मुगल प्रशासन और स्थानीय परगना व्यवस्था |
| मुगलोत्तर काल | स्थानीय जमींदारों और राजवंशों का प्रभाव |
| 1857 | अंग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोह में स्थानीय भागीदारी |
| ब्रिटिश काल | गया जिले के प्रशासनिक ढांचे से जुड़ा क्षेत्र |
| 1942 | भारत छोड़ो आंदोलन के दौर में राष्ट्रीय आंदोलन का प्रभाव |
| 26 जनवरी 1973 | स्वतंत्र औरंगाबाद जिला अस्तित्व में आया |
| वर्तमान | कृषि, ऊर्जा, पर्यटन और ऐतिहासिक विरासत वाला दक्षिण बिहार का जिला |
औरंगाबाद का इतिहास क्यों खास है?
औरंगाबाद की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां इतिहास की कई अलग-अलग परतें एक साथ दिखाई देती हैं।
प्राचीन मगध इसे भारत के सबसे पुराने राजनीतिक इतिहास से जोड़ता है।
मध्यकालीन किले और मंदिर इसके बाद की राजनैतिक और सांस्कृतिक यात्रा बताते हैं।
सिरिस और 1857 की विरासत अंग्रेजी शासन के खिलाफ स्थानीय प्रतिरोध की कहानी सामने लाती है।
स्वतंत्रता आंदोलन आधुनिक भारत के निर्माण में क्षेत्र की भागीदारी को दिखाता है।
और 1973 में जिला गठन इसकी आधुनिक प्रशासनिक पहचान की शुरुआत करता है।
देव सूर्य मंदिर, उमगा, देव कुंड, अमझर शरीफ, पीरू, सिरिस और पवई जैसे स्थान इस इतिहास को आज भी जीवित रखते हैं।
औरंगाबाद के इतिहास से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल
औरंगाबाद जिला कब बना?
औरंगाबाद जिला 26 जनवरी 1973 को स्वतंत्र जिला बना। इसकी स्थापना से संबंधित सरकारी अधिसूचना 19 जनवरी 1973 को जारी हुई थी।
औरंगाबाद पहले किस जिले का हिस्सा था?
1973 से पहले औरंगाबाद गया जिले का अनुमंडल था।
औरंगाबाद का प्राचीन संबंध किस साम्राज्य से था?
औरंगाबाद क्षेत्र का प्राचीन इतिहास मगध महाजनपद से जुड़ा है।
औरंगाबाद का सबसे प्रसिद्ध ऐतिहासिक मंदिर कौन सा है?
देव सूर्य मंदिर औरंगाबाद का सबसे प्रसिद्ध ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्थलों में से एक है। यहां छठ पूजा के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
औरंगाबाद में कौन-कौन से ऐतिहासिक स्थल हैं?
देव सूर्य मंदिर, उमगा मंदिर, देव कुंड, अमझर शरीफ, पीरू, सिरिस, पवई, माली और चंदनगढ़ प्रमुख ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्थलों में शामिल हैं।
औरंगाबाद को बिहार का चितौड़गढ़ क्यों कहा जाता है?
जिला प्रशासन के इतिहास विवरण में औरंगाबाद को “बिहार का चितौड़गढ़” कहा गया है। यह पहचान क्षेत्र की राजपूत परंपरा और स्थानीय ऐतिहासिक-सामाजिक विरासत से जुड़ी है।
औरंगाबाद के इतिहास में 1857 का क्या महत्व है?
1857 के विद्रोह के दौरान क्षेत्र के कुछ स्थानीय जमींदारों और प्रभावशाली लोगों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोहियों का समर्थन किया। जिला प्रशासन के इतिहास में देव के फतेह नारायण सिंह द्वारा कुंवर सिंह के समर्थन का उल्लेख मिलता है।
औरंगाबाद की प्रमुख भाषा कौन सी है?
जिला प्रशासन के अनुसार यहां मुख्य रूप से मगही बोली जाती है।
औरंगाबाद की अर्थव्यवस्था किस पर आधारित है?
औरंगाबाद की अर्थव्यवस्था में कृषि की प्रमुख भूमिका है। धान, गेहूं, चना, मसूर आदि फसलें महत्वपूर्ण हैं। इसके अलावा नवीनगर में बिजली उत्पादन और सीमेंट उद्योग भी आर्थिक गतिविधियों का हिस्सा हैं।
