15 अगस्त पर गूंजता है ये अमर तराना, जेल में ऐसे लिखा गया था गीत
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👉 WhatsApp से जुड़ेंमेरा रंग दे बसंती चोला ऐसा देशभक्ति गीत है, जिसकी गूंज स्वतंत्रता दिवस के समारोहों में आज भी सुनाई देती है। मेरा रंग दे बसंती चोला सिर्फ एक लोकप्रिय गीत नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की कुर्बानी और क्रांतिकारी भावना से जुड़ी याद भी है। इस गीत को आम तौर पर राम प्रसाद बिस्मिल और उनके क्रांतिकारी साथियों से जोड़ा जाता है। इसकी रचना को लेकर ऐतिहासिक स्रोतों में अलग-अलग विवरण भी मिलते हैं, इसलिए इसके इतिहास को समझना दिलचस्प है।
15 अगस्त आते ही स्कूलों, कॉलेजों और देशभक्ति कार्यक्रमों में आजादी के आंदोलन से जुड़े गीतों की आवाज सुनाई देने लगती है। इनमें “मेरा रंग दे बसंती चोला” खास स्थान रखता है। गीत के शब्द बलिदान, मातृभूमि और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष की भावना को सामने रखते हैं।
जेल की बैरक से जुड़ी है गीत की कहानी
इस गीत की सबसे चर्चित कहानी साल 1927 से जुड़ी है। काकोरी कांड के बाद राम प्रसाद बिस्मिल और उनके कई साथी अंग्रेजी शासन के निशाने पर थे। मुकदमे के बाद बिस्मिल को फांसी की सजा सुनाई गई थी। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, लखनऊ सेंट्रल जेल की बैरक नंबर 11 में बिस्मिल और उनके साथियों ने बसंत के अवसर पर एक क्रांतिकारी गीत तैयार किया था।
एक विवरण के मुताबिक, जेल में मौजूद क्रांतिकारियों के बीच बसंत के मौके पर गीत लिखने की बात हुई। इसके बाद बिस्मिल और उनके साथियों ने मिलकर ऐसी रचना तैयार की, जिसमें बलिदान और आजादी की भावना दिखाई देती थी। इस वजह से गीत का संबंध केवल एक व्यक्ति से नहीं, बल्कि उस दौर के कई क्रांतिकारियों की सामूहिक चेतना से भी जोड़ा जाता है।
हालांकि, इसके इतिहास को लेकर एक जरूरी तथ्य यह भी है कि “मेरा रंग दे बसंती चोला” की रचना और उसके अलग-अलग संस्करणों को लेकर स्रोतों में मतभेद मिलते हैं। कुछ इतिहासकार इसे बिस्मिल की रचना बताते हैं, जबकि लोकप्रिय फिल्मी संस्करण का श्रेय गीतकार प्रेम धवन को दिया जाता है।
भगत सिंह से कैसे जुड़ा यह देशभक्ति गीत?
समय के साथ “बसंती चोला” का नाम भगत सिंह और दूसरे क्रांतिकारियों की शहादत से भी गहराई से जुड़ गया। इसकी वजह गीत का लोकप्रिय होना और फिल्मों में क्रांतिकारी पात्रों के साथ इसका इस्तेमाल रहा।
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में भगत सिंह और राम प्रसाद बिस्मिल अलग-अलग दौर और घटनाओं से जुड़े क्रांतिकारी थे। बिस्मिल को काकोरी कांड के बाद 1927 में फांसी दी गई, जबकि भगत सिंह को 1931 में लाहौर जेल में फांसी हुई। इसलिए दोनों के एक साथ जेल में रहने की बात ऐतिहासिक रूप से सही नहीं मानी जाती।
यही वजह है कि गीत से जुड़ी लोकप्रिय कहानियों और ऐतिहासिक तथ्यों में अंतर समझना जरूरी है। फिल्मों और जनस्मृति ने इस गीत को भगत सिंह की शहादत से भी जोड़ दिया, जिससे इसकी लोकप्रियता और बढ़ती गई।
1965 की फिल्म ने गीत को घर-घर पहुंचाया
“मेरा रंग दे बसंती चोला” को बड़े पैमाने पर लोकप्रिय बनाने में 1965 की फिल्म ‘शहीद’ की अहम भूमिका रही। मनोज कुमार अभिनीत इस फिल्म में गीत का एक नया संस्करण इस्तेमाल किया गया था। इस फिल्म के लिए गीतकार और संगीतकार प्रेम धवन ने रचना तैयार की थी।
फिल्मी संस्करण को मुकेश, महेंद्र कपूर और राजेंद्र मेहता जैसे गायकों ने आवाज दी। फिल्म में इस गीत को क्रांतिकारी भावना और बलिदान के संदर्भ में पेश किया गया, जिसके बाद यह देशभक्ति गीतों की सूची में स्थायी रूप से शामिल हो गया।
आज जब 15 अगस्त को तिरंगा फहराया जाता है और स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम आयोजित होते हैं, तब इस गीत की गूंज लोगों को स्वतंत्रता आंदोलन के उन संघर्षों की याद दिलाती है, जिनमें अनगिनत लोगों ने अपना जीवन दांव पर लगाया था।
“मेरा रंग दे बसंती चोला” की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण यही है कि यह केवल संगीत तक सीमित नहीं रहा। इसके साथ शहादत, देशप्रेम और स्वतंत्रता की भावना जुड़ गई। यही वजह है कि कई दशक बाद भी यह गीत स्वतंत्रता दिवस के मौकों पर लोगों के बीच भावनात्मक जुड़ाव पैदा करता है।
