51 साल पुराना ऋषि कपूर-नीतू सिंह का रोमांटिक गाना, आज भी आशिकों की पहली पसंद
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👉 WhatsApp से जुड़ेंगुलशन बावरा हिंदी सिनेमा के उन चुनिंदा गीतकारों में शामिल हैं, जिनके लिखे गीत आज भी लोगों की जुबान पर हैं। गुलशन बावरा ने अपने शब्दों से प्यार, देशभक्ति और जिंदगी के दर्शन को बेहद सरल अंदाज में पेश किया। उनकी कलम से निकले गीतों ने कई पीढ़ियों को प्रभावित किया।
ऋषि कपूर और नीतू सिंह की जोड़ी पर फिल्माया गया साल 1975 की फिल्म खेल खेल में का मशहूर गाना "खुल्लम खुल्ला प्यार करेंगे हम दोनों" आज भी उतना ही लोकप्रिय है। इस गीत को किशोर कुमार और आशा भोसले ने अपनी आवाज दी थी, जबकि इसके बोल गुलशन बावरा ने लिखे थे।
लाहौर से मुंबई तक संघर्षों भरी रही जिंदगी
गुलशन बावरा का जन्म 12 अप्रैल 1937 को लाहौर के पास शेखूपुरा में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है। भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौरान उनके परिवार ने काफी कठिन दौर देखा।
विभाजन के बाद उनका पालन-पोषण जयपुर में उनकी बड़ी बहन ने किया। बाद में वे दिल्ली पहुंचे और दिल्ली विश्वविद्यालय से पढ़ाई पूरी की। इसी दौरान उन्होंने कविताएं लिखना शुरू किया और उनके मन में फिल्मों में काम करने का सपना आकार लेने लगा।
युवा उम्र में उन्होंने रेलवे की नौकरी के लिए आवेदन किया। उन्हें राजस्थान के कोटा में पोस्टिंग मिली, लेकिन जब वे वहां पहुंचे तो पता चला कि वह पद पहले ही भर चुका था।
किस्मत का यही मोड़ उन्हें साल 1955 में मुंबई ले गया, जहां उन्हें रेलवे में क्लर्क की नौकरी मिल गई। लेकिन उनके दिल में फिल्मों के लिए जुनून हमेशा जिंदा रहा।
ऐसे मिला गुलशन मेहता को ‘बावरा’ नाम
मुंबई में नौकरी करने के साथ-साथ गुलशन फिल्म स्टूडियो के चक्कर लगाते रहते थे। इसी संघर्ष के दौरान उनकी मुलाकात संगीतकार कल्याणजी से हुई।
कल्याणजी ने उन्हें साल 1959 में फिल्म चंद्रसेना में पहला मौका दिया। हालांकि उनकी पहचान का असली सफर फिल्म सट्टा बाजार से शुरू हुआ।
गुलशन अक्सर अलग तरह के कपड़े पहनते थे। रंग-बिरंगी शर्ट, बिखरे बाल और उनका मस्तमौला अंदाज लोगों का ध्यान खींचता था। फिल्म के डिस्ट्रीब्यूटर शांतिभाई पटेल ने मजाक में उन्हें देखकर कहा कि यह लड़का तो बिल्कुल "बावरा" लगता है।
गुलशन को यह नाम इतना पसंद आया कि उन्होंने इसे अपनी पहचान बना लिया। इसके बाद गुलशन कुमार मेहता हमेशा के लिए गुलशन बावरा बन गए।
हिंदी सिनेमा को दिए यादगार और अमर गीत
गुलशन बावरा की सबसे बड़ी खासियत थी कि उनके गीत आम इंसान की भावनाओं से जुड़े होते थे। उनकी भाषा सरल थी, लेकिन उसमें गहराई और संदेश छिपा होता था।
फिल्म उपकार (1967) का गीत "मेरे देश की धरती" उनके करियर की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक रहा। इस गीत ने देशभक्ति के भाव को नई ऊंचाई दी।
कहा जाता है कि अभिनेता और निर्देशक मनोज कुमार ने गुलशन बावरा से उनकी एक पुरानी गुनगुनाई हुई धुन पर गीत लिखने को कहा था। यही गीत आगे चलकर हिंदी सिनेमा का ऐतिहासिक देशभक्ति गीत बन गया।
गुलशन बावरा ने अपने करीब 42 साल के करियर में लगभग 240 गीत लिखे। उन्होंने संख्या से ज्यादा गुणवत्ता को महत्व दिया और हर गीत में अलग भावनाएं दिखाई।
उनके लोकप्रिय गीतों में:
- "मेरे देश की धरती" (उपकार)
- "यारी है ईमान मेरा" (जंजीर)
- "कसमे वादे निभाएंगे हम"
- "प्यार हमें किस मोड़ पे ले आया"
- "चांदी की दीवार न तोड़ी"
जैसे कई यादगार गीत शामिल हैं।
आरडी बर्मन के साथ बनी शानदार जोड़ी
साल 1975 के बाद गुलशन बावरा और संगीतकार आरडी बर्मन की जोड़ी ने बॉलीवुड संगीत में नया रंग भर दिया।
दोनों का स्वभाव काफी मिलनसार और मस्तमौला था। उनकी दोस्ती सिर्फ संगीत तक सीमित नहीं थी, बल्कि निजी जिंदगी में भी दोनों एक-दूसरे के बेहद करीब थे।
उन्होंने जंजीर, उपकार, पवित्र पापी, लफंगे जैसी फिल्मों के लिए गीत लिखे। इसके अलावा उन्होंने पंजाबी फिल्मों में भी काम किया।
फिल्म जंजीर के लोकप्रिय गीत "दीवाने हैं दीवानों को ना घर चाहिए" में गुलशन बावरा खुद हारमोनियम बजाते हुए नजर आए थे।
दो बार मिला फिल्मफेयर सम्मान
गुलशन बावरा की प्रतिभा को देशभर में सम्मान मिला। साल 1968 में उन्हें फिल्म उपकार के गीत "मेरे देश की धरती" के लिए सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला।
इसके बाद साल 1974 में फिल्म जंजीर के गीत "यारी है ईमान मेरा" के लिए भी उन्हें फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला।
उनका योगदान सिर्फ गीत लिखने तक सीमित नहीं था। उन्होंने कुछ फिल्मों में अभिनय भी किया और पर्दे पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई।
72 साल की उम्र में हुआ निधन
7 अगस्त 2009 को मुंबई के पाली हिल स्थित अपने घर पर हृदय गति रुकने से गुलशन बावरा का निधन हो गया। वे उस समय 72 वर्ष के थे।
भले ही आज वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके लिखे गीत हिंदी सिनेमा की अमूल्य धरोहर हैं। उनकी रचनाएं आज भी संगीत प्रेमियों के दिलों में जिंदा हैं।
गुलशन बावरा की कहानी बताती है कि संघर्षों से गुजरकर भी अगर जुनून कायम रहे तो एक रेलवे क्लर्क भी हिंदी सिनेमा का महान गीतकार बन सकता है।
