गोमूत्र रिसर्च विवाद: प्रियंका गांधी के बयान से छिड़ी नई वैज्ञानिक बहस
नई दिल्ली: गोमूत्र रिसर्च विवाद ने देश में विज्ञान, राजनीति और पारंपरिक ज्ञान को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है। गोमूत्र रिसर्च विवाद तब सामने आया जब कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी की आईआईटी के एक निदेशक को लेकर की गई टिप्पणी पर बहस तेज हो गई। इस पूरे मामले में सवाल यह उठ रहा है कि पारंपरिक दावों की वैज्ञानिक जांच होनी चाहिए या उन्हें केवल आलोचना के आधार पर खारिज कर देना चाहिए।
विज्ञान का आधार हमेशा प्रमाण, परीक्षण और शोध रहा है। वैज्ञानिक समुदाय का मानना है कि किसी भी दावे को बिना जांच स्वीकार करना सही नहीं है, लेकिन बिना शोध के खारिज करना भी वैज्ञानिक सोच के अनुरूप नहीं है।
प्रियंका गांधी की टिप्पणी के बाद शुरू हुई बहस
प्रियंका गांधी की टिप्पणी को लेकर राजनीतिक और वैज्ञानिक जगत में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं।
आलोचकों का कहना है कि किसी वैज्ञानिक या शोधकर्ता को किसी विषय पर काम करने के कारण एक विशेष नाम से संबोधित करना वैज्ञानिक संवाद को कमजोर करता है।
वहीं, कुछ लोगों का तर्क है कि किसी भी पारंपरिक चिकित्सा पद्धति या दावे को आधुनिक वैज्ञानिक मानकों पर परखा जाना चाहिए।
विशेषज्ञों के अनुसार, विज्ञान में किसी विचार की अहमियत इस बात से तय होती है कि वह परीक्षणों में कितना खरा उतरता है।
पारंपरिक ज्ञान से निकली हैं कई आधुनिक दवाएं
इतिहास में कई ऐसी दवाएं हैं जिनकी शुरुआत पारंपरिक ज्ञान से हुई थी।
उदाहरण के तौर पर एस्पिरिन का संबंध विलो पेड़ की छाल से जुड़ा है। वहीं, आर्टेमिसिनिन जैसी महत्वपूर्ण दवा पारंपरिक चीनी चिकित्सा से शोध के जरिए सामने आई।
आधुनिक चिकित्सा में इस्तेमाल होने वाले कई रासायनिक यौगिक प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त हुए हैं।
यही कारण है कि वैज्ञानिक समुदाय पारंपरिक ज्ञान को सीधे खारिज करने के बजाय उसकी वैज्ञानिक जांच पर जोर देता है।
गोमूत्र पर क्या कहती हैं वैज्ञानिक स्टडीज?
गोमूत्र और गोमूत्र डिस्टिलेट को लेकर कई वैज्ञानिक अध्ययन किए गए हैं।
कुछ शोधों में इसमें एंटीमाइक्रोबियल यानी बैक्टीरिया को रोकने वाले गुण, एंटीऑक्सीडेंट प्रभाव और इम्यून सिस्टम पर संभावित प्रभावों का अध्ययन किया गया है।
हालांकि, अधिकांश शोध अभी प्रयोगशाला (इन विट्रो) और जानवरों पर किए गए अध्ययनों तक सीमित हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी पदार्थ को दवा के रूप में स्वीकार करने के लिए बड़े स्तर पर क्लिनिकल ट्रायल जरूरी होते हैं।
यानी प्रयोगशाला में मिले सकारात्मक परिणामों को सीधे इंसानों के इलाज में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, जब तक उनकी सुरक्षा और प्रभावशीलता साबित न हो जाए।
गोमूत्र डिस्टिलेट और पेटेंट को लेकर चर्चा
गोमूत्र डिस्टिलेट से जुड़े कुछ विदेशी पेटेंट भी चर्चा में रहे हैं।
इनमें गोमूत्र डिस्टिलेट को बायो-एन्हांसर के रूप में इस्तेमाल करने और कुछ दवाओं की प्रभावशीलता बढ़ाने की संभावनाओं पर काम किया गया है।
शोधकर्ताओं ने इसके जैविक प्रभावों को समझने की कोशिश की है।
हालांकि, पेटेंट मिलना किसी चिकित्सा उपचार के पूरी तरह प्रमाणित होने का संकेत नहीं होता। किसी भी दवा या चिकित्सा उपयोग के लिए वैज्ञानिक परीक्षणों की प्रक्रिया जरूरी होती है।
IIT रुड़की सहित कई संस्थानों में शोध
गोमूत्र डिस्टिलेट को लेकर भारत के कई वैज्ञानिक संस्थानों में भी अध्ययन हुए हैं।
कुछ हालिया प्रयोगशाला अध्ययनों में वायरस पर इसके संभावित प्रभावों की जांच की गई है।
आईआईटी रुड़की के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक अध्ययन में गोमूत्र डिस्टिलेट के एक फॉर्मूलेशन का लैब स्तर पर चिकनगुनिया वायरस पर प्रभाव जांचा गया।
हालांकि, वैज्ञानिकों का कहना है कि लैब परिणामों को मानव उपचार में बदलने के लिए आगे और विस्तृत शोध की आवश्यकता होती है।
भारत में DST, DBT, CSIR, ICMR, ICAR और आयुष मंत्रालय जैसी संस्थाएं अलग-अलग क्षेत्रों में पारंपरिक ज्ञान और प्राकृतिक उत्पादों पर शोध करती रही हैं।
विज्ञान में सही तरीका क्या होना चाहिए?
वैज्ञानिक दृष्टिकोण यह कहता है कि किसी भी दावे को दो स्तरों पर देखा जाना चाहिए।
पहला, क्या उस दावे के पीछे कोई वैज्ञानिक आधार मौजूद है?
दूसरा, क्या वह आधार मानव उपयोग के लिए सुरक्षित और प्रभावी साबित हुआ है?
अगर कोई शोध सही परिणाम देता है तो उसे स्वीकार किया जाना चाहिए और अगर वह परीक्षण में विफल होता है तो उसे छोड़ देना चाहिए।
यही वैज्ञानिक प्रक्रिया की सबसे बड़ी विशेषता है।
राजनीति से अलग वैज्ञानिक सोच की जरूरत
गोमूत्र रिसर्च विवाद केवल एक राजनीतिक बयान तक सीमित नहीं है। यह सवाल उठाता है कि समाज में वैज्ञानिक चर्चा किस तरह होनी चाहिए।
किसी भी विषय पर सहमति या असहमति हो सकती है, लेकिन वैज्ञानिक शोध का मूल्यांकन प्रमाणों के आधार पर होना चाहिए।
इतिहास में कई वैज्ञानिक विचारों को शुरुआत में विरोध और आलोचना का सामना करना पड़ा। लेकिन समय के साथ प्रयोग और प्रमाणों ने उनकी वास्तविकता तय की।
इसलिए गोमूत्र जैसे पारंपरिक विषयों पर भी सही रास्ता यही है कि शोध किया जाए, परिणामों की जांच हो और निष्कर्ष वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर निकाले जाएं।
