बिहार में शराबबंदी पर बड़ा फैसला? सरकार के रुख से साफ हुई तस्वीर
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👉 WhatsApp से जुड़ेंबिहार में शराबबंदी को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। बिहार शराबबंदी को खत्म करने की मांग के बीच सरकार ने फिलहाल कानून में बदलाव के संकेत नहीं दिए हैं। दूसरी ओर, राष्ट्रीय आर्थिक अनुसंधान परिषद (NCAER) की एक रिपोर्ट में राज्य की आर्थिक गति तेज करने के लिए शराबबंदी खत्म कर आबकारी राजस्व बहाल करने की सिफारिश की गई है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या बिहार में शराबबंदी कभी खत्म होगी या सरकार मौजूदा नीति पर ही कायम रहेगी?
राज्य में पूर्ण शराबबंदी अप्रैल 2016 में लागू की गई थी। तब सरकार ने इसे सामाजिक सुधार और खासकर महिलाओं की स्थिति बेहतर करने की दिशा में बड़ा कदम बताया था। अब करीब एक दशक बाद इसके आर्थिक और सामाजिक प्रभावों को लेकर अलग-अलग राय सामने आ रही है।
NCAER ने शराबबंदी खत्म करने का क्यों दिया सुझाव?
नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च यानी NCAER ने 'इंडिया पॉलिसी फोरम-2026' से जुड़े अध्ययन में बिहार के विकास को लेकर कई सुझाव दिए हैं। रिपोर्ट में शराबबंदी खत्म करने को राज्य की आय बढ़ाने के संभावित विकल्पों में शामिल किया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार बिहार की बड़ी आबादी और सीमित भू-राजस्व क्षमता को देखते हुए राज्य के लिए वस्तुओं और सेवाओं पर कर से मिलने वाला राजस्व महत्वपूर्ण है। शराब पर आबकारी शुल्क दोबारा लागू होने से सरकार की आय बढ़ सकती है।
अध्ययन में यह भी उल्लेख किया गया कि शराबबंदी से पहले आबकारी राजस्व राज्य की कुल आय का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था। प्रतिबंध के बाद यह स्रोत समाप्त हो गया, जबकि अवैध शराब की तस्करी रोकने और निगरानी पर सरकारी खर्च की जरूरत बनी रही।
क्या सम्राट चौधरी सरकार शराबबंदी हटाएगी?
NCAER की सिफारिश के बावजूद फिलहाल सरकार की ओर से शराबबंदी हटाने की कोई घोषणा नहीं हुई है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, बिहार सरकार इस नीति को जारी रखने के पक्ष में है।
शराबबंदी का मुद्दा सिर्फ आर्थिक नहीं बल्कि राजनीतिक और सामाजिक रूप से भी संवेदनशील है। बिहार की राजनीति में महिलाओं का मतदान व्यवहार लंबे समय से महत्वपूर्ण माना जाता है और शराबबंदी को महिला मतदाताओं के बीच सरकार की प्रमुख नीतियों में गिना जाता है।
यही वजह है कि इस कानून में किसी बड़े बदलाव का फैसला राजनीतिक रूप से भी काफी महत्वपूर्ण हो सकता है।
जीतन राम मांझी ने दिया गुजरात मॉडल का सुझाव
केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने भी बिहार में शराबबंदी को लेकर अपनी राय रखी है। उन्होंने शराबबंदी हटाने के बजाय गुजरात मॉडल की तर्ज पर इसे अधिक सख्ती और प्रभावी तरीके से लागू करने का सुझाव दिया।
उनका तर्क है कि यदि शराबबंदी जारी रखनी है तो इसके क्रियान्वयन में कमियों को दूर करना जरूरी है। अवैध शराब की बिक्री और तस्करी पर प्रभावी नियंत्रण इसी चुनौती का हिस्सा है।
इस तरह शराबबंदी को लेकर राजनीतिक स्तर पर दो अलग-अलग दृष्टिकोण दिखाई दे रहे हैं—एक तरफ आर्थिक कारणों से नीति में बदलाव की मांग है, तो दूसरी ओर प्रतिबंध को और प्रभावी बनाने की बात कही जा रही है।
महिला वोट से कितना जुड़ा है शराबबंदी का मुद्दा?
बिहार में शराबबंदी को लेकर राजनीतिक चर्चा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू महिला मतदाता हैं। समर्थकों का तर्क है कि शराब की उपलब्धता कम होने से कई परिवारों में घरेलू खर्च और महिलाओं से जुड़े सामाजिक मुद्दों पर सकारात्मक असर पड़ा।
चुनावी आंकड़ों को भी इस बहस में अक्सर सामने रखा जाता है। 2025 के विधानसभा चुनाव में कई सीटों पर महिला मतदान प्रतिशत पुरुषों से अधिक रहा और इनमें बड़ी संख्या में सीटों पर NDA उम्मीदवारों को जीत मिली।
हालांकि, केवल इन आंकड़ों के आधार पर शराबबंदी और किसी गठबंधन की चुनावी सफलता के बीच सीधा कारण स्थापित करना उचित नहीं होगा। मतदान व्यवहार पर बेरोजगारी, विकास, कल्याणकारी योजनाएं, स्थानीय उम्मीदवार और अन्य राजनीतिक मुद्दों का भी प्रभाव पड़ता है।
प्रशांत किशोर के रुख से क्या संकेत मिला?
शराबबंदी खत्म करने की बात करने वाले नेताओं में प्रशांत किशोर का नाम भी प्रमुखता से सामने आया है। उन्होंने चुनावी राजनीति के दौरान शराबबंदी को समाप्त करने की बात कही थी।
उनके चुनावी प्रदर्शन को लेकर समर्थक और विरोधी अपने-अपने तर्क देते रहे हैं। हालांकि, किसी एक चुनाव के परिणाम को केवल शराबबंदी के मुद्दे से जोड़कर देखना राजनीतिक रूप से सही तस्वीर नहीं देता।
बांकीपुर उपचुनाव के संदर्भ में भी यह मुद्दा अलग तरीके से सामने आया, जहां प्रशांत किशोर ने जीत हासिल की। इससे यह संकेत जरूर मिलता है कि अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में मतदाताओं की प्राथमिकताएं अलग हो सकती हैं।
शराबबंदी से शराब की खपत में कितनी कमी आई?
शराबबंदी के पक्ष में सबसे बड़ा सामाजिक तर्क शराब की खपत में कमी को लेकर दिया जाता है। उपलब्ध NFHS आंकड़ों के अनुसार बिहार में 15 से 49 वर्ष के पुरुषों में शराब सेवन का अनुपात NFHS-4 के 28.9 प्रतिशत से घटकर NFHS-5 में करीब 17 प्रतिशत और NFHS-6 में करीब 16.5 प्रतिशत बताया गया है।
इन आंकड़ों को शराबबंदी के प्रभाव से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन शराब सेवन में बदलाव के पीछे अन्य सामाजिक और आर्थिक कारण भी हो सकते हैं। इसलिए इसे नीति के प्रभाव का अकेला प्रमाण नहीं माना जा सकता।
घरेलू हिंसा को लेकर भी आंकड़ों में अलग-अलग तस्वीर दिखाई देती है। शराब सेवन और घरेलू हिंसा के बीच संबंध पर शोध मौजूद है, लेकिन महिलाओं के खिलाफ होने वाले हर अपराध का कारण केवल शराब को मानना सही नहीं होगा।
अवैध शराब और जहरीली शराब की चुनौती
शराबबंदी लागू होने के बावजूद बिहार में अवैध शराब की तस्करी और जहरीली शराब से होने वाली घटनाएं बड़ी चुनौती बनी हुई हैं। प्रतिबंध के कारण समानांतर अवैध कारोबार को रोकना प्रशासन के लिए लगातार चुनौती रहा है।
इसी वजह से शराबबंदी को जारी रखने या खत्म करने की बहस सिर्फ राजस्व तक सीमित नहीं है। सरकार के सामने सामाजिक प्रभाव, कानून-व्यवस्था, अवैध कारोबार और महिलाओं की सुरक्षा जैसे कई पहलुओं को साथ लेकर फैसला करने की चुनौती है।
फिलहाल नहीं दिख रहा शराबबंदी हटने का रास्ता
मौजूदा स्थिति को देखते हुए बिहार में शराबबंदी तत्काल खत्म होने की संभावना स्पष्ट नहीं है। एक तरफ NCAER जैसी संस्था आर्थिक विकास और राजस्व के नजरिए से नीति में बदलाव का सुझाव दे रही है, वहीं सरकार के लिए सामाजिक और राजनीतिक पहलू भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
इसलिए आने वाले समय में बहस का केंद्र यही रहेगा कि बिहार शराबबंदी से मिलने वाले सामाजिक लाभ और इससे होने वाले संभावित राजस्व नुकसान के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। फिलहाल सरकार का रुख शराबबंदी को जारी रखने का ही नजर आ रहा है।
