बिहार में शराबबंदी पर बड़ा फैसला, JDU ने समीक्षा की मांग को नकारा

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पटना: बिहार में शराबबंदी कानून को लेकर सियासी बहस एक बार फिर तेज हो गई है। बिहार शराबबंदी कानून की समीक्षा की संभावना को सत्तारूढ़ NDA की अहम सहयोगी जनता दल यूनाइटेड (JDU) ने मंगलवार को पूरी तरह खारिज कर दिया। JDU ने साफ कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कार्यकाल में लागू किए गए इस कानून में बदलाव या समीक्षा का फिलहाल कोई सवाल नहीं है।

JDU का यह बयान ऐसे समय आया है, जब NDA के ही सहयोगी हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) के अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने शराबबंदी के मौजूदा क्रियान्वयन पर सवाल उठाए हैं।

उन्होंने बिहार में शराबबंदी को गुजरात मॉडल की तर्ज पर लागू करने की जरूरत बताई थी। मांझी के बयान के बाद शराबबंदी को लेकर गठबंधन के भीतर अलग-अलग राय सामने आने लगी थी।

JDU ने शराबबंदी की समीक्षा से किया इनकार

JDU के वरिष्ठ नेता और विधान परिषद सदस्य नीरज कुमार ने मंगलवार को स्पष्ट किया कि शराबबंदी कानून की समीक्षा का कोई प्रस्ताव नहीं है।

उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार के नेतृत्व में लागू किए गए शराबबंदी कानून ने खासकर ग्रामीण महिलाओं के जीवन में बदलाव लाने का काम किया है। JDU नेता ने यह भी दावा किया कि इस कानून की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत BJP के शीर्ष नेताओं ने भी सराहना की है।

नीरज कुमार के बयान से यह स्पष्ट संकेत मिला कि पार्टी शराबबंदी को बिहार की मौजूदा सरकार की प्रमुख नीतियों में बनाए रखने के पक्ष में है।

बिहार में बिहार मद्यनिषेध एवं उत्पाद अधिनियम अप्रैल 2016 में लागू हुआ था। इसके तहत राज्य में शराब का निर्माण, बिक्री और सेवन प्रतिबंधित है।

जीतन राम मांझी ने क्यों उठाए सवाल?

शराबबंदी को लेकर विवाद उस समय बढ़ा, जब केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने इसके मौजूदा क्रियान्वयन पर चिंता जताई।

मांझी ने कानून की मूल भावना का विरोध करने के बजाय इसके लागू होने के तरीके पर सवाल उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि कानून के क्रियान्वयन में खामियों के कारण कई तरह की समस्याएं सामने आ रही हैं।

उन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से गुजरात मॉडल की शराबबंदी पर विचार करने की अपील की थी।

मांझी का कहना था कि शराबबंदी को प्रभावी बनाने के लिए इसके क्रियान्वयन की व्यवस्था को और मजबूत करने की जरूरत है। उनके इस बयान के बाद यह चर्चा शुरू हुई कि क्या बिहार सरकार शराबबंदी नीति में कोई बड़ा बदलाव कर सकती है।

हालांकि, JDU के ताजा बयान ने फिलहाल इस संभावना पर विराम लगा दिया है।

शराबबंदी कानून से महिलाओं को फायदा: JDU

JDU लंबे समय से शराबबंदी को सामाजिक सुधार से जोड़कर देखता रहा है। पार्टी का तर्क है कि शराब की उपलब्धता कम होने से परिवारों और विशेष रूप से ग्रामीण महिलाओं के जीवन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है।

नीरज कुमार ने भी इसी पहलू को प्रमुखता से उठाया। उनके मुताबिक, शराबबंदी के कारण महिलाओं की सामाजिक और पारिवारिक स्थिति में बदलाव आया है।

JDU का यह भी कहना है कि शराबबंदी केवल राजस्व से जुड़ा विषय नहीं है, बल्कि इसका संबंध सामाजिक व्यवस्था और परिवारों की आर्थिक स्थिति से भी है।

यही वजह है कि पार्टी कानून को समाप्त करने या उसकी व्यापक समीक्षा के पक्ष में नहीं दिख रही है।

रिपोर्ट में राजस्व नुकसान का दावा

दूसरी तरफ शराबबंदी को लेकर आर्थिक पहलू भी लगातार चर्चा में है। एक हालिया शोधपत्र में दावा किया गया है कि शराब पर प्रतिबंध का असर बिहार के राजस्व पर पड़ा है।

राष्ट्रीय अनुप्रयुक्त आर्थिक अनुसंधान परिषद (NCAER) के शोधपत्र ‘मैक्रो पर्सपेक्टिव ऑफ बिहार्स डेवलपमेंट अचीवमेंट्स: अनफिनिश्ड एजेंडा एंड द वे फॉरवर्ड’ में शराबबंदी से जुड़े आर्थिक प्रभावों पर चर्चा की गई है।

रिपोर्ट के मुताबिक, अगर शराबबंदी हटाई जाती है तो राज्य के राजस्व में करीब 14 से 15 प्रतिशत तक की वृद्धि की संभावना हो सकती है। शोध में शराब के अवैध कारोबार और वैकल्पिक नशीले पदार्थों के इस्तेमाल से जुड़ी चुनौतियों का भी उल्लेख किया गया है।

हालांकि, यह अध्ययन शराबबंदी खत्म करने का सरकारी फैसला नहीं है। यह एक आर्थिक अध्ययन में सामने आया आकलन है, जबकि राज्य सरकार की नीति फिलहाल शराबबंदी जारी रखने की है।

विपक्ष ने भी उठाए क्रियान्वयन पर सवाल

शराबबंदी को लेकर विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया भी सामने आई है। राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेता भाई वीरेंद्र ने भी कानून के क्रियान्वयन को लेकर सवाल उठाए।

उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी शराबबंदी के सिद्धांत के खिलाफ नहीं है। हालांकि, उनका आरोप है कि प्रतिबंध के बावजूद राज्य में शराब की अवैध बिक्री जारी है।

उनका कहना है कि शराबबंदी लागू होने के बाद इसके प्रभावी क्रियान्वयन पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है।

इस तरह शराबबंदी के मुद्दे पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के कुछ नेताओं की आलोचना कानून को खत्म करने के बजाय उसके बेहतर क्रियान्वयन पर केंद्रित दिखाई देती है।

आगे क्या होगा शराबबंदी का भविष्य?

JDU के स्पष्ट रुख के बाद फिलहाल बिहार में शराबबंदी कानून को खत्म करने या उसकी व्यापक समीक्षा की संभावना कम दिखाई दे रही है।

हालांकि, मांझी की मांग और आर्थिक शोध में सामने आए आंकड़ों ने इस मुद्दे पर नई बहस जरूर शुरू कर दी है। एक तरफ सरकार और JDU सामाजिक प्रभावों को आधार बनाकर शराबबंदी के समर्थन में हैं, वहीं दूसरी तरफ इसके क्रियान्वयन, अवैध कारोबार और राजस्व नुकसान को लेकर सवाल उठते रहे हैं।

आने वाले समय में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती शराबबंदी को बनाए रखते हुए इसके प्रभावी क्रियान्वयन को सुनिश्चित करना होगी।

फिलहाल JDU का संदेश साफ है—बिहार में शराबबंदी खत्म करने या इसकी समीक्षा करने का कोई सवाल नहीं है।

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