1947 में भारत का खजाना: आजादी के वक्त देश के पास कितने रुपये थे?

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 15 अगस्त 2026 को हमारा देश अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मनाने जा रहा है। इस खास मौके पर हर हिंदुस्तानी के मन में यह सवाल जरूर आता है कि 1947 में भारत की अर्थव्यवस्था कैसी थी? जब अंग्रेजों ने देश छोड़ा, तब सरकारी खजाने में कितने पैसे बचे थे?

आज हमारा देश दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक ताकतों में गिना जाता है। लेकिन 1947 में भारत की अर्थव्यवस्था बेहद कमजोर, चुनौतीपूर्ण और संघर्षों से भरी थी। आइए जानते हैं आजाद भारत के पहले बजट, देश के खजाने और उस मुश्किल दौर की पूरी प्रामाणिक कहानी।

Featured Snippet: आजाद भारत के पहले बजट की मुख्य बातें

  • बजट पेश करने की तारीख: 26 नवंबर 1947

  • पहले वित्त मंत्री: आर.के. षण्मुखम चेट्टी

  • कुल अनुमानित आय: 171.15 करोड़ रुपये

  • कुल अनुमानित खर्च: 197.39 करोड़ रुपये

  • रक्षा बजट: 92.74 करोड़ रुपये

  • राजकोषीय घाटा: 24.59 करोड़ रुपये

1947 में भारत का खजाना: देश के पास कितने रुपये थे?

15 अगस्त 1947 को जब देश आजाद हुआ, तब पूरे देश में जश्न का माहौल था। लेकिन नई सरकार के सामने देश चलाने की बहुत बड़ी चुनौती खड़ी थी।

आजादी के वक्त भारत के पास मौजूद कुल सरकारी नकदी या खजाने की कोई एक स्पष्ट संख्या मौजूद नहीं थी। इसे आज के आधुनिक बजट की तरह एक आंकड़े में नहीं बताया जा सकता।

इसका सबसे बड़ा कारण देश का विभाजन था। उस समय ब्रिटिश भारत की संपत्तियों, देनदारियों और नकदी का बंटवारा भारत और पाकिस्तान के बीच किया जा रहा था।

इसलिए आजाद भारत की असली आर्थिक स्थिति का अंदाजा उसके पहले केंद्रीय बजट से ही लगाया जाता है। आज जो अर्थव्यवस्था लाखों करोड़ रुपये की है, उस वक्त उसका पूरा बजट महज कुछ सौ करोड़ रुपये तक सीमित था।

आजाद भारत का पहला बजट कब और किसने पेश किया?

इतिहास के पन्नों को पलटें तो भारत में पहली बार बजट 7 अप्रैल 1860 को पेश हुआ था। यह बजट ब्रिटिश शासन के दौरान तत्कालीन वित्त मंत्री जेम्स विल्सन ने पेश किया था। हालांकि, उसका मकसद सिर्फ ब्रिटिश राज का फायदा कराना था।

आजाद भारत का पहला केंद्रीय बजट 26 नवंबर 1947 को लोकसभा में पेश किया गया। इसे देश के पहले वित्त मंत्री आर.के. षण्मुखम चेट्टी ने देश के सामने रखा था।

यह बजट पूरे साल का नहीं, बल्कि केवल साढ़े सात महीने का था। इसके बाद देश का अगला पूर्ण बजट 1 अप्रैल 1948 से लागू होना था। पहले बजट में बुनियादी जरूरतों और देश के नवनिर्माण पर सबसे ज्यादा जोर दिया गया।

महज 171 करोड़ की कमाई और खर्च ज्यादा

आजाद भारत का पहला बजट तत्कालीन आर्थिक तंगी की साफ तस्वीर पेश करता है। सरकार ने उस समय कुल 171.15 करोड़ रुपये की राजस्व आय का अनुमान लगाया था।

कमाई के मुकाबले देश का खर्च काफी ज्यादा था। सरकार का अनुमानित खर्च 197.39 करोड़ रुपये तय किया गया था।

यानी आजाद भारत के पहले बजट की शुरुआत ही घाटे से हुई थी। सरकार को उस समय करीब 26.24 करोड़ रुपये के राजस्व घाटे (जिसमें राजकोषीय घाटा 24.59 करोड़ था) का सामना करना पड़ रहा था।

रक्षा पर खर्च हुआ था बजट का आधा हिस्सा

देश का विभाजन कोई सामान्य घटना नहीं थी। सीमाओं पर तनाव था और देश के अंदर व्यापक दंगे भड़के हुए थे। लाखों शरणार्थी अपनी जान बचाकर भारत आ रहे थे।

ऐसे में नई सीमाओं की सुरक्षा और प्रशासन का पुनर्गठन सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकता बन गया। यही वजह है कि पहले बजट में डिफेंस (रक्षा) सेक्टर पर सबसे ज्यादा फोकस रखा गया।

उस दौर में रक्षा क्षेत्र के लिए 92.74 करोड़ रुपये का बजट रखा गया। यह रकम उस समय के कुल खर्च का करीब 46 से 50 प्रतिशत हिस्सा थी।

खेती थी देश की रीढ़, लेकिन हालात थे खराब

1947 का भारत आज के सर्विस सेक्टर और मैन्युफैक्चरिंग वाले आधुनिक भारत से बिल्कुल अलग था। उस वक्त देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से कृषि पर निर्भर थी।

करोड़ों भारतीयों की रोजी-रोटी सीधे तौर पर खेती से जुड़ी थी। ग्रामीण अर्थव्यवस्था ही देश की आर्थिक गतिविधियों का मुख्य आधार थी।

लेकिन खेती की हालत बहुत खराब थी। कृषि उत्पादकता काफी कम थी और सिंचाई की सुविधाएं ना के बराबर थीं। किसान पूरी तरह से मानसून पर निर्भर थे।

इसका सीधा असर देश के खाद्यान्न उत्पादन पर पड़ता था। इसलिए आजादी के तुरंत बाद नई सरकार के सामने खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना एक बहुत बड़ी चुनौती बन गई थी।

घाटे से शुरू हुआ सफर, आज बनी दुनिया की ताकत

विभाजन के दर्द और भारी आर्थिक दबाव के बीच पहले बजट में राजस्व का सही अनुमान लगाना भी मुश्किल था। खुद वित्त मंत्री ने अपने भाषण में इस बात का जिक्र किया था।

1947 में भारत भले ही आर्थिक रूप से कमजोर था, लेकिन उसके पास विशाल मानव संसाधन और प्राकृतिक संपदा थी। देश ने एक मजबूत लोकतांत्रिक राजनीतिक ढांचा अपनाया।

धीरे-धीरे देश में हरित क्रांति आई, जिससे अनाज की कमी दूर हुई। इसके बाद उद्योगों का जाल बिछा और हाल के दशकों में सर्विस सेक्टर ने बंपर उड़ान भरी।

जिस देश ने कुछ सौ करोड़ रुपये के घाटे वाले बजट से अपना सफर शुरू किया था, आज वह दुनिया की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में मजबूती से खड़ा है। यह सफर हर भारतीय के लिए गर्व की बात है।

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