दिवाली के दीयों से छठ के मिट्टी के हाथी तक, जानिए खास महत्व

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दिवाली के दीयों से छठ के मिट्टी के हाथी तक, जानिए खास महत्व

दिवाली और महापर्व छठ की तैयारियों के बीच मिट्टी से बनी पारंपरिक वस्तुओं की मांग बढ़ने लगी है। दिवाली में मिट्टी के दीये जलाने की परंपरा है, वहीं छठ पूजा में मिट्टी के हाथी का भी विशेष महत्व माना जाता है। इन दोनों पर्वों में मिट्टी के दीये और हाथी केवल पूजा की सामग्री नहीं, बल्कि लोक परंपरा, आस्था और ग्रामीण कारीगरों की आजीविका से भी जुड़े हैं।

बिहार के शिवहर जिले के रसीदपुर गांव में कुम्हार परिवार इन पर्वों के लिए काफी पहले से तैयारी कर रहे हैं। कुम्हार बिंदेश्वर पंडित के अनुसार, उनका परिवार पुश्तैनी काम के तहत मिट्टी के दीये और छठ पूजा के लिए मिट्टी के हाथी तैयार करता है। त्योहारों के मौसम में इन पारंपरिक वस्तुओं की मांग से कुम्हारों को रोजगार और आमदनी का अवसर मिलता है।

दिवाली में क्यों जलाए जाते हैं मिट्टी के दीये?

दिवाली को दीपों का त्योहार कहा जाता है। इस दिन घरों, मंदिरों, आंगन और दरवाजों पर मिट्टी के दीये जलाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, दीपक अंधकार पर प्रकाश और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है।

मिट्टी का दीया जलाने को शुभ माना जाता है। मान्यता है कि दीपक की रोशनी से घर में सकारात्मकता, सुख-समृद्धि और शांति आती है। दिवाली पर माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा के दौरान भी दीपक जलाए जाते हैं।

कुम्हार बिंदेश्वर पंडित बताते हैं कि मिट्टी के दीये हमारी परंपरा और प्रकृति से जुड़ाव का प्रतीक हैं। प्लास्टिक और इलेक्ट्रॉनिक सजावटी लाइटों के मुकाबले मिट्टी के दीये प्राकृतिक सामग्री से बनते हैं। इस्तेमाल के बाद मिट्टी का दीया आसानी से प्रकृति में मिल सकता है, हालांकि पर्यावरण पर इसका वास्तविक प्रभाव इस्तेमाल और निपटान के तरीके पर भी निर्भर करता है।

मिट्टी के दीये खरीदने से कुम्हारों को मिलता है रोजगार

त्योहारों के समय मिट्टी के दीयों की बिक्री से कुम्हार परिवारों को अच्छी आमदनी की उम्मीद रहती है। सालभर मिट्टी के बर्तन और दूसरी उपयोगी वस्तुएं बनाने वाले कारीगर दिवाली से पहले दीये तैयार करने में जुट जाते हैं।

दीया बनाने की प्रक्रिया में मिट्टी को तैयार करना, उसे आकार देना, सुखाना और जरूरत के अनुसार पकाना शामिल होता है। इसके बाद कारीगर बाजार में बिक्री के लिए दीये पहुंचाते हैं।

मशीन से बनने वाली सजावटी वस्तुओं और बाजार में उपलब्ध इलेक्ट्रॉनिक लाइटों के बीच पारंपरिक दीयों की अपनी अलग पहचान है। स्थानीय कुम्हारों से दीये खरीदने पर उनकी मेहनत को उचित बाजार मिलता है और ग्रामीण कारीगरी की परंपरा भी आगे बढ़ती है।

शास्त्रों और मान्यताओं में मिट्टी के दीपक का महत्व

धार्मिक मान्यताओं में मिट्टी के दीपक को पंचतत्वों से जोड़कर देखा जाता है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश को जीवन के पांच मूल तत्व माना गया है। मिट्टी का दीपक पृथ्वी तत्व का प्रतीक है, जबकि उसमें डाला गया तेल या घी और जलती हुई लौ पूजा की परंपरा में विशेष स्थान रखते हैं।

ज्योतिषीय मान्यताओं में मिट्टी को मंगल ग्रह और तेल या घी को शनि से जोड़कर भी देखा जाता है। हालांकि, ये धार्मिक और ज्योतिषीय विश्वास हैं, वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं।

कई लोग दीया जलाने से पहले उसे पानी में भिगोते हैं। इससे मिट्टी की सौंधी खुशबू महसूस होती है। यह खुशबू और दीपक की हल्की रोशनी त्योहार के माहौल को खास बना देती है।

छठ महापर्व में मिट्टी के हाथी की क्या है मान्यता?

दिवाली के बाद लोक आस्था के महापर्व छठ में मिट्टी से बनी एक और पारंपरिक वस्तु का महत्व बढ़ जाता है। यह है मिट्टी का हाथी। कुम्हार बिंदेश्वर पंडित के अनुसार, छठ पूजा में मिट्टी के हाथी को श्रद्धा और आस्था के साथ पूजा में शामिल किया जाता है।

स्थानीय मान्यता के अनुसार, जब कोई श्रद्धालु छठी मैया से मन्नत मांगता है और उसकी मनोकामना पूरी हो जाती है, तो वह आभार प्रकट करने के लिए मिट्टी का हाथी चढ़ाता है।

हाथी को शक्ति, समृद्धि, शुभता और संतान की लंबी उम्र का प्रतीक माना जाता है। हालांकि, मिट्टी का हाथी चढ़ाने की परंपरा अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में अलग रूप में निभाई जा सकती है।

छठ में कैसे निभाई जाती है मिट्टी के हाथी और कोसी की परंपरा?

छठ पूजा के दौरान कोसी भरने की परंपरा कई परिवारों में विशेष श्रद्धा के साथ निभाई जाती है। चार दिनों तक चलने वाले इस महापर्व के तीसरे दिन, यानी संध्या अर्घ्य के बाद, श्रद्धालु अपने घर के आंगन, छत या दरवाजे पर कोसी की तैयारी करते हैं।

स्थानीय परंपरा के अनुसार, इस दौरान गन्ने और लाल कपड़े से मंडप जैसा स्थान बनाया जाता है। इसके नीचे मिट्टी का हाथी रखा जाता है और उसकी पूजा की जाती है। हाथी पर सिंदूर लगाया जाता है।

इसके बाद कलश और पूजा सामग्री रखी जाती है। कलश में ठेकुआ, फल और अन्य प्रसाद शामिल किए जाते हैं। गन्ना, दीपक और दूसरे पूजा के सामान से कोसी की सजावट की जाती है।

अगले दिन सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य देने के समय घाट पर भी पूजा की परंपरा निभाई जाती है। स्थानीय रीति के अनुसार, पूजा पूरी होने के बाद मिट्टी के हाथी का विसर्जन किया जाता है। इस परंपरा में परिवार के सदस्य मिलकर पूजा करते हैं और छठी मैया के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं।

मिट्टी की परंपरा से जुड़ी है आस्था और कारीगरों की आजीविका

दिवाली के मिट्टी के दीये हों या छठ के मिट्टी के हाथी, दोनों पर्वों में इनका महत्व केवल धार्मिक मान्यताओं तक सीमित नहीं है। ये ग्रामीण संस्कृति, पारंपरिक हुनर और स्थानीय कारीगरों की मेहनत को भी सामने लाते हैं।

रसीदपुर के कुम्हार बिंदेश्वर पंडित जैसे कारीगर पीढ़ियों से इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। त्योहारों के दौरान मिट्टी की वस्तुओं की मांग उनके परिवारों के लिए रोजगार का महत्वपूर्ण अवसर बनती है।

इसलिए दिवाली पर मिट्टी के दीये और छठ पर पारंपरिक मिट्टी के हाथी खरीदना स्थानीय कारीगरों का सहयोग करने का भी एक तरीका है। आधुनिक सजावट के दौर में इन परंपराओं को बनाए रखना हमारी लोक संस्कृति और विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने में मदद कर सकता है।

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