शिवहर में शैल बाबू के दरबार का काली मंदिर, जहां शिव-शक्ति का दिखता है अनोखा संगम

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शिवहर में शैल बाबू के दरबार का काली मंदिर, जहां शिव-शक्ति का दिखता है अनोखा संगम

बिहार के शिवहर शहर में स्थित शैल बाबू का काली मंदिर नवरात्रि के दौरान श्रद्धा और आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। कमलेश्वरी नन्दन सिंह उर्फ शैल बाबू के दरबार में स्थापित मां काली की विशेष धातु से बनी प्रतिमा की सुबह-शाम पूजा होती है। शैल बाबू का काली मंदिर शिव और शक्ति के अनोखे संगम के रूप में जाना जाता है। यहां प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। मंदिर से जुड़ी कई स्थानीय मान्यताएं भी लोगों की आस्था को मजबूत करती हैं।

नवरात्रि के अवसर पर मंदिर में विशेष पूजा, मंत्रोच्चार और मां के श्रृंगार की परंपरा निभाई जाती है। मंदिर से जुड़े लोगों के अनुसार, यहां एक हजार बेलपत्र अर्पित कर पूजा की जाती है। धनतेरस के दिन यह संख्या 1,100 तक पहुंच जाती है।

शैल बाबू के दरबार में मां काली की विशेष पूजा

शिवहर शहर के बीचोंबीच स्थित इस मंदिर में नवरात्रि के दौरान विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं। मां काली की प्रतिमा का विधि-विधान से पूजन किया जाता है और भक्त मां के दर्शन कर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

मंदिर से जुड़ी जानकारी के मुताबिक, भारत सरकार के एडिशनल सॉलिसिटर जनरल और पटना हाई कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. कृष्ण नंदन सिंह प्रत्येक वर्ष मां काली की विशेष पूजा करते हैं। वह सुबह और शाम मंदिर में पूजा-अर्चना करते हैं।

मंदिर में पूजा के लिए बेलपत्र का विशेष महत्व बताया जाता है। प्रतिदिन बड़ी संख्या में बेलपत्र अर्पित करने की परंपरा के कारण परिसर में बेल के पेड़ों को भी महत्व दिया जाता है।

एक हजार बेलपत्र से होती है आराधना

मंदिर की प्रमुख परंपराओं में मां काली को बड़ी संख्या में बेलपत्र अर्पित करना शामिल है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, सुबह और शाम की पूजा में एक हजार बेलपत्र चढ़ाए जाते हैं। धनतेरस के दिन 1,100 बेलपत्र गिनकर अर्पित करने की परंपरा है।

मंदिर परिसर में पहले सात बेलपत्र के पेड़ थे। इस बार श्रद्धालुओं की जरूरत और पूजा की परंपरा को ध्यान में रखते हुए तीन नए बेलपत्र के पेड़ भी लगाए गए हैं।

बेलपत्र का धार्मिक महत्व हिंदू परंपरा में विशेष रूप से भगवान शिव की पूजा से जुड़ा है। इसी वजह से मंदिर में शिव और शक्ति के संगम की चर्चा होती है। हालांकि, यहां निभाई जाने वाली पूजा की विशिष्ट परंपराओं का विस्तृत इतिहास उपलब्ध नहीं है।

मंदिर में सांपों की मौजूदगी और कौवे से जुड़ी मान्यता

शैल बाबू के दरबार स्थित काली मंदिर के बारे में स्थानीय स्तर पर कई रोचक बातें बताई जाती हैं। मंदिर से जुड़े लोगों का कहना है कि परिसर में सांप दिखाई देते हैं और वे अक्सर परिक्रमा करते नजर आते हैं। उनके मुताबिक, इन सांपों ने वहां पूजा करने वाले पुजारियों को नुकसान नहीं पहुंचाया है।

इसके अलावा, मंदिर परिसर में कौवे को बेलपत्र तोड़ते हुए देखने की बात भी कही जाती है। इन घटनाओं को श्रद्धालु अपनी आस्था और मंदिर की विशिष्टता से जोड़कर देखते हैं।

हालांकि, इन बातों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। इसलिए इन्हें स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं से जुड़ी मान्यताओं के रूप में ही देखा जाना चाहिए। सांप वन्यजीव हैं, इसलिए उनके दिखाई देने पर दूरी बनाए रखना और प्रशिक्षित विशेषज्ञों की मदद लेना जरूरी है।

नवरात्रि, सप्तमी और दशमी तक विशेष आयोजन

नवरात्रि के दौरान मंदिर में पूजा का विशेष महत्व रहता है। जानकारी के अनुसार, सप्तमी के दिन मां काली का विशेष आभूषणों से श्रृंगार किया जाता है। इसके बाद दशमी तक भव्य पूजा-अर्चना की जाती है।

इस दौरान भक्त मां के दर्शन करने, प्रसाद चढ़ाने और अपनी मनोकामनाओं के लिए प्रार्थना करने पहुंचते हैं। मंदिर में चार पुजारियों के रहने और नियमित पूजा करने की जानकारी भी दी गई है।

नवरात्रि में देवी के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है। पंचमी तिथि पर मां दुर्गा के पांचवें स्वरूप मां स्कंदमाता की आराधना होती है। इस स्वरूप में मां अपने पुत्र भगवान स्कंद यानी कार्तिकेय के साथ जुड़ी मातृत्व शक्ति का प्रतीक हैं।

मां स्कंदमाता को कमल पर विराजमान और सिंह पर सवार दिखाया जाता है। परंपरा के अनुसार, इस दिन केले या केले से बने प्रसाद का भोग लगाया जाता है। भक्त सुख, शांति, समृद्धि और संतान के कल्याण की कामना करते हैं।

श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है काली मंदिर

मंदिर में आने वाले श्रद्धालु मां काली के प्रति अपनी गहरी आस्था व्यक्त करते हैं। शिवहर के जय माता इलेक्ट्रॉनिक्स, थाना रोड के प्रोपराइटर संजय चौधरी के अनुसार, शैल बाबू के दरबार में स्थित मां काली के मंदिर की महिमा श्रद्धालुओं के बीच विशेष रूप से मानी जाती है। उन्होंने मां के दर्शन को अपने लिए सौभाग्य की बात बताया।

स्थानीय मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई मन्नत पूरी होती है। इसी विश्वास के कारण नवरात्रि, धनतेरस और दीपावली जैसे अवसरों पर दूर-दराज से भी श्रद्धालु मंदिर पहुंचते हैं। हालांकि, मनोकामनाएं पूरी होने से जुड़ी बातें व्यक्तिगत धार्मिक आस्था का विषय हैं।

मंदिर की पहचान केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है। यहां बेलपत्र अर्पित करने की परंपरा, विशेष श्रृंगार और स्थानीय लोगों की धार्मिक मान्यताएं मिलकर इसे शिवहर की धार्मिक संस्कृति का हिस्सा बनाती हैं।

शिवहर की धार्मिक पहचान में मंदिर का विशेष स्थान

शिवहर बिहार का एक छोटा जिला है, लेकिन यहां के स्थानीय धार्मिक स्थल लोगों की सांस्कृतिक और सामाजिक परंपराओं से जुड़े हुए हैं। शैल बाबू के दरबार का काली मंदिर भी ऐसा ही एक स्थान है, जहां नवरात्रि के दौरान भक्तों की आस्था विशेष रूप से दिखाई देती है।

मां काली की पूजा के साथ भगवान शिव से जुड़े बेलपत्र का महत्व इस मंदिर को श्रद्धालुओं के लिए खास बनाता है। सुबह-शाम की आराधना और त्योहारों पर होने वाले विशेष आयोजन इसकी धार्मिक परंपरा को आगे बढ़ाते हैं।

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