दशहरा पर शिवहर में दिखी मिथिला की अनोखी परंपरा, सिर पर घड़ा रख झूमीं बेटियां
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👉 WhatsApp से जुड़ेंबिहार के शिवहर में दशहरा के मौके पर मिथिला की पारंपरिक लोकसंस्कृति की खूबसूरत झलक देखने को मिली। यहां झिझिया नृत्य के पारंपरिक गीतों पर छोटी-छोटी बच्चियां झूमती नजर आईं। सिर पर घड़ा रखकर लोकगीत गाती बेटियों ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया और त्योहार के माहौल को खास बना दिया। झिझिया नृत्य मिथिला की उन लोकपरंपराओं में शामिल है, जो नवरात्र और दशहरा के दौरान भक्ति, लोकविश्वास और सामुदायिक उत्साह को एक साथ जोड़ती हैं।
शिवहर में पेट्रोल पंप के पास एक मिठाई की दुकान के सामने बच्चियों ने पारंपरिक झिझिया गीत गाते हुए नृत्य किया। उनके गीतों और अंदाज में मिथिला की लोकभाषा, संस्कृति और पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा की झलक दिखाई दी।
दशहरा पर शिवहर में जीवंत हुई मिथिला की लोकसंस्कृति
दशहरा केवल रावण दहन या धार्मिक आयोजनों तक सीमित नहीं है। बिहार के अलग-अलग क्षेत्रों में इस पर्व के दौरान लोकगीत, पारंपरिक नृत्य और सामुदायिक आयोजन भी देखने को मिलते हैं। मिथिला क्षेत्र में झिझिया ऐसा ही एक लोकनृत्य है, जिसकी अपनी विशिष्ट पहचान है।
शिवहर में बच्चियों का झिझिया गीत गाते हुए नृत्य करना इसी सांस्कृतिक विरासत की याद दिलाता है। स्थानीय स्तर पर ऐसे आयोजन नई पीढ़ी को अपनी भाषा, लोकगीत और परंपराओं से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
पारंपरिक गीतों की धुन पर सिर पर घड़ा संतुलित करते हुए नृत्य करना इस लोककला को खास बनाता है। इसमें लय, संतुलन और सामूहिक भागीदारी का सुंदर मेल देखने को मिलता है।
माछ मारs गेले डयनियाँ बाबा के पोखरिया
माछ मारs गेले डयनियाँ बाबा के पोखरिया
मारि लैले कतरी मछरिया गे
चल चल गे डयनियाँ ब्रहम तर
तोरा बेटा के खयबऊ ब्रहम तर
क्या है झिझिया नृत्य और क्यों मनाया जाता है?
झिझिया बिहार के मिथिला क्षेत्र और नेपाल के कुछ इलाकों में प्रचलित पारंपरिक लोकनृत्य है। इसे विशेष रूप से नवरात्र और दशहरा के समय महिलाओं तथा लड़कियों के समूहों द्वारा किया जाता है। इस परंपरा में देवी दुर्गा की आराधना, लोकगीत और पारंपरिक मान्यताएं प्रमुख भूमिका निभाती हैं।
झिझिया में आम तौर पर मिट्टी के ऐसे घड़े का इस्तेमाल किया जाता है, जिसमें छोटे-छोटे छेद बने होते हैं। परंपरागत रूप से घड़े के भीतर दीपक रखा जाता है और नृत्य करने वाली महिलाएं या लड़कियां उसे सिर पर संतुलित करके गीतों की लय पर नृत्य करती हैं।
घड़े के छेदों से छनकर निकलने वाली रोशनी इस नृत्य को अलग पहचान देती है। हालांकि, अलग-अलग गांवों और समुदायों में झिझिया की शैली, गीत और आयोजन के तरीके में अंतर हो सकता है।
लोकविश्वास में बुरी शक्तियों से रक्षा का प्रतीक
झिझिया केवल मनोरंजन या नृत्य की परंपरा नहीं है, बल्कि इससे कई लोकविश्वास भी जुड़े हैं। पारंपरिक मान्यताओं में इसे बुरी नजर, नकारात्मक शक्तियों और अनिष्ट से रक्षा का प्रतीक माना जाता है।
कुछ लोककथाओं में यह विश्वास मिलता है कि घड़े के छेदों को गिनने से जुड़ी मान्यता नृत्य करने वाली महिलाओं को बुरी शक्तियों से बचाने की धारणा से संबंधित है। दीपक की रोशनी को भी शुभता और सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है।
ये बातें लोकपरंपरा और सांस्कृतिक विश्वासों का हिस्सा हैं। इन्हें वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही मान्यताओं के रूप में समझना चाहिए। यही लोकविश्वास झिझिया के गीतों और प्रस्तुतियों को विशिष्ट सांस्कृतिक अर्थ देते हैं।
झिझिया गीतों में सुनाई देती है मिथिला की अपनी बोली
शिवहर में बच्चियों ने पारंपरिक झिझिया गीत गाकर इस लोककला की जीवंतता दिखाई। गीतों में स्थानीय बोली और लोकजीवन की झलक मिलती है। इनके शब्दों में ग्रामीण परिवेश, लोककथाओं और परंपरागत मान्यताओं का प्रभाव दिखाई देता है।
स्थानीय समाचार में उद्धृत गीत की पंक्तियां मिथिला क्षेत्र की मौखिक लोकपरंपरा का उदाहरण हैं। ऐसे गीत लिखित साहित्य से अलग, लोगों की स्मृति और सामूहिक गायन के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ते हैं।
इन गीतों को सीखने और गाने से बच्चों का अपनी मातृभाषा तथा क्षेत्रीय संस्कृति से जुड़ाव मजबूत होता है। यही कारण है कि पारंपरिक लोकगीत आज भी गांवों और छोटे कस्बों के त्योहारों में अपनी जगह बनाए हुए हैं।
बच्चियों की भागीदारी से आगे बढ़ेगी परंपरा
लोकसंस्कृति तभी जीवित रहती है, जब नई पीढ़ी उसे अपनाती है। शिवहर में छोटी बच्चियों द्वारा झिझिया गीत गाना और नृत्य करना इसी दिशा में एक सुंदर उदाहरण है।
आज मनोरंजन के आधुनिक साधनों के बीच कई पारंपरिक लोककलाओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाना चुनौती बन गया है। ऐसे में स्थानीय आयोजनों, स्कूलों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और त्योहारों में लोकगीतों को स्थान देना जरूरी है।
झिझिया जैसी परंपराओं को बढ़ावा देने से बच्चों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों को समझने का अवसर मिलता है। साथ ही, स्थानीय कलाकारों और लोकगीतों से जुड़े लोगों की भूमिका भी सामने आती है।
मिथिला की सांस्कृतिक पहचान है झिझिया
मिथिला की पहचान उसकी भाषा, साहित्य, चित्रकला, लोकगीतों और पारंपरिक उत्सवों से बनती है। झिझिया इस विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसमें धार्मिक आस्था के साथ सामूहिक भागीदारी, संगीत और लोकविश्वास का मेल देखने को मिलता है।
शिवहर में दशहरा के अवसर पर बच्चियों की प्रस्तुति ने दिखाया कि स्थानीय स्तर पर ऐसी परंपराएं आज भी लोगों को आकर्षित करती हैं। इनका संरक्षण केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि लोकगीतों का दस्तावेजीकरण, वरिष्ठ कलाकारों से सीखना और बच्चों को प्रशिक्षण देना भी जरूरी है।
