भूमिहार ब्राह्मण को लेकर बिहार में फिर सियासत गरम, 29 नेताओं ने लिखी चिट्ठी
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बिहार में भूमिहार ब्राह्मण जाति को लेकर एक बार फिर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। भूमिहार ब्राह्मण पहचान को सरकारी रिकॉर्ड में केवल ‘भूमिहार’ किए जाने का आरोप लगाते हुए सत्तापक्ष और विपक्ष के 29 जनप्रतिनिधियों ने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को पत्र लिखा है। इनमें 21 विधायक और 8 विधान पार्षद शामिल बताए गए हैं।
जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि सामान्य प्रशासन विभाग की प्रक्रिया में गड़बड़ी के कारण सरकारी रिकॉर्ड में ‘भूमिहार ब्राह्मण’ की जगह सिर्फ ‘भूमिहार’ दर्ज किया जा रहा है। नेताओं ने इस मामले में मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप की मांग की है।
29 जनप्रतिनिधियों ने मुख्यमंत्री को क्यों लिखी चिट्ठी?
बिहार में जातीय जनगणना के बाद जाति से जुड़े सरकारी रिकॉर्ड और प्रमाण-पत्रों को लेकर कई स्तर पर चर्चा हुई है। इसी क्रम में ‘भूमिहार ब्राह्मण’ को लेकर अब विधायकों और विधान पार्षदों ने अपनी आपत्ति मुख्यमंत्री के सामने रखी है।
पत्र लिखने वाले जनप्रतिनिधियों का कहना है कि उनकी जातीय पहचान ‘भूमिहार ब्राह्मण’ है, लेकिन कुछ सरकारी रिकॉर्ड में इसे बदलकर केवल ‘भूमिहार’ किया जा रहा है।
इन नेताओं ने इसे सामान्य प्रशासन विभाग से जुड़ी गड़बड़ी बताया है और रिकॉर्ड में आवश्यक सुधार की मांग की है। उनका कहना है कि पुराने दस्तावेजों और प्रमाणों में दर्ज जाति के आधार पर प्रमाण-पत्र जारी करने की व्यवस्था स्पष्ट होनी चाहिए।
प्रमाण-पत्र को लेकर क्या है जनप्रतिनिधियों की आपत्ति?
मुख्यमंत्री को भेजी गई चिट्ठी में जनप्रतिनिधियों ने दावा किया है कि कई मामलों में अंचल स्तर पर उपलब्ध पुराने दस्तावेजों को स्वीकार नहीं किया जा रहा है। उनके अनुसार, जहां दस्तावेजों में ‘भूमिहार ब्राह्मण’ दर्ज है, वहां भी ‘भूमिहार’ नाम से जाति प्रमाण-पत्र जारी किए जा रहे हैं।
जनप्रतिनिधियों का कहना है कि इससे परिवार के अलग-अलग सदस्यों के प्रमाण-पत्रों में जाति का उल्लेख अलग हो सकता है। उन्होंने इस स्थिति को विशेष रूप से दूसरे राज्यों में आरक्षण और दस्तावेज सत्यापन से जोड़कर चिंता जताई है।
पत्र में EWS आरक्षण से संबंधित दिक्कतों का भी उल्लेख किया गया है। हालांकि, इन दावों और प्रमाण-पत्र जारी करने की प्रक्रिया को लेकर अंतिम प्रशासनिक स्थिति संबंधित विभाग के आधिकारिक स्पष्टीकरण से ही स्पष्ट होगी।
1931 की जनगणना में क्या दर्ज था?
जनप्रतिनिधियों ने अपने पत्र में पुराने सरकारी रिकॉर्ड और ऐतिहासिक दस्तावेजों का भी हवाला दिया है। उनका दावा है कि 1931 की जनगणना, गजेटियर और खतियान जैसे दस्तावेजों में ‘भूमिहार ब्राह्मण’ नाम का उल्लेख मिलता है।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 1931 की जनगणना के दौरान अलग-अलग क्षेत्रों में भूमिहार समुदाय के लिए ‘भूमिहार’, ‘भूमिहार ब्राह्मण’ और ‘अयाचक ब्राह्मण’ जैसे नामों का इस्तेमाल किया गया था।
इसी ऐतिहासिक रिकॉर्ड को आधार बनाकर पत्र लिखने वाले नेताओं ने वर्तमान सरकारी रिकॉर्ड में जाति के नाम को लेकर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि पुराने दस्तावेजों में दर्ज पहचान को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
1931 में कितनी आबादी दर्ज हुई थी?
पत्र में दिए गए दावे के अनुसार, 1931 की जनगणना के दौरान ‘भूमिहार ब्राह्मण’ के नाम से 8.94 लाख की आबादी दर्ज की गई थी।
जनप्रतिनिधियों ने पुराने जनगणना रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा है कि उस समय समुदाय की सामाजिक और राजनीतिक संस्थाओं ने अपनी पहचान को ब्राह्मण वर्ग से जोड़कर दर्ज कराने का अभियान भी चलाया था।
हालांकि, ऐतिहासिक जनगणना के आंकड़ों और वर्तमान जातीय आबादी के बीच सीधी तुलना करते समय अलग-अलग जनगणना पद्धतियों और वर्गीकरण को ध्यान में रखना जरूरी है।
अलग-अलग दलों के नेता एक साथ आए
इस मुद्दे की खास बात यह है कि मुख्यमंत्री को पत्र लिखने वालों में अलग-अलग राजनीतिक दलों से जुड़े जनप्रतिनिधि शामिल हैं। जानकारी के अनुसार, बीजेपी, जेडीयू, आरजेडी, हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा और लोजपा-आर से जुड़े नेताओं ने पत्र पर अपनी बात रखी है।
यानी इस मामले में सत्तापक्ष और विपक्ष के जनप्रतिनिधि एक साझा मांग के साथ सामने आए हैं। 21 विधायकों और 8 विधान पार्षदों के पत्र के बाद यह मुद्दा राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया है।
पत्र में नेताओं ने मुख्यमंत्री से मामले की समीक्षा कराने और सरकारी रिकॉर्ड तथा जाति प्रमाण-पत्र से जुड़ी प्रक्रिया को स्पष्ट करने की मांग की है।
चिट्ठी लिखने वाले विधायकों में कौन-कौन शामिल हैं?
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, पत्र लिखने वाले विधायकों में विजय कुमार सिन्हा, अजीत कुमार, जिवेश कुमार, विशाल प्रशांत, बाबूलाल शौर्य, माधव आनंद, कुमार पुष्पंजय, सच्चिंद्र प्रसाद सिंह और शालिनी मिश्रा शामिल हैं।
इसके अलावा रोमित कुमार, ऋतुराज कुमार, कुंदन कुमार, पंकज कुमार मिश्रा, मनोज कुमार, रजनीश कुमार, नरेंद्र कुमार सिंह, रंजन कुमार, देवेश कांत सिंह, राहुल कुमार, अनंत कुमार सिंह और सिद्धार्थ सौरव के नाम भी बताए गए हैं।
कुल मिलाकर 21 विधायक और 8 विधान पार्षदों के इस पत्र ने बिहार में जातीय पहचान और सरकारी दस्तावेजों से जुड़े मुद्दे को फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है।
अब मुख्यमंत्री और विभाग के रुख पर नजर
जनप्रतिनिधियों की ओर से मुख्यमंत्री को पत्र भेजे जाने के बाद अब इस मामले में सरकार और सामान्य प्रशासन विभाग के रुख पर नजर रहेगी।
सबसे अहम सवाल यह है कि सरकारी रिकॉर्ड में जाति के नाम को लेकर उठाई गई आपत्तियों पर प्रशासन क्या स्पष्टीकरण देता है और प्रमाण-पत्र जारी करने की प्रक्रिया में किसी बदलाव की जरूरत महसूस करता है या नहीं।
फिलहाल, जनप्रतिनिधियों की मांग और उनके लगाए आरोप ही सार्वजनिक रूप से सामने आए हैं। प्रशासनिक स्तर से विस्तृत जवाब आने के बाद ही पूरे मामले की स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी।
