पटना में 1914 से जल रही अखंड ज्योति, किशनगंज का मंदिर-मस्जिद भाईचारा जीत रहा दिल

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पटना में 1914 से जल रही अखंड ज्योति, किशनगंज का मंदिर-मस्जिद भाईचारा जीत रहा दिल

बिहार की पहचान केवल उसके ऐतिहासिक स्थलों और धार्मिक परंपराओं से नहीं, बल्कि यहां की साझा संस्कृति से भी बनती है। पटना का अखंडवासिनी मंदिर वर्ष 1914 से जल रही अखंड ज्योति के लिए श्रद्धालुओं के बीच खास पहचान रखता है। वहीं, किशनगंज के बिशनपुर गांव में मंदिर और मस्जिद की निकटता आपसी सम्मान और भाईचारे की मिसाल के रूप में सामने आती है। अखंडवासिनी मंदिर की ज्योति आस्था की लंबी परंपरा को दर्शाती है, तो बिशनपुर की कहानी अलग-अलग धार्मिक परंपराओं के साथ रहने का संदेश देती है। 

पटना के अखंडवासिनी मंदिर में 1914 से जल रही ज्योति

राजधानी पटना में गोलघर के आसपास स्थित श्री अखंडवासिनी मंदिर अपनी अखंड ज्योति के लिए जाना जाता है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, जून 1914 में विश्वनाथ तिवारी असम के कामाख्या मंदिर से ज्योति लेकर पटना आए थे। उन्होंने गोलघर के पास अपने घर के एक कमरे में देवी दुर्गा के सामने इसे स्थापित किया था। समय के साथ यह स्थान श्रद्धालुओं के लिए पूजा-अर्चना का केंद्र बन गया। 

इस मंदिर की विशेषता यह है कि यहां दो दीपक जलाने की परंपरा है। रिपोर्टों के मुताबिक, एक दीपक सरसों के तेल से और दूसरा घी से जलाया जाता है। परिवार के सदस्य नियमित रूप से इन दीपकों में तेल और घी डालकर परंपरा को आगे बढ़ाते हैं। 

मंदिर में सालभर श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं, लेकिन नवरात्र के दौरान यहां भीड़ बढ़ जाती है। भक्त मां दुर्गा की पूजा करते हैं और अपनी मनोकामनाओं के लिए प्रार्थना करते हैं। श्रद्धालुओं की आस्था इस मंदिर को पटना के विशिष्ट धार्मिक स्थलों में स्थान देती है।

नवरात्र में उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़

नवरात्र के नौ दिनों में देवी दुर्गा की आराधना का विशेष महत्व होता है। इसी दौरान अखंडवासिनी मंदिर में भी दर्शन करने वालों की संख्या बढ़ जाती है। श्रद्धालु फूल, सिंदूर, नारियल और अन्य पूजा सामग्री लेकर मां के दर्शन करने पहुंचते हैं।

मंदिर की परंपरा को एक परिवार की कई पीढ़ियों ने संभाला है। लगातार दीपक जलाए रखने के लिए नियमित देखभाल जरूरी होती है। यही वजह है कि यहां की अखंड ज्योति केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही पारिवारिक सेवा और समर्पण की कहानी भी है। 

हालांकि, श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूरी होने से जुड़ी बातें धार्मिक विश्वास का हिस्सा हैं। इन्हें आस्था के रूप में ही समझना चाहिए।

किशनगंज का बिशनपुर गांव क्यों है खास?

किशनगंज जिले के बिशनपुर गांव की पहचान मंदिर और मस्जिद की निकटता तथा स्थानीय लोगों के बीच आपसी सद्भाव से जुड़ी बताई जाती है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, यहां दुर्गा मंदिर के पास ही मस्जिद है। दोनों धार्मिक स्थलों से होने वाली प्रार्थनाओं और धार्मिक गतिविधियों की आवाज आसपास तक पहुंचती है।

इस गांव की खासियत के रूप में यह बात सामने आती है कि धार्मिक पहचान अलग होने के बावजूद स्थानीय लोग एक-दूसरे की आस्था का सम्मान करते हैं। दुर्गा पूजा के अवसर पर मंदिर में पूजा होती है, जबकि मस्जिद में नमाज अदा की जाती है। दोनों परंपराओं का साथ-साथ चलना गांव की साझा सामाजिक जिंदगी का प्रतीक माना जाता है।

स्थानीय परंपरा से जुड़े विवरणों के मुताबिक, यहां दुर्गा पूजा की शुरुआत वर्ष 1969 में सीमित संसाधनों के बीच एक छोटे से फूस के घर में हुई थी। समय के साथ स्थानीय लोगों के सहयोग से मंदिर का विस्तार हुआ। इस इतिहास की स्वतंत्र पुष्टि सीमित है, इसलिए वर्ष और शुरुआती परिस्थितियों को स्थानीय विवरण के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

आरती और अजान के बीच आपसी सम्मान का संदेश

बिशनपुर की कहानी का मुख्य संदेश धार्मिक गतिविधियों की तुलना करना नहीं, बल्कि एक-दूसरे के प्रति सम्मान बनाए रखना है। आरती और अजान अलग-अलग धार्मिक परंपराओं का हिस्सा हैं। जब समुदाय एक-दूसरे की धार्मिक जरूरतों और भावनाओं का सम्मान करते हैं, तो साझा जीवन में सहयोग की जगह बनती है।

स्थानीय लोगों के बारे में दिए गए विवरण बताते हैं कि त्योहारों के दौरान आपसी सहयोग और सम्मान की परंपरा देखने को मिलती है। ऐसी मिसालें नई पीढ़ी को यह समझने में मदद कर सकती हैं कि विविधता के बावजूद गांव, मोहल्ले और शहर मिल-जुलकर आगे बढ़ सकते हैं।

सामाजिक सद्भाव केवल किसी मंदिर और मस्जिद के पास होने से नहीं बनता। इसके लिए रोजमर्रा के व्यवहार, संवाद, सहयोग और एक-दूसरे के अधिकारों के सम्मान की भी जरूरत होती है। बिशनपुर की कहानी इसी व्यापक संदेश की ओर ध्यान खींचती है।

बिहार की साझा संस्कृति की दो अलग पहचान

पटना का अखंडवासिनी मंदिर और किशनगंज का बिशनपुर गांव अलग-अलग कारणों से चर्चा में रहते हैं। पटना का मंदिर अपनी पुरानी अखंड ज्योति और पारिवारिक पूजा परंपरा के लिए जाना जाता है। दूसरी ओर, बिशनपुर को मंदिर और मस्जिद के पास-साथ होने तथा स्थानीय भाईचारे की कहानी के लिए याद किया जाता है।

इन दोनों उदाहरणों में एक समान बात है—लंबे समय से चली आ रही परंपराओं को स्थानीय लोग अपने जीवन का हिस्सा मानते हैं। एक स्थान पर धार्मिक आस्था दीपक की निरंतर देखभाल से जुड़ी है, जबकि दूसरे स्थान पर सामाजिक सौहार्द अलग-अलग समुदायों के आपसी व्यवहार में दिखाई देता है।

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