636 साल पुरानी शाही मस्जिद पर क्यों छिड़ा विवाद? जानें पूरा इतिहास
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👉 WhatsApp से जुड़ेंउज्जैन की शाही मस्जिद इन दिनों सड़क चौड़ीकरण को लेकर चर्चा में है। शाही मस्जिद के एक हिस्से को हटाने की योजना के विरोध में सोमवार को तनाव बढ़ा और पुलिस तथा प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प की स्थिति बनी। प्रशासन का कहना है कि सिंहस्थ 2028 की तैयारियों के तहत कंठाल चौराहे से गोपाल मंदिर मार्ग को 15 मीटर तक चौड़ा किया जाना है और मस्जिद का कुछ हिस्सा प्रस्तावित सड़क सीमा में आ रहा है। मस्जिद पक्ष इस कार्रवाई का विरोध कर रहा है।
मामला सिर्फ सड़क चौड़ीकरण तक सीमित नहीं है। मस्जिद की उम्र, पुराने दस्तावेज और पहले सड़क विकास के दौरान जमीन दिए जाने के दावे भी बहस का हिस्सा बन गए हैं।
कितनी पुरानी है उज्जैन की शाही मस्जिद?
शाही मस्जिद की वास्तविक उम्र को लेकर अलग-अलग दावे सामने आते हैं। मस्जिद कमेटी और इमाम की ओर से इसे 1390 में बना 636 साल पुराना ढांचा बताया गया है।
हालांकि, उपलब्ध न्यायिक रिपोर्ट में अदालत और प्रशासनिक रिकॉर्ड के आधार पर इसे 100 साल से अधिक पुराना ढांचा बताया गया है। इसलिए 636 वर्ष की उम्र को फिलहाल मस्जिद पक्ष के दावे के रूप में देखना जरूरी है, न कि निर्विवाद ऐतिहासिक तथ्य के रूप में।
मस्जिद पक्ष का कहना है कि पुराने दस्तावेज उसके लंबे इतिहास की ओर संकेत करते हैं। इसी आधार पर 1925 के दस्तावेज और 1985 के मध्य प्रदेश राजपत्र का उल्लेख किया जा रहा है।
1925 की चिट्ठी में क्या था?
मस्जिद से जुड़े पक्ष के अनुसार, 1925 में तत्कालीन ग्वालियर सरकार के टाउन इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट से जुड़े दस्तावेज में मस्जिद के बचे हुए हिस्से को सुरक्षित रखने का उल्लेख था।
यह दावा मौजूदा विवाद में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे मस्जिद पक्ष यह बताने की कोशिश कर रहा है कि पुराने समय में भी सड़क या शहरी विकास से जुड़े बदलावों के दौरान इस धार्मिक ढांचे के अस्तित्व को ध्यान में रखा गया था।
हालांकि, किसी ऐतिहासिक दावे की पुष्टि के लिए मूल दस्तावेज, उसका संदर्भ और आधिकारिक अभिलेखों की स्वतंत्र जांच जरूरी होती है। इसलिए 1925 के दस्तावेज को लेकर किए जा रहे दावों को उसी संदर्भ में समझना चाहिए।
1985 के राजपत्र में भी मस्जिद का जिक्र?
मस्जिद पक्ष ने 1985 के मध्य प्रदेश राजपत्र का भी हवाला दिया है। दावा है कि इसमें मस्जिद और उसके माप से जुड़ी जानकारी दर्ज है।
ऐतिहासिक इमारतों से जुड़े विवादों में ऐसे सरकारी रिकॉर्ड महत्वपूर्ण हो सकते हैं, क्योंकि उनसे किसी संरचना के अस्तित्व, स्थान या प्रशासनिक पहचान के बारे में जानकारी मिल सकती है।
लेकिन केवल किसी पुराने दस्तावेज में उल्लेख होना अपने आप में निर्माण वर्ष या 636 साल पुरानी उम्र का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। इसके लिए अलग-अलग ऐतिहासिक और प्रशासनिक स्रोतों का मिलान जरूरी होता है।
क्या मस्जिद ने पहले भी सड़क के लिए जमीन दी थी?
मस्जिद प्रतिनिधि कमेटी के दस्तावेजों के हवाले से यह दावा किया गया है कि 1961 में सड़क चौड़ीकरण के लिए करीब 20 फीट जमीन प्रशासन को दी गई थी।
मस्जिद पक्ष का कहना है कि अतीत में विकास कार्यों में सहयोग किया गया था और अब भी विवाद को इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए।
कमेटी का एक तर्क यह भी है कि मौजूदा इमारत का ढांचा पुराना है। उसके अनुसार, किसी एक हिस्से में बदलाव से संरचना की मजबूती प्रभावित हो सकती है।
हालांकि, 1961 में जमीन दिए जाने के दावे और उसके कानूनी रिकॉर्ड की पूरी पुष्टि के लिए संबंधित मूल दस्तावेजों को देखना आवश्यक है।
किसने बनवाई थी शाही मस्जिद?
मस्जिद के 1390 में निर्माण के दावे को मालवा के मध्यकालीन राजनीतिक इतिहास से जोड़ा जाता है। उस दौर में मालवा क्षेत्र में राजनीतिक बदलाव चल रहे थे और दिलावर खान गौरी का प्रभाव बढ़ रहा था।
बाद में 1401 में दिलावर खान गौरी ने स्वतंत्र मालवा सल्तनत की स्थापना की। इसी कारण 1390 के आसपास निर्माण के दावे को मालवा में गौरी प्रभाव के शुरुआती दौर से जोड़कर देखा जाता है।
लेकिन उपलब्ध सामग्री के आधार पर ऐसा स्पष्ट प्रमाण सामने नहीं आता जिससे यह निश्चित रूप से कहा जा सके कि शाही मस्जिद का निर्माण सीधे दिलावर खान गौरी ने कराया था। इसलिए इस हिस्से को भी ऐतिहासिक दावा ही माना जाना चाहिए।
सड़क चौड़ीकरण को लेकर विवाद क्यों बढ़ा?
उज्जैन नगर निगम की योजना के तहत कंठाल चौराहे से गोपाल मंदिर मार्ग को 15 मीटर चौड़ा करने की योजना है। प्रशासन ने इसे सिंहस्थ 2028 के दौरान बढ़ने वाली भीड़ और यातायात को देखते हुए जरूरी बताया है।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ ने 9 सितंबर को मस्जिद के हिस्से को हटाने की कार्रवाई के खिलाफ दायर दो याचिकाएं खारिज कर दी थीं। अदालत ने माना कि नगर निगम ने निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन किया और धार्मिक ढांचे को ही निशाना बनाए जाने की दलील स्वीकार नहीं की।
अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, इसी सड़क पर 10 मंदिरों और एक अन्य मस्जिद के हिस्सों पर भी कार्रवाई हुई थी। उज्जैन में सड़क चौड़ीकरण से जुड़े अभियानों में करीब 80 धार्मिक स्थलों से संबंधित कार्रवाई का भी अदालत ने उल्लेख किया।
636 साल का दावा और आज का विवाद
शाही मस्जिद को लेकर मौजूदा विवाद में तीन अलग-अलग पहलू सामने आते हैं—मस्जिद की ऐतिहासिक उम्र, पुराने सरकारी दस्तावेज और वर्तमान सड़क चौड़ीकरण योजना।
मस्जिद पक्ष 1390 के निर्माण दावे, 1925 के दस्तावेज, 1985 के राजपत्र और 1961 में जमीन दिए जाने की बात रख रहा है। वहीं प्रशासन सड़क चौड़ीकरण को सिंहस्थ 2028 की तैयारियों और यातायात प्रबंधन से जोड़ रहा है।
हाईकोर्ट पहले ही दो याचिकाओं को खारिज कर चुका है, जबकि मस्जिद पक्ष ने बड़ी पीठ के सामने मामला रखने की प्रक्रिया अपनाई है। ऐसे में आगे की कानूनी कार्यवाही इस विवाद की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होगी।
