बिहार में बाढ़ पर रोहिणी आचार्य का बड़ा हमला, सरकार से पूछे सवाल
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👉 WhatsApp से जुड़ेंबिहार में बाढ़ की स्थिति को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने बाढ़ को लेकर बिहार सरकार पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट के जरिए राज्य में हर साल पैदा होने वाली बाढ़ की स्थिति और सरकारी तैयारियों पर सवाल खड़े किए।
रोहिणी आचार्य ने आरोप लगाया कि बाढ़ बिहार के लिए कोई अचानक आने वाली आपदा नहीं है, बल्कि हर वर्ष सामने आने वाला संकट है। उन्होंने सरकार से आपदा आने के बाद राहत कार्य शुरू करने के बजाय पहले से स्थायी तैयारी करने की मांग की।
रोहिणी आचार्य ने सरकार की तैयारियों पर उठाए सवाल
रोहिणी आचार्य ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि बिहार में बाढ़ की समस्या हर साल सामने आती है। इसके बावजूद उनके अनुसार सरकारी तंत्र आपदा से पहले पर्याप्त सक्रियता नहीं दिखाता।
उन्होंने आरोप लगाया कि बाढ़ आने के बाद हवाई सर्वेक्षण, समीक्षा बैठक और बयानबाजी का दौर शुरू हो जाता है। रोहिणी के मुताबिक, जरूरत ऐसी व्यवस्था बनाने की है जो बाढ़ के प्रभाव को पहले से कम कर सके।
उन्होंने सवाल उठाया कि जब बाढ़ का समय लगभग हर वर्ष सामने आता है तो इसके लिए स्थायी तैयारी पहले से क्यों नहीं की जाती।
रोहिणी आचार्य ने अपने पोस्ट के साथ एक तस्वीर भी साझा की। तस्वीर को लेकर उन्होंने सरकार की बाढ़ प्रबंधन व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए राजनीतिक टिप्पणी की।
‘हर साल बस्तियों के डूबने का इंतजार क्यों?’
रोहिणी आचार्य ने अपने बयान में बिहार के बड़े हिस्से को बाढ़ और नदी कटाव की दृष्टि से संवेदनशील बताया।
उन्होंने कहा कि जुलाई, अगस्त और सितंबर के दौरान उत्तर, मध्य और पूर्वी बिहार के कई जिलों में बाढ़ की स्थिति बनती है। उनके अनुसार, इसके बावजूद बाढ़ प्रभावित इलाकों में पहले से पर्याप्त तैयारी नहीं की जाती।
आरजेडी नेता ने आरोप लगाया कि सरकारी अमला बस्तियों के जलमग्न होने और कटाव की स्थिति बनने के बाद सक्रिय होता है। उन्होंने इसे शासन की गंभीर लापरवाही बताया।
हालांकि, ये सभी आरोप रोहिणी आचार्य द्वारा लगाए गए हैं। सरकार या संबंधित विभाग का पक्ष इस सामग्री में उपलब्ध नहीं है।
बाढ़ नियंत्रण के बजट को लेकर भी सवाल
रोहिणी आचार्य ने बाढ़ नियंत्रण और कटाव से बचाव के लिए हर वर्ष होने वाले खर्च को लेकर भी सवाल उठाया।
उन्होंने दावा किया कि बाढ़ नियंत्रण के नाम पर अरबों रुपये का आवंटन किया जाता है, लेकिन तटबंधों की मरम्मत, गाद हटाने, जल निकासी, पुनर्वास और राहत व्यवस्था जैसे मुद्दे प्रभावी तरीके से जमीन पर नजर नहीं आते।
उन्होंने तटबंधों के समय पर ऑडिट और कटाव रोकने की ठोस व्यवस्था की जरूरत बताई। उनका कहना है कि यदि बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में पहले से काम किया जाए तो आपदा के दौरान होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
यहां भी उनके बयान में सरकार की व्यवस्था पर सवाल उठाए गए हैं, जबकि संबंधित विभाग की ओर से जवाब या आंकड़ों की विस्तृत जानकारी उपलब्ध सामग्री में नहीं दी गई है।
एनडीए सरकार की नीति पर साधा निशाना
रोहिणी आचार्य ने बिहार में लंबे समय से सत्ता में रही एनडीए सरकार की बाढ़ प्रबंधन नीति पर भी सवाल उठाए।
उन्होंने दावा किया कि लंबे शासनकाल के बावजूद स्थायी विस्थापन नीति, नदियों के अंतर-संयोजन और नेपाल के साथ जल प्रबंधन को लेकर मजबूत व्यवस्था नहीं बनाई जा सकी।
उन्होंने आपदा प्रबंधन विभाग की भूमिका को लेकर कहा कि उसका उद्देश्य केवल बाढ़ आने के बाद राहत पहुंचाना नहीं होना चाहिए, बल्कि आपदा के प्रभाव को पहले से कम करना भी होना चाहिए।
रोहिणी ने पूर्व चेतावनी प्रणाली को मजबूत करने और ग्रामीण क्षेत्रों में सुरक्षित आश्रय एवं पुनर्वास स्थलों के निर्माण की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
बाढ़ को ‘वार्षिक संकट’ मानने की मांग
रोहिणी आचार्य ने कहा कि बिहार सरकार को बाढ़ को आकस्मिक घटना के बजाय वार्षिक संकट के रूप में देखना चाहिए।
उनके मुताबिक, वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ स्थायी इंफ्रास्ट्रक्चर, बेहतर जल निकासी, मजबूत तटबंध व्यवस्था और प्रभावी आपदा प्रबंधन प्रणाली विकसित करने की जरूरत है।
उन्होंने भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था और मजबूत प्रशासनिक इच्छाशक्ति की भी मांग की। उनका तर्क है कि जब तक बाढ़ प्रबंधन को दीर्घकालिक नीति के रूप में नहीं अपनाया जाएगा, तब तक राज्य की बड़ी आबादी हर वर्ष बाढ़ और कटाव की परेशानी झेलती रहेगी।
बिहार में बाढ़ प्रबंधन क्यों बना बड़ा मुद्दा?
बिहार की भौगोलिक स्थिति के कारण कई नदियों के जलस्तर में बढ़ोतरी होने पर बड़े क्षेत्र प्रभावित हो सकते हैं। बाढ़ के साथ नदी कटाव, सड़क संपर्क बाधित होना, फसलों को नुकसान और विस्थापन जैसी चुनौतियां भी सामने आती हैं।
ऐसे में बाढ़ से निपटने के लिए राहत कार्यों के साथ-साथ पूर्व तैयारी, तटबंधों की निगरानी, जल निकासी, चेतावनी प्रणाली और सुरक्षित स्थानों की व्यवस्था महत्वपूर्ण मानी जाती है।
रोहिणी आचार्य के ताजा बयान ने इसी पुराने और संवेदनशील मुद्दे को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। अब इस मुद्दे पर सरकार की ओर से क्या प्रतिक्रिया आती है और बाढ़ प्रबंधन को लेकर क्या कदम उठाए जाते हैं, इस पर नजर रहेगी।
