मधुबनी के 20 साल के पीयूष झा का कमाल, UNDP ने माना इनोवेशन

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बिहार के मधुबनी के रहने वाले पीयूष झा ने महज 20 साल की उम्र में ऐसा जल शोधन मॉडल तैयार किया है, जिसकी चर्चा अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रही है। पीयूष झा ने मुंबई की झुग्गियों में गंदे पानी और उससे जुड़ी बीमारियों की समस्या को करीब से देखा और इसी चुनौती को अपने इनोवेशन की प्रेरणा बनाया।

पीयूष ने एक विकेंद्रीकृत और मॉड्यूलर अपशिष्ट जल शोधन प्रणाली विकसित की है। उनका लक्ष्य ऐसी तकनीक तैयार करना है, जिससे उद्योगों के लिए पानी साफ करना कम खर्चीला और व्यावहारिक बनाया जा सके।

उनके इस नवाचार को भारत में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम यानी UNDP के ‘यूथ को:लैब नेशनल इनोवेशन चैलेंज’ के तहत मान्यता मिली है।

मुंबई की झुग्गियों से शुरू हुई समस्या को समझने की कहानी

मधुबनी से मुंबई पहुंचने के बाद पीयूष झा ने झुग्गी बस्तियों के आसपास जमा गंदे पानी की समस्या देखी। पानी के ठहराव के कारण डेंगू, मलेरिया और टाइफाइड जैसी बीमारियों का खतरा भी दिखाई देता था।

इस अनुभव ने पीयूष को केवल समस्या देखने के बजाय उसका समाधान खोजने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने जल प्रदूषण और अपशिष्ट जल प्रबंधन पर काम शुरू किया और धीरे-धीरे एक ऐसे मॉडल पर काम किया, जिसे उद्योगों में इस्तेमाल किया जा सके।

पीयूष का कहना है कि भारत में औद्योगिक अपशिष्ट जल का बड़ा हिस्सा अभी भी प्रभावी तरीके से शोधित नहीं हो पाता। यही वजह है कि उनका फोकस ऐसे समाधान पर है, जिसे छोटे और मध्यम उद्योग भी अपनाने में सक्षम हों।

बिना औपचारिक वाटर ट्रीटमेंट डिग्री के तैयार किया मॉडल

पीयूष झा की कहानी इसलिए भी अलग है क्योंकि उन्होंने जल उपचार इंजीनियरिंग में कोई औपचारिक डिग्री हासिल नहीं की है।

उन्होंने MHT-CET में करीब 98 प्रतिशत अंक हासिल किए थे। इसके बाद उन्होंने मुंबई के डीजी सांघवी कॉलेज में पढ़ाई शुरू की, लेकिन अपने स्टार्टअप और इनोवेशन पर ध्यान देने के लिए पढ़ाई बीच में छोड़ दी।

पीयूष के मुताबिक, कोविड-19 के दौरान उन्हें एक सेकेंड हैंड लैपटॉप मिला। इसी संसाधन के जरिए उन्होंने इस क्षेत्र में रिसर्च और प्रयोग शुरू किए।

धीरे-धीरे उनका काम एक ऐसे समाधान की दिशा में बढ़ा, जिसका उद्देश्य औद्योगिक अपशिष्ट जल को कम लागत में ट्रीट करना है।

किन उद्योगों के लिए काम कर रही है पीयूष की तकनीक?

पीयूष झा का मॉडल ऐसे उद्योगों को ध्यान में रखकर विकसित किया गया है, जहां बड़ी मात्रा में जैविक अपशिष्ट उत्पन्न होता है।

इसमें मुख्य रूप से टेक्सटाइल, चमड़ा, खाद्य एवं पेय पदार्थ, डिस्टिलरी, कागज एवं लुगदी और चीनी उद्योग शामिल हैं।

पीयूष के अनुसार उनकी तकनीक सूक्ष्मजीवों की मदद से जैविक कचरे को विघटित करने की प्रक्रिया पर आधारित है। इस प्रक्रिया में बिजली उत्पादन की संभावना भी बताई गई है।

उनका जोर ऐसे समाधान पर है, जिसमें बड़े स्तर के बुनियादी ढांचे और महंगे रासायनिक पदार्थों की जरूरत कम हो।

20 लाख की लागत को 5 से 7 लाख तक लाने का दावा

पीयूष झा ने बताया कि पारंपरिक जल शोधन व्यवस्था छोटे और मध्यम उद्योगों के लिए महंगी हो सकती है।

उनके अनुसार, जहां किसी उद्योग को पानी साफ करने की प्रक्रिया में लगभग 20 लाख रुपये तक खर्च करने पड़ सकते हैं, वहीं उनका ‘प्री-ट्रीटमेंट’ समाधान इस लागत को करीब 5 से 7 लाख रुपये तक लाने का लक्ष्य रखता है।

यह मॉडल खासतौर पर उन उद्योगों के लिए उपयोगी हो सकता है, जिन्हें अपने अपशिष्ट जल के प्रबंधन के लिए किफायती विकल्पों की जरूरत होती है।

पीयूष का कहना है कि अगर उद्योगों को सस्ता और व्यावहारिक जल शोधन समाधान उपलब्ध हो, तो जल स्रोतों में अनुपचारित अपशिष्ट जल जाने की समस्या को कम करने में मदद मिल सकती है।

UNDP के यूथ को:लैब से मिला मार्गदर्शन

पीयूष झा के इनोवेशन को UNDP India के Youth Co National Innovation Challenge से भी जुड़ाव मिला।

इस कार्यक्रम के माध्यम से उन्हें अलग-अलग उद्योगों के विशेषज्ञों से मार्गदर्शन, निवेशकों से संपर्क और तीन महीने के प्रशिक्षण कार्यक्रम का अवसर मिला।

पीयूष ने बताया कि उन्हें हैदराबाद में आयोजित चार दिवसीय बूटकैंप में भी शामिल होने का मौका मिला। वहां उन्हें दो महत्वपूर्ण साझेदार मिले, जिनमें एक सार्वजनिक लिमिटेड कंपनी के साथ साझेदारी भी शामिल थी।

उन्होंने अपने सफर में कई संस्थाओं, गैर-सरकारी संगठनों और इनक्यूबेटरों के सहयोग का भी उल्लेख किया है। इनमें UNDP, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय और मर्सिडीज-बेंज फेलोशिप कार्यक्रम शामिल हैं।

मधुबनी से निकली कहानी अब बड़े बदलाव की ओर

पीयूष झा की कहानी केवल एक युवा इनोवेटर की कहानी नहीं है। यह दिखाती है कि किसी स्थानीय समस्या को समझकर उसके तकनीकी समाधान की दिशा में काम किया जा सकता है।

मुंबई की बस्ती में गंदे पानी की समस्या देखने से शुरू हुआ उनका सफर अब औद्योगिक अपशिष्ट जल के किफायती उपचार तक पहुंच चुका है।

UNDP के कार्यक्रम से मिली मान्यता ने उनके काम को एक बड़ा मंच दिया है। हालांकि किसी भी नई तकनीक का व्यापक प्रभाव उसके वास्तविक उपयोग, लागत, तकनीकी प्रदर्शन और अलग-अलग उद्योगों में सफल क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा।

फिलहाल, मधुबनी के 20 वर्षीय पीयूष झा का यह प्रयास युवाओं के लिए इसलिए चर्चा में है क्योंकि उन्होंने एक जमीनी समस्या को पहचानकर उसे इनोवेशन और स्टार्टअप के अवसर में बदलने की कोशिश की है।

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