पप्पू यादव का बड़ा बयान, बोले- ज्ञानेश कुमार को बिजली के खंभे पर फांसी दी जाए
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👉 WhatsApp से जुड़ेंमुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर राजनीतिक विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है। ज्ञानेश कुमार पर विपक्षी नेताओं की ओर से SIR और चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। इसी बीच पूर्णिया से सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव ने पटना में मीडिया से बातचीत के दौरान बेहद कड़ा बयान दिया और CEC के लिए फांसी की मांग की।
पप्पू यादव ने कहा कि ज्ञानेश कुमार को बिजली के खंभे पर फांसी दी जानी चाहिए, ताकि उनके अनुसार गरीबों, दलितों, पिछड़े और वंचित वर्गों के वोट और अधिकारों के साथ कथित छेड़छाड़ करने वालों को संदेश मिले। यह बयान सामने आने के बाद राजनीतिक विवाद और तेज हो गया है।
पप्पू यादव ने क्या कहा?
पटना में मीडिया से बातचीत में पप्पू यादव ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ बेहद तीखी टिप्पणी की। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग के कामकाज में संविधान और लोकतंत्र से जुड़े गंभीर सवाल खड़े हुए हैं।
सांसद ने आरोप लगाया कि ज्ञानेश कुमार को RSS, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का समर्थन प्राप्त है। उन्होंने कानून मंत्री के समर्थन का भी आरोप लगाया और मामले में अभियोग चलाने की मांग की।
पप्पू यादव ने यह भी कहा कि जब तक ज्ञानेश कुमार को पद से नहीं हटाया जाता, तब तक विपक्षी दलों को एकजुट होकर आंदोलन करना चाहिए।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये पप्पू यादव द्वारा लगाए गए राजनीतिक आरोप और उनकी मांगें हैं। उपलब्ध रिपोर्टों में ज्ञानेश कुमार के खिलाफ किसी अदालत द्वारा ऐसा कोई दंड निर्धारित किए जाने की जानकारी नहीं है।
SIR को लेकर क्यों मचा है विवाद?
इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि में चुनावी मतदाता सूची का Special Intensive Revision यानी SIR भी प्रमुख मुद्दा है।
द इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर की एक जांच रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयोग के दो आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने पिछले 10 महीनों में आयोग के कुछ फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट के अनुसार, आपत्तियां मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने, Form-6 में बदलाव और मतदाता डेटा से जुड़े मुद्दों पर थीं।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि दोनों आयुक्तों ने कुछ फैसलों को लेकर जानकारी और प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे। खास तौर पर मतदाता डेटाबेस के नियंत्रण को केंद्रीय स्तर पर रखने और नए मतदाताओं के Form-6 से जुड़े बदलावों को लेकर आपत्तियां दर्ज होने की बात सामने आई।
हालांकि, इन रिपोर्टों के बीच चुनाव आयोग के अधिकारियों ने मतभेद की व्याख्या को खारिज करते हुए कहा कि आयोग के सभी फैसले, जिसमें SIR भी शामिल है, तीनों आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए थे। आयोग की ओर से कहा गया कि व्यक्तिगत राय या आपत्ति को आयोग के अंतिम निर्णय के बराबर नहीं माना जा सकता।
चुनाव आयोग में कितने सदस्य हैं?
भारत का चुनाव आयोग तीन सदस्यीय संवैधानिक संस्था है। वर्तमान में ज्ञानेश कुमार मुख्य चुनाव आयुक्त, जबकि सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी चुनाव आयुक्त हैं। चुनाव आयोग की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार ज्ञानेश कुमार ने 19 फरवरी 2025 को मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभाला था।
भारतीय चुनाव व्यवस्था में आयोग को चुनावों के संचालन और मतदाता सूची से जुड़े महत्वपूर्ण कार्यों की संवैधानिक जिम्मेदारी मिली हुई है।
इसी वजह से आयोग के भीतर कथित मतभेद और SIR जैसे मुद्दे राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण बन गए हैं।
विपक्ष क्यों मांग रहा है ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा?
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्षी नेताओं ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अपने हमले तेज कर दिए हैं।
रिपोर्ट के बाद विपक्षी दलों के नेताओं ने CEC को पद से हटाने, जांच कराने और SIR से जुड़े मामलों में न्यायिक निगरानी की मांगें उठाईं। शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने भी ज्ञानेश कुमार को हटाने और जेल भेजने की मांग की थी।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी चुनाव आयोग और SIR को लेकर पहले से सवाल उठाते रहे हैं। विपक्ष की ओर से मतदाता सूची में बदलावों को लेकर पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग की जा रही है।
दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने अपने फैसलों को लेकर उठ रहे मतभेद के दावों पर स्पष्टीकरण दिया है और कहा है कि आयोग के अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए।
SIR पर सुप्रीम कोर्ट का क्या रुख रहा है?
SIR को लेकर कानूनी विवाद भी सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में किए गए SIR की वैधता को बरकरार रखा था।
सुप्रीम कोर्ट के अनुसार चुनाव आयोग को संविधान के अनुच्छेद 324 और जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत मतदाता सूची के पुनरीक्षण का अधिकार है। अदालत ने यह भी कहा कि मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए ऐसी प्रक्रिया अपनाई जा सकती है, बशर्ते निर्धारित कानूनी और प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का पालन हो।
इसलिए मौजूदा विवाद को समझने के लिए राजनीतिक आरोपों और अदालत के कानूनी निष्कर्षों के बीच अंतर रखना जरूरी है।
अब आगे क्या हो सकता है?
पप्पू यादव के ताजा बयान से CEC ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग को लेकर राजनीतिक बहस और तेज होने की संभावना है। विपक्ष पहले ही आयोग की कार्यप्रणाली, SIR और मतदाता सूची से जुड़े मुद्दों पर सवाल उठा रहा है।
वहीं चुनाव आयोग की ओर से अंतिम निर्णयों को लेकर सर्वसम्मति का पक्ष सामने रखा गया है। ऐसे में आने वाले दिनों में SIR से जुड़े दस्तावेज, आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियां और अदालतों में चल रही कार्यवाही इस विवाद के महत्वपूर्ण हिस्से रहेंगे।
फिलहाल पप्पू यादव की फांसी की मांग एक राजनीतिक बयान है। इसे किसी न्यायिक आदेश या ज्ञानेश कुमार के खिलाफ तय कानूनी सजा के रूप में नहीं देखा जा सकता। विवाद का वास्तविक कानूनी और संवैधानिक पक्ष संबंधित संस्थाओं और अदालतों की प्रक्रिया से ही तय होगा।
