दरभंगा में सोलर सिंचाई का कमाल, पानी और बिजली खर्च में बड़ी बचत
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👉 WhatsApp से जुड़ेंदरभंगा में खेती को सौर ऊर्जा से जोड़ने की पहल किसानों के लिए नई उम्मीद लेकर आई है। यहां आशा मॉडल के जरिए खेतों में सौर ऊर्जा आधारित सिंचाई व्यवस्था को बढ़ावा दिया जा रहा है। शुरुआती पायलट प्रोजेक्ट में पानी की बर्बादी में 30 प्रतिशत और बिजली खर्च में करीब 45 प्रतिशत तक कमी का दावा किया गया है।
इस मॉडल का उद्देश्य किसानों को कम लागत में सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराना और पानी तथा ऊर्जा दोनों का बेहतर इस्तेमाल सुनिश्चित करना है। पायलट स्तर पर मिले परिणामों के बाद इसे बिहार के दूसरे इलाकों तक पहुंचाने की योजना पर भी जोर दिया जा रहा है।
क्या है आशा मॉडल और कैसे करता है काम?
आशा मॉडल का पूरा नाम ऑटोमेटेड सोलर-पावर्ड बेस्ड हाई इफिशिएंसी इरिगेशन एप्लीकेशन बताया गया है। इस व्यवस्था में खेतों के आसपास सोलर पैनल लगाए जाते हैं, जिनसे पैदा होने वाली बिजली सिंचाई पंप को चलाने में इस्तेमाल होती है।
इस सिस्टम का फोकस केवल सौर ऊर्जा से पंप चलाने तक सीमित नहीं है। इसमें सिंचाई को जरूरत के हिसाब से नियंत्रित करने और पानी की खपत पर नजर रखने के लिए तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है।
पायलट प्रोजेक्ट में किसानों को मोबाइल ऐप के जरिए पानी की जरूरत और पंप की स्थिति से जुड़ा रीयल-टाइम डेटा मिलने लगा। इससे किसान अपनी फसल की जरूरत के अनुसार सिंचाई का समय तय कर सकते हैं।
150 हेक्टेयर में हुआ पायलट प्रोजेक्ट
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक आशा मॉडल की योजना तैयार करने का काम 2022 में शुरू हुआ था। इसके लिए बिहार के नवीकरणीय ऊर्जा विभाग और कृषि विज्ञान केन्द्र के संयुक्त अनुसंधान का उल्लेख किया गया है।
इसके बाद मॉडल को शुरुआती तौर पर करीब 150 हेक्टेयर भूमि पर पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लागू किया गया। इसमें लगभग 500 किसानों की भागीदारी बताई गई है।
पायलट चरण के दौरान किसानों को सोलर पैनल और सिंचाई सिस्टम के संचालन तथा रख-रखाव की जानकारी देने के लिए तकनीकी टीम ने प्रशिक्षण भी दिया।
इसका मकसद किसानों को नई तकनीक देने के साथ उसे सही तरीके से इस्तेमाल करने में सक्षम बनाना था।
पानी की बर्बादी 30% और बिजली खर्च 45% तक घटा
आशा मॉडल की सबसे बड़ी खासियत इसके शुरुआती परिणाम बताए जा रहे हैं। पायलट प्रोजेक्ट में पानी की बर्बादी में 30 प्रतिशत तक कमी दर्ज होने का दावा किया गया है।
वहीं, सौर ऊर्जा आधारित सिंचाई व्यवस्था के कारण बिजली खर्च में 45 प्रतिशत तक बचत की बात सामने आई है। किसानों के लिए इसका सीधा मतलब सिंचाई की लागत को कम करना और उपलब्ध पानी का अधिक प्रभावी इस्तेमाल करना है।
अगर इस तरह की बचत बड़े स्तर पर भी कायम रहती है, तो यह बिहार के उन किसानों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है जो बिजली की लागत और सिंचाई की अनिश्चितता से परेशान रहते हैं।
फसल उत्पादन में भी बढ़ोतरी का दावा
पायलट प्रोजेक्ट से जुड़े आंकड़ों में फसल उत्पादन में भी सुधार का दावा किया गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार शुरुआती दो महीनों में किसानों ने औसतन करीब 15 प्रतिशत उत्पादन बढ़ने की बात कही।
विशेष रूप से धान और गेहूं जैसी फसलों में नियमित पानी की उपलब्धता को उत्पादन में सुधार से जोड़ा गया है।
हालांकि, इतने कम समय के आंकड़ों से पूरे कृषि चक्र पर अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। अलग-अलग मौसम, मिट्टी, फसल और किसानों की खेती की परिस्थितियां भी उत्पादन को प्रभावित करती हैं।
किसानों के लिए क्या बदलेगा?
सौर सिंचाई प्रणाली का सबसे बड़ा संभावित फायदा खेती की लागत में कमी है। बिजली या अन्य ऊर्जा स्रोतों पर निर्भरता घटने से किसान सिंचाई पर होने वाले खर्च को नियंत्रित कर सकते हैं।
दूसरा फायदा पानी के बेहतर प्रबंधन का है। मोबाइल आधारित निगरानी और जरूरत के अनुसार सिंचाई से खेत में जरूरत से ज्यादा पानी देने की स्थिति कम हो सकती है।
इसके अलावा सौर ऊर्जा के इस्तेमाल से पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों पर निर्भरता और सिंचाई से जुड़े उत्सर्जन को कम करने में भी मदद मिल सकती है।
छोटे किसानों के सामने शुरुआती लागत बड़ी चुनौती
आशा मॉडल को लेकर किसानों की प्रतिक्रिया पूरी तरह एक जैसी नहीं है। कई छोटे किसानों ने कम ऊर्जा लागत को राहत देने वाला कदम बताया है।
दूसरी तरफ कुछ बड़े किसानों और जमीन मालिकों ने शुरुआती निवेश को लेकर चिंता जताई है। सोलर पैनल, पंप, तकनीकी उपकरण और रख-रखाव की लागत शुरुआत में अधिक हो सकती है।
यही वजह है कि इस मॉडल को बड़े पैमाने पर लागू करने के लिए सब्सिडी, आसान ऋण और नियमित तकनीकी सहायता महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
बिहार के 20 हजार हेक्टेयर खेतों तक पहुंचाने की योजना
उपलब्ध जानकारी के अनुसार पायलट प्रोजेक्ट के परिणामों के आधार पर सरकार अगले चरण में इस तकनीक का विस्तार करना चाहती है।
अगले दो वर्षों में करीब 20,000 हेक्टेयर कृषि भूमि को सौर सिंचाई प्रणाली से जोड़ने का लक्ष्य बताया गया है। इसके लिए कृषि ऋण योजना के तहत सब्सिडी और कम ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराने की योजना का उल्लेख किया गया है।
अगर यह विस्तार प्रभावी तरीके से होता है, तो बिहार में सिंचाई के साथ-साथ नवीकरणीय ऊर्जा के इस्तेमाल को भी बढ़ावा मिल सकता है।
निगरानी और रख-रखाव पर रहेगा असली फोकस
किसी भी नई तकनीक की सफलता केवल उसे स्थापित करने से तय नहीं होती। लंबे समय तक फायदा लेने के लिए सोलर पैनल, पंप और डिजिटल सिस्टम का नियमित रख-रखाव जरूरी होगा।
विपक्ष की ओर से भी योजना के वित्तीय प्रबंधन और निगरानी तंत्र को मजबूत करने की जरूरत बताई गई है। पर्यावरण से जुड़े संगठनों ने भी लगातार प्रभाव का आकलन करने की आवश्यकता पर जोर दिया है।
ऐसे में आशा मॉडल के भविष्य की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार तकनीक को कितनी पारदर्शिता, प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता के साथ किसानों तक पहुंचाती है।
खेती के लिए नई दिशा बन सकता है सौर मॉडल
दरभंगा का यह प्रयोग बिहार में खेती और ऊर्जा के बीच नए तालमेल की संभावना दिखाता है। यदि पानी और बिजली की बचत के शुरुआती दावे बड़े स्तर पर भी कायम रहते हैं, तो किसानों की उत्पादन लागत कम करने में मदद मिल सकती है।
सौर ऊर्जा, स्मार्ट सिंचाई और डेटा आधारित खेती का संयोजन आने वाले समय में जल संकट और बढ़ती कृषि लागत जैसी चुनौतियों से निपटने का एक विकल्प बन सकता है।
फिलहाल आशा मॉडल पायलट चरण के अनुभवों से आगे बढ़ने की तैयारी में है। आने वाले वर्षों में इसका विस्तार और वास्तविक खेतों पर लंबे समय के परिणाम यह तय करेंगे कि यह मॉडल बिहार की खेती में कितना बड़ा बदलाव ला पाता है।
