कंधे पर दोस्त, दिल में महादेव: सुल्तानगंज से 105 KM की यात्रा
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👉 WhatsApp से जुड़ेंभागलपुर के सुल्तानगंज में श्रावणी मेले के बीच आस्था और दोस्ती की एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने लोगों का ध्यान खींच लिया है। सुल्तानगंज से देवघर की 105 किलोमीटर लंबी पैदल यात्रा पर वाराणसी के दीपक कनौजिया अपने बचपन के दिव्यांग दोस्त प्रमोद पांडे को कंधे पर लेकर निकले हैं। सुल्तानगंज से देवघर की इस कठिन यात्रा में प्रमोद अपने पैरों से चल नहीं सकते, लेकिन बाबा बैद्यनाथ के दर्शन और जलाभिषेक की उनकी इच्छा को दोस्त दीपक ने अपनी जिम्मेदारी बना लिया है।
दोस्त के पैरों की ताकत बन गए दीपक
श्रावणी मेले के दौरान कांवरिया पथ पर हजारों श्रद्धालु बाबा बैद्यनाथ के दर्शन के लिए आगे बढ़ रहे हैं। इसी भीड़ में दीपक और प्रमोद की जोड़ी लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।
प्रमोद के पैरों में चलने की ताकत नहीं है। ऐसे में उनके लिए सुल्तानगंज से देवघर तक पैदल यात्रा करना सामान्य श्रद्धालुओं की तरह आसान नहीं है।
लेकिन बचपन के दोस्त दीपक ने उनकी इस मजबूरी को मंजिल के बीच आने नहीं दिया। उन्होंने प्रमोद को अपने कंधों पर उठाया और बाबा बैद्यनाथ के दरबार तक पहुंचाने का संकल्प लिया।
आठ साल से निभा रहे हैं दोस्ती का यह वादा
दीपक और प्रमोद की यह कहानी अचानक शुरू नहीं हुई। दोनों के अनुसार, पिछले करीब 8 वर्षों से हर सावन वे इसी तरह देवघर की यात्रा करते आ रहे हैं।
दीपक ने बताया कि जब वह दूसरे कांवरियों को बाबा बैद्यनाथ के दरबार की ओर जाते देखते थे, तब उनके दोस्त प्रमोद के मन में भी जल चढ़ाने और भगवान शिव के दर्शन करने की इच्छा होती थी।
पैरों से चल पाने में असमर्थ प्रमोद के लिए यह इच्छा पूरी करना आसान नहीं था। ऐसे में दीपक ने दोस्त की इच्छा को अपनी जिम्मेदारी मान लिया।
हर साल सावन आते ही दोनों की यह यात्रा फिर शुरू हो जाती है।
105 किलोमीटर तक कंधे पर लेकर चलेंगे
इस बार भी दीपक अपने दोस्त प्रमोद को कंधे पर लेकर सुल्तानगंज से देवघर तक करीब 105 किलोमीटर की यात्रा पर निकले हैं।
दोनों का अनुमान है कि इस दूरी को पूरा करने में करीब छह दिन लगेंगे। रास्ते में उन्हें गर्मी, थकान, भीड़ और लंबी पैदल यात्रा जैसी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।
इसके बावजूद दोनों के चेहरे पर मंजिल तक पहुंचने का विश्वास नजर आता है। प्रमोद के लिए यह सिर्फ धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि दोस्ती पर भरोसे और वर्षों से चली आ रही आस्था को पूरा करने का अवसर भी है।
प्रमोद के लिए दोस्त ही बने सहारा
प्रमोद के लिए दीपक सिर्फ बचपन के दोस्त नहीं हैं। इस यात्रा में दीपक उनके पैरों की ताकत बन चुके हैं।
जहां दूसरे कांवरिये अपने पैरों से कांवर लेकर बाबा के दरबार की ओर बढ़ रहे हैं, वहीं प्रमोद अपने दोस्त के कंधे पर बैठकर वही मंजिल तय कर रहे हैं।
यह दृश्य कांवरिया पथ से गुजरने वाले लोगों को भावुक कर रहा है। कई लोग दोनों दोस्तों को देखकर रुक जाते हैं और उनकी कहानी जानने की कोशिश करते हैं।
इस यात्रा ने यह भी दिखाया है कि सच्ची दोस्ती केवल साथ चलने का नाम नहीं है। कभी-कभी दोस्त अपने साथी के लिए वह रास्ता भी तय करता है, जिसे दूसरा व्यक्ति अकेले पूरा नहीं कर सकता।
महादेव से दोस्त के लिए मांगेंगे खुशियां
दीपक का कहना है कि वह बाबा बैद्यनाथ से अपने दोस्त प्रमोद के लिए खुशियों की कामना करेंगे।
उनकी इच्छा है कि प्रमोद हमेशा खुश रहें और उनके जीवन में किसी चीज की कमी न हो। दीपक के लिए दोस्त की खुशी ही इस कठिन यात्रा की सबसे बड़ी वजह है।
वहीं प्रमोद भी अपने दोस्त दीपक के लिए महादेव से प्रार्थना कर रहे हैं। उनके लिए दीपक का यह साथ किसी वरदान से कम नहीं है।
दोनों की प्रार्थना में एक-दूसरे के लिए शुभकामनाएं हैं और यही भावना इस यात्रा को और खास बना देती है।
कांवरिया पथ पर दिखी दोस्ती की अनोखी तस्वीर
सुल्तानगंज से देवघर तक की कांवर यात्रा हर साल लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बनती है। इस दौरान अलग-अलग जगहों से आने वाले श्रद्धालु अपनी-अपनी मनोकामनाओं के साथ बाबा बैद्यनाथ के दरबार की ओर बढ़ते हैं।
इसी यात्रा के बीच दीपक और प्रमोद की कहानी इंसानियत और दोस्ती का अलग संदेश देती है।
दीपक के कंधे पर बैठे प्रमोद और उनके आसपास से गुजरते कांवरियों का दृश्य लोगों को यह सोचने पर मजबूर करता है कि आस्था के रास्ते में शारीरिक मजबूरी भी हमेशा बाधा नहीं बनती।
जब किसी के साथ भरोसा और समर्पण हो, तो मुश्किल रास्ता भी आसान लगने लगता है।
छह दिन बाद बाबा बैद्यनाथ के दरबार में पहुंचने का लक्ष्य
दीपक और प्रमोद का लक्ष्य करीब छह दिनों में देवघर पहुंचना है। वहां पहुंचने के बाद प्रमोद बाबा बैद्यनाथ को जल अर्पित करेंगे।
यह उनके लिए आठ साल से चली आ रही यात्रा का एक और पड़ाव होगा। हर सावन की तरह इस बार भी दोस्ती और आस्था दोनों उनके साथ हैं।
105 किलोमीटर का यह सफर भले ही दूरी के हिसाब से मापा जा सकता है, लेकिन दीपक और प्रमोद के लिए इसकी अहमियत कहीं ज्यादा है।
यह यात्रा बताती है कि दोस्ती सिर्फ खुशी के दिनों में साथ खड़े होने का नाम नहीं है। असली दोस्त वही है, जो कठिन समय में आपके लिए खुद कदम बढ़ाए और जरूरत पड़ने पर आपकी मंजिल तक पहुंचने का रास्ता अपने कंधों पर उठा ले।
दोस्ती, भरोसे और इंसानियत की मिसाल
सुल्तानगंज से देवघर तक दीपक और प्रमोद की यात्रा श्रावणी मेले की हजारों कहानियों के बीच एक ऐसी कहानी बन गई है, जिसमें आस्था के साथ इंसानी रिश्ते की ताकत भी दिखाई देती है।
प्रमोद चल नहीं सकते, लेकिन उनकी आस्था रुकी नहीं है। दीपक ने अपने दोस्त के कदमों की कमी को अपने कंधों से पूरा करने का बीड़ा उठाया है।
यही वजह है कि दोनों की यह यात्रा केवल बाबा बैद्यनाथ के दर्शन तक पहुंचने का सफर नहीं, बल्कि दोस्ती, भरोसे, त्याग और इंसानियत की 105 किलोमीटर लंबी मिसाल बन गई है।
