47 बंदूकें मिलीं, माता-पिता गिरफ्तार हुए तो खुद अंग्रेज पुलिस के सामने पहुंच गए ब्रह्मदेव चौधरी

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खगड़िया के संसारपुर निवासी ब्रह्मदेव चौधरी की कहानी स्वतंत्रता आंदोलन के उन अध्यायों में शामिल है, जिन्हें स्थानीय स्मृतियों ने आज तक संभालकर रखा है। ब्रह्मदेव चौधरी ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अंग्रेजी शासन का विरोध किया और परिवार के अनुसार गिरफ्तारी, यातना तथा आजीवन कारावास का सामना किया। कहा जाता है कि उनके घर से 47 बंदूकें बरामद होने के बाद अंग्रेज प्रशासन ने उनके माता-पिता को गिरफ्तार कर दबाव बनाया। लेकिन उन्होंने झुकने के बजाय खुद पुलिस के सामने पहुंचने का फैसला किया।

1942 में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ उठाई आवाज

भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों में अंग्रेजी शासन के खिलाफ आंदोलन तेज था। बिहार के गांव-कस्बों में भी बड़ी संख्या में लोग इस आंदोलन से जुड़े थे।

स्थानीय और पारिवारिक विवरणों के अनुसार, ब्रह्मदेव चौधरी भी अंग्रेजी शासन के विरोध में सक्रिय थे। उनका उद्देश्य केवल विरोध करना नहीं, बल्कि लोगों को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ना और अंग्रेजी शासन को चुनौती देना था।

बताया जाता है कि वे अंग्रेजी शासन के संसाधनों और गतिविधियों के खिलाफ भी आवाज उठाते थे। उनका मानना था कि देश की संपत्ति का इस्तेमाल देशहित में होना चाहिए।

घर पर छापेमारी में 47 बंदूकें मिलने का दावा

ब्रह्मदेव चौधरी की गतिविधियों से अंग्रेज प्रशासन सतर्क हो गया था। इसके बाद संसारपुर स्थित उनके घर पर छापेमारी किए जाने का उल्लेख मिलता है।

पारिवारिक विवरणों के मुताबिक, तलाशी के दौरान घर से 47 बंदूकें बरामद की गई थीं। इसी घटना के बाद अंग्रेज प्रशासन की कार्रवाई और तेज हुई।

उनके साथ महेंद्र चौधरी जैसे सहयोगियों का भी नाम स्थानीय विवरणों में मिलता है। दोनों के बीच बचपन से मित्रता बताई जाती है। मानसी के फुटबॉल मैदान में युवाओं से मिलने और आंदोलन की रणनीति पर चर्चा किए जाने की बातें भी स्थानीय स्मृतियों में दर्ज हैं।

महेंद्र चौधरी को बाद में फांसी की सजा दिए जाने का भी स्थानीय विवरणों में उल्लेख मिलता है।

माता-पिता को गिरफ्तार कर बनाया दबाव

अंग्रेज अधिकारियों ने ब्रह्मदेव चौधरी पर दबाव बनाने के लिए उनके पिता लक्खा चौधरी और माता को गिरफ्तार कर लिया।

परिवार को उम्मीद थी कि माता-पिता की गिरफ्तारी की खबर मिलने के बाद ब्रह्मदेव अपने साथियों और आंदोलन से जुड़ी गतिविधियों की जानकारी देने के लिए मजबूर हो जाएंगे।

लेकिन अंग्रेज प्रशासन की यह रणनीति काम नहीं आई। परिवार से जुड़े विवरणों के अनुसार, ब्रह्मदेव चौधरी ने अपने साथियों की जानकारी देने से इनकार कर दिया।

माता-पिता की गिरफ्तारी की खबर मिली तो खुद पहुंचे पुलिस के पास

ब्रह्मदेव चौधरी के जीवन का सबसे उल्लेखनीय प्रसंग उनकी गिरफ्तारी से जुड़ा बताया जाता है।

परिवार के अनुसार, जब उन्हें पता चला कि उनके माता-पिता को अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया है, तो उन्होंने छिपने के बजाय खुद अंग्रेज पुलिस के सामने पेश होने का फैसला किया।

बताया जाता है कि उन्होंने अधिकारियों के सामने कहा कि उनके माता-पिता को छोड़ दिया जाए और उनके साथ जो करना है, किया जाए।

इसके बाद उनसे आंदोलन और उनके साथियों के बारे में पूछताछ की गई। लेकिन उन्होंने कथित तौर पर कोई महत्वपूर्ण जानकारी साझा नहीं की।

11 दिन हिरासत और यातनाओं का किया सामना

स्थानीय पारिवारिक विवरणों के अनुसार, ब्रह्मदेव चौधरी करीब 11 दिनों तक अंग्रेजों की हिरासत में रहे।

इस दौरान उनके साथ गंभीर यातना किए जाने का भी उल्लेख मिलता है। परिवार के अनुसार, पूछताछ के दौरान उन्हें शारीरिक यातनाएं दी गईं और उनके शरीर को चोट पहुंचाई गई।

बताया जाता है कि इसके बावजूद उन्होंने अपने साथियों के बारे में जानकारी देने से इनकार कर दिया।

उनका कथित रुख साफ था—वे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े लोगों की जानकारी देकर अपने साथियों को खतरे में नहीं डालेंगे।

आजीवन कारावास और चार सेंट्रल जेलों में रहे

बाद में अंग्रेजी शासन ने ब्रह्मदेव चौधरी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। उन्हें अपर डिवीजन बंदी का दर्जा दिए जाने का भी उल्लेख स्थानीय विवरणों में मिलता है।

उनके जीवन से जुड़े रिकॉर्ड और पारिवारिक स्मृतियों में चार सेंट्रल जेलों का उल्लेख मिलता है—

  • भागलपुर सेंट्रल जेल
  • हजारीबाग सेंट्रल जेल
  • बक्सर सेंट्रल जेल
  • मुजफ्फरपुर सेंट्रल जेल

एक जेल से दूसरी जेल में स्थानांतरण और लंबे कारावास के बावजूद उनके विचारों में बदलाव नहीं आया।

हर रविवार गांव लाए जाने की कहानी

परिवार से जुड़े विवरणों के अनुसार, जेल में रहने के दौरान ब्रह्मदेव चौधरी को प्रत्येक रविवार कड़ी सुरक्षा में संसारपुर लाया जाता था।

वे कुछ समय परिवार के साथ बिताते और सूर्यास्त से पहले उन्हें वापस जेल ले जाया जाता था।

इसके बाद उन्हें उस केंद्रीय जेल में पहुंचा दिया जाता था, जहां उस समय उनकी सजा चल रही होती थी।

स्थानीय स्मृतियों में यह प्रसंग आज भी उनके परिवार के संघर्ष और अंग्रेजी शासन की सख्ती के उदाहरण के रूप में बताया जाता है।

साथी धनना-माधव की शहादत का भी उल्लेख

स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े स्थानीय विवरणों में उनके साथी धनना-माधव की शहादत का भी उल्लेख मिलता है।

बताया जाता है कि अगस्त 1942 में अंग्रेजी गोलीबारी के दौरान उनकी मृत्यु हुई थी। इस घटना की तारीख को लेकर अलग-अलग स्थानीय विवरणों में 13 और 14 अगस्त का उल्लेख मिलता है।

ऐसी घटनाओं के बावजूद आंदोलन से जुड़े लोगों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ अपना संघर्ष जारी रखा।

गांधीजी के संसारपुर पहुंचने का भी मिलता है उल्लेख

ब्रह्मदेव चौधरी की गिरफ्तारी और परिवार की स्थिति की जानकारी महात्मा गांधी तक पहुंचने का उल्लेख भी स्थानीय एवं पारिवारिक विवरणों में मिलता है।

कहा जाता है कि गांधीजी संसारपुर पहुंचे और परिवार के सदस्यों से मुलाकात की। उन्होंने परिस्थितियों की जानकारी लेने के बाद संबंधित अधिकारियों के सामने भी मामला उठाया।

परिवार के अनुसार, इसके बाद जेल में ब्रह्मदेव चौधरी को अपर डिवीजन बंदी का दर्जा मिला।

हालांकि, गांधीजी के इस दौरे से जुड़े दावों की पुष्टि के लिए मूल ऐतिहासिक दस्तावेजों और समकालीन अभिलेखों का अध्ययन महत्वपूर्ण होगा।

आजादी के बाद शिक्षा और समाज के लिए किया काम

देश आजाद होने के बाद भी ब्रह्मदेव चौधरी का सामाजिक योगदान जारी रहा।

परिवार और स्थानीय लोगों के अनुसार, उन्होंने युवाओं को शिक्षा के लिए प्रेरित किया और समाज में जागरूकता बढ़ाने का प्रयास किया।

उनका विचार था कि स्वतंत्रता का मतलब केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं है। एक मजबूत समाज के लिए शिक्षा, जागरूकता और आत्मनिर्भरता भी जरूरी है।

इसी सोच के साथ उन्होंने अपने आसपास के लोगों को आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया।

सरकारी पेंशन लेने से कर दिया इनकार

आजादी के बाद सरकार ने स्वतंत्रता सेनानियों के सम्मान और सहायता के लिए पेंशन की व्यवस्था की। लेकिन उपलब्ध पारिवारिक विवरणों के अनुसार, ब्रह्मदेव चौधरी ने सरकारी पेंशन लेने से इनकार कर दिया।

उनका मानना था कि देश की आजादी के लिए किया गया संघर्ष उनका कर्तव्य था, जिसके बदले किसी आर्थिक लाभ की अपेक्षा नहीं होनी चाहिए।

यही सोच उनके जीवन की सबसे खास पहचान बन गई। उनके लिए स्वतंत्रता आंदोलन व्यक्तिगत लाभ हासिल करने का जरिया नहीं, बल्कि मातृभूमि के प्रति जिम्मेदारी थी।

102 वर्ष की उम्र में हुआ निधन

उपलब्ध विवरणों के अनुसार, ब्रह्मदेव चौधरी का जन्म वर्ष 1900 में हुआ था। उन्होंने करीब 102 वर्ष का जीवन जिया और 22 मई 2002 को उनका निधन हुआ।

आज भी संसारपुर और आसपास के इलाकों में उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन के एक साहसी सेनानी के रूप में याद किया जाता है।

इतिहास में ऐसे नायकों की कहानी क्यों जरूरी है?

ब्रह्मदेव चौधरी की कहानी यह याद दिलाती है कि भारत की आजादी केवल कुछ बड़े आंदोलनों और चर्चित नेताओं की कहानी नहीं थी।

देश के गांवों और कस्बों में भी हजारों लोगों ने गिरफ्तारी, आर्थिक नुकसान, यातना और लंबे कारावास का सामना किया। इनमें कई नाम इतिहास की मुख्यधारा में जगह नहीं बना सके।

47 बंदूकें बरामद होने का दावा, माता-पिता की गिरफ्तारी के बाद खुद पुलिस के सामने पहुंचना, 11 दिनों की हिरासत, आजीवन कारावास, चार सेंट्रल जेलों में रहना और आजादी के बाद पेंशन ठुकराना—ब्रह्मदेव चौधरी के जीवन से जुड़े ये प्रसंग उनके साहस और त्याग की तस्वीर पेश करते हैं।

हालांकि इन स्थानीय एवं पारिवारिक दावों को आधिकारिक अभिलेखों से जोड़कर संरक्षित करना भी उतना ही जरूरी है, ताकि आने वाली पीढ़ियां स्वतंत्रता आंदोलन के स्थानीय इतिहास को प्रमाणिक रूप में समझ सकें।

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