श्रावणी मेले में मालिनी अवस्थी ने बांधा समां, लोकगीतों पर दिया बड़ा संदेश
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👉 WhatsApp से जुड़ेंमालिनी अवस्थी सुलतानगंज श्रावणी मेला में अपनी दमदार प्रस्तुति से हजारों श्रद्धालुओं का दिल जीत लिया। मालिनी अवस्थी सुलतानगंज श्रावणी मेला कार्यक्रम में शिवभक्ति, लोकसंगीत और सांस्कृतिक विरासत का अनूठा संगम देखने को मिला। विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेले के दौरान सुलतानगंज के नमामि गंगे घाट पर आयोजित सांस्कृतिक संध्या में पद्मश्री लोक गायिका मालिनी अवस्थी ने अपने भजनों और लोकगीतों से ऐसा माहौल बनाया कि पूरा घाट 'हर-हर महादेव' के जयघोष और तालियों की गूंज से भर उठा। कार्यक्रम के बाद उन्होंने लोकसंगीत, संस्कृति और नई पीढ़ी की जिम्मेदारी पर खुलकर अपने विचार भी साझा किए।
श्रावणी मेले में हर साल देशभर से लाखों कांवड़िये और श्रद्धालु पहुंचते हैं। इस बार धार्मिक आस्था के साथ लोकसंगीत की यह विशेष प्रस्तुति भी आकर्षण का केंद्र बनी।
शिवभक्ति और लोकसंगीत ने बांधा समां
सोमवार रात नमामि गंगे घाट पर आयोजित कार्यक्रम में मालिनी अवस्थी ने "भोला भंडारी..." और "डम-डम डमरू बजावे ला..." जैसे लोकप्रिय भजन और लोकधुनें प्रस्तुत कीं।
उनकी आवाज़ पर श्रद्धालु झूम उठे और पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया। मंच के सामने मौजूद हजारों लोगों ने तालियों और 'हर-हर महादेव' के उद्घोष के साथ कलाकारों का उत्साह बढ़ाया।
कार्यक्रम में शिवभक्ति के साथ भारतीय लोकसंस्कृति की झलक भी साफ दिखाई दी, जिसने आयोजन को और खास बना दिया।
"लोकगीत किसी कलाकार की नहीं, समाज की धरोहर हैं"
कार्यक्रम के बाद बातचीत में मालिनी अवस्थी ने लोकसंगीत की बदलती स्थिति पर चिंता जताई।
उन्होंने कहा कि आजकल कुछ शब्द जोड़कर किसी भी रचना को लोकगीत कह दिया जाता है, जबकि वास्तविक लोकगीत समाज की सामूहिक स्मृतियों, परंपराओं, लोकजीवन और पीढ़ियों के अनुभवों से जन्म लेते हैं।
उनके अनुसार लोकगीत किसी एक कलाकार की निजी रचना नहीं होते, बल्कि वे पूरे समाज की सांस्कृतिक धरोहर होते हैं जिन्हें आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंचाना जरूरी है।
नई पीढ़ी को अपनी भाषा और संस्कृति से जोड़ने की अपील
मालिनी अवस्थी ने अभिभावकों और युवाओं को खास संदेश भी दिया।
उन्होंने कहा कि बच्चों को आधुनिक शिक्षा देना जरूरी है, लेकिन इसके साथ उन्हें अपनी मातृभाषा, लोकगीतों और सांस्कृतिक परंपराओं से भी जोड़कर रखना चाहिए।
उनका मानना है कि जो बच्चा अपनी जड़ों से जुड़ा रहता है, वही समाज और संस्कृति के प्रति संवेदनशील नागरिक बनता है।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि नई पीढ़ी अपनी भाषा और लोकधुनों से दूर हो जाएगी तो धीरे-धीरे हमारी सांस्कृतिक पहचान कमजोर पड़ सकती है।
"फुहड़पन नहीं, आत्मिक आनंद देता है लोकसंगीत"
लोकप्रिय लोकगायिका ने कहा कि संगीत का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज को जोड़ना और मन को शांति देना भी है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि फुहड़पन कभी भी भारतीय लोकसंस्कृति का विकल्प नहीं बन सकता। लोकसंगीत लोगों को अपनी मिट्टी, अपनी परंपरा और अपनी पहचान से जोड़ने का सबसे प्रभावी माध्यम है।
उन्होंने कहा कि भारतीय लोकधुनों में गांव, खेत-खलिहान, परिवार और सामाजिक जीवन की झलक दिखाई देती है, जिसे संरक्षित रखना समय की आवश्यकता है।
कलाकारों ने भी दी शानदार संगत
कार्यक्रम में मालिनी अवस्थी के साथ कई कलाकारों ने अपनी प्रस्तुति से शाम को यादगार बनाया।
कीबोर्ड पर सचिन कुमार गुप्ता, बैंजो पर सनी, गिटार पर ध्रुव चौहान, ढोलक पर अमित कुमार, पैड पर धर्मेंद्र कुमार और तबले पर राजेश मिश्रा ने संगीत की शानदार संगत की। कार्यक्रम का संचालन अंकित पल्लव ने किया।
संगीत और भक्ति के इस संगम ने उपस्थित श्रद्धालुओं को लंबे समय तक मंत्रमुग्ध बनाए रखा।
डीएम और एसएसपी ने किया सम्मानित
कार्यक्रम के समापन पर भागलपुर की जिलाधिकारी अलंकृता पांडेय और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक प्रमोद कुमार यादव ने पद्मश्री मालिनी अवस्थी को अंगवस्त्र और स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया।
सम्मान ग्रहण करने के बाद उन्होंने लोगों से अपनी भाषा बोलने, लोकगीत गाने और आने वाली पीढ़ियों को भारतीय संस्कृति से जोड़ने की अपील की।
श्रावणी मेले में उनकी प्रस्तुति ने यह संदेश भी दिया कि धार्मिक आयोजन केवल आस्था का नहीं, बल्कि भारतीय लोकसंस्कृति और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का भी महत्वपूर्ण मंच हैं।
