58 साल बाद भी दिलों में बसा है ये गीत, शादी की खुशी का एहसास

📌 पटना और बिहार के सभी ज़िलों की ताज़ा ख़बरें सीधे अपने मोबाइल पर पाएं!

👉 WhatsApp से जुड़ें


 

‘मैं तो भूल चली बाबुल का देश’ आज भी हिंदी सिनेमा के उन यादगार गीतों में शामिल है, जो शादी के बाद नई जिंदगी की खुशी को बेहद खूबसूरती से बयां करते हैं। ‘मैं तो भूल चली बाबुल का देश’ गीत 1968 में आई फिल्म ‘सरस्वतीचंद्र’ का हिस्सा था और इसे लता मंगेशकर ने अपनी सुरीली आवाज दी थी। नूतन पर फिल्माया गया यह गीत मायके से विदाई के बाद ससुराल को अपनाने की खुशी और नए रिश्तों में मिलने वाले अपनापन को दर्शाता है।

गीत की सबसे खास बात यह है कि इसमें विदाई का दर्द और मायके से बिछड़ने की उदासी हावी नहीं होती। इसके बजाय एक नवविवाहिता अपने नए घर और रिश्तों को लेकर उत्साहित नजर आती है।

58 साल बाद भी क्यों खास है यह गाना?

1968 में रिलीज हुई फिल्म ‘सरस्वतीचंद्र’ का यह गीत करीब छह दशक बाद भी अपनी मिठास बनाए हुए है। इसकी लोकप्रियता की बड़ी वजह इसके सरल और भावपूर्ण बोल माने जाते हैं।

गीत में एक लड़की अपने बाबुल के घर से आगे बढ़कर पिया के घर को अपनी नई दुनिया के रूप में स्वीकार करती है। उसके मन में अपने नए परिवार के सदस्यों को लेकर अपनापन दिखाई देता है।

यही भाव इस गीत को शादी और ससुराल से जुड़े प्रसंगों में आज भी प्रासंगिक बनाता है। इसकी धुन सुनते ही पुराने दौर की शादियों और पारिवारिक रिश्तों की तस्वीर सामने आने लगती है।

ननद में बहन और सास में मां का अपनापन

गाने के बोलों में नई दुल्हन के मन की सबसे खूबसूरत तस्वीर दिखाई देती है। वह अपने ससुराल के रिश्तों में मायके जैसे अपनापन तलाशती है।

ननद में उसे बहन की झलक मिलती है, जबकि सास के रूप में उसे मां जैसी ममता महसूस होती है। वहीं ससुर में उसे पिता की छवि दिखाई देती है।

यही विचार गीत को सिर्फ एक प्रेम गीत से आगे ले जाता है। यह शादी के बाद एक लड़की के नए रिश्तों को स्वीकार करने और उन्हें अपने जीवन का हिस्सा बनाने की भावनाओं को सामने रखता है।

गीत का संदेश बेहद सहज है—नया घर धीरे-धीरे अपनेपन से भर सकता है और नए रिश्ते भी पुराने रिश्तों जैसी गर्माहट दे सकते हैं।

लता मंगेशकर की आवाज ने बढ़ाई मिठास

इस गीत को लता मंगेशकर ने आवाज दी थी। उनकी आवाज की सहजता और मिठास ने गीत की भावनाओं को और प्रभावशाली बना दिया।

गीतकार इंदीवर ने सरल शब्दों में नवविवाहिता के मन की बात लिखी। वहीं कल्याणजी-आनंदजी के संगीत ने गीत को चंचल और खुशनुमा अंदाज दिया।

गीत की धुन में लोक संगीत की झलक भी महसूस होती है। इसी वजह से इसमें एक पारंपरिक भारतीय शादी और पारिवारिक उत्सव जैसा माहौल पैदा होता है।

लता मंगेशकर की आवाज में गीत की खुशी और उत्साह इतनी स्वाभाविक लगती है कि सुनने वाला आसानी से उस दौर और परिस्थिति से जुड़ जाता है।

‘सरस्वतीचंद्र’ ने दिया था यादगार संगीत

‘मैं तो भूल चली बाबुल का देश’ फिल्म ‘सरस्वतीचंद्र’ का हिस्सा था। यह फिल्म 1968 में रिलीज हुई थी और इसका निर्देशन गोविंद सरैया ने किया था।

फिल्म में नूतन और मनीष मुख्य भूमिकाओं में थे। इसकी कहानी प्रसिद्ध गुजराती उपन्यासकार गोवर्धनराम माधवराम त्रिपाठी के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित थी।

फिल्म का संगीत कल्याणजी-आनंदजी ने तैयार किया था। ‘सरस्वतीचंद्र’ के संगीत को उस दौर में काफी सराहना मिली और इसे राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।

फिल्म के दूसरे गाने भी रहे यादगार

‘सरस्वतीचंद्र’ का संगीत सिर्फ एक गीत तक सीमित नहीं था। फिल्म के कई गाने आज भी पुराने हिंदी फिल्म संगीत के प्रशंसकों के बीच लोकप्रिय हैं।

‘चंदन सा बदन’, ‘छोड़ दे सारी दुनिया’ और ‘फूल तुम्हें भेजा है खत में’ जैसे गीतों ने भी फिल्म के संगीत को अलग पहचान दी।

इसी संगीत-संग्रह में ‘मैं तो भूल चली बाबुल का देश’ ने शादी और पारिवारिक रिश्तों से जुड़े भावों को अपनी अलग जगह दी।

विदाई के दुख की जगह नई जिंदगी की खुशी

भारतीय फिल्मों में शादी और विदाई से जुड़े गीत अक्सर भावुकता और बिछड़ने के दर्द को सामने लाते हैं। लेकिन यह गीत उस परंपरा से थोड़ा अलग दिखाई देता है।

इसमें मायके को छोड़ने की पीड़ा के बजाय नई जिंदगी को अपनाने का उत्साह ज्यादा दिखाई देता है। नवविवाहिता अपने पति और नए परिवार के प्रति लगाव महसूस करती है।

यही सकारात्मक भाव इसे शादी के बाद की खुशियों से जोड़ता है। गीत सुनते हुए ऐसा लगता है कि लड़की अपने पुराने रिश्तों को छोड़ नहीं रही, बल्कि नए रिश्तों में भी उसी अपनापन को तलाश रही है।

आज की पीढ़ी से भी जुड़ता है गीत

समय बदल गया, संगीत का अंदाज बदल गया और शादी के समारोहों का स्वरूप भी काफी बदल चुका है। इसके बावजूद इस गीत की भावनाएं आज भी समझ में आती हैं।

शादी के बाद नई जिंदगी शुरू करने वाली हर लड़की के लिए नए रिश्तों को समझना और उन्हें अपनाना एक खास अनुभव होता है। गीत इसी बदलाव को सकारात्मक अंदाज में पेश करता है।

यही वजह है कि 58 साल बाद भी ‘मैं तो भूल चली बाबुल का देश’ सिर्फ एक पुराना फिल्मी गीत नहीं लगता। यह भारतीय परिवार, विवाह और रिश्तों की उस भावना को संजोए हुए है, जो पीढ़ियों के बदलने के बावजूद अपनी जगह बनाए रखती है।

लता मंगेशकर की मधुर आवाज, इंदीवर के सरल बोल और कल्याणजी-आनंदजी की यादगार धुन ने मिलकर इस गीत को ऐसा रूप दिया, जिसकी मिठास समय के साथ कम नहीं हुई।


#LataMangeshkar #MainToBhoolChali #Saraswatichandra #OldHindiSongs #BollywoodSongs

🛍️ ऑनलाइन शॉपिंग करें
Amazon, Flipkart, Myntra और AJIO पर खरीदारी करें
यहाँ से खरीदारी करने पे एक्स्ट्रा डिस्काउंट मिल सकता है।
Next Post Previous Post
"ताज़ा ख़बरें पाएं"
1