JPSC-JSSC नियुक्ति रद्द करने के आदेश पर हाईकोर्ट की रोक, बड़ी राहत
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👉 WhatsApp से जुड़ेंझारखंड में JPSC-JSSC परीक्षा और नियुक्तियों को लेकर चल रहे विवाद में नवनियुक्त अधिकारियों और अभ्यर्थियों को बड़ी राहत मिली है। JPSC-JSSC परीक्षा से जुड़ी नियुक्तियां रद्द करने के राज्य सरकार के आदेश पर झारखंड हाईकोर्ट ने अंतरिम रोक लगा दी है। जस्टिस दीपक रौशन की अदालत ने अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए फिलहाल सरकार के फैसले को लागू करने पर रोक लगाई। कोर्ट ने राज्य सरकार और संबंधित आयोग से जवाब भी मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 15 सितंबर को होगी।
सरकार ने क्यों रद्द की थीं JPSC-JSSC परीक्षाएं?
राज्य सरकार ने JPSC और JSSC से जुड़ी कई परीक्षाओं और उनके आधार पर हुई नियुक्तियों को रद्द करने का फैसला लिया था। सरकार की ओर से कहा गया था कि कुछ परीक्षाओं में गड़बड़ी की शिकायतें सामने आई थीं।
इन शिकायतों और CID की जांच के दौरान सामने आए तथ्यों के आधार पर सरकार ने यह कदम उठाया। इसके साथ ही JPSC और JSSC की परीक्षा प्रणाली में सुधार के लिए एक कमेटी गठित करने की बात भी कही गई थी।
रद्द किए गए परीक्षाओं की सूची में कई महत्वपूर्ण सरकारी पदों की भर्ती शामिल थी। इनमें डिप्टी कलेक्टर, असिस्टेंट प्रोफेसर, ड्रग इंस्पेक्टर, डेंटल डॉक्टर, असिस्टेंट इंजीनियर, सिविल जज, एडिशनल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर और फॉरेस्ट रेंज ऑफिसर जैसे पद शामिल बताए गए।
इसके अलावा सरकारी पॉलिटेक्निक में लेक्चरर, सीनियर साइंटिफिक ऑफिसर, असिस्टेंट कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट और विभिन्न प्रशासनिक एवं तकनीकी पदों से संबंधित परीक्षाएं भी इस कार्रवाई के दायरे में आई थीं।
सफल अभ्यर्थियों ने हाईकोर्ट में दी चुनौती
सरकार के फैसले के खिलाफ सफल अभ्यर्थियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। चार अलग-अलग याचिकाओं में 11वीं से 13वीं JPSC संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा, JSSC-CGL और फूड सेफ्टी ऑफिसर परीक्षा के सफल उम्मीदवारों ने अपनी नियुक्तियों को रद्द किए जाने का विरोध किया।
याचिकाकर्ताओं में अवधेश कुमार, दीपमाला, सोनम कुमारी और सौरभ सिंह समेत अन्य सफल अभ्यर्थी शामिल हैं। उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता इंद्रजीत सिन्हा और अमृतांश वत्स ने अदालत के समक्ष पक्ष रखा।
याचिकाकर्ताओं की मुख्य दलील थी कि सरकार ने परीक्षा और नियुक्तियां रद्द करने से पहले उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर नहीं दिया। कई उम्मीदवार चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद सरकारी सेवा में योगदान भी कर चुके थे।
ऐसे में अचानक नियुक्तियां रद्द होने से उनकी नौकरी सीधे खतरे में पड़ गई। अभ्यर्थियों ने कहा कि अगर किसी विशेष उम्मीदवार की भूमिका संदिग्ध है तो उसके खिलाफ अलग से जांच और कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन सभी सफल उम्मीदवारों को एक साथ दोषी मानना उचित नहीं है।
कोर्ट ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत पर उठाया सवाल
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया। उनका कहना था कि किसी व्यक्ति के खिलाफ प्रतिकूल कार्रवाई करने से पहले उसे अपना पक्ष रखने का उचित अवसर मिलना चाहिए।
अदालत ने भी प्रथम दृष्टया इस पहलू पर विचार किया। कोर्ट के अनुसार अभी तक ऐसा ठोस साक्ष्य सामने नहीं आया है, जिससे यह स्पष्ट हो कि परीक्षा में गड़बड़ी के लिए कौन-कौन लोग जिम्मेदार हैं।
ऐसी स्थिति में सभी सफल अभ्यर्थियों की नियुक्तियां रद्द करना उचित है या नहीं, इस पर अदालत ने सवाल उठाया। इसी आधार पर सरकार के आदेश पर अंतरिम रोक लगाने का फैसला किया गया।
कोर्ट के इस आदेश से उन नवनियुक्त अधिकारियों और कर्मचारियों को तत्काल राहत मिली है, जिनकी नौकरी सरकार के रद्दीकरण आदेश के कारण संकट में आ गई थी।
11वीं-13वीं JPSC और फूड सेफ्टी ऑफिसर को राहत
हाईकोर्ट ने 11वीं से 13वीं JPSC परीक्षा से जुड़े सफल अभ्यर्थियों को तत्काल ज्वाइन करने का निर्देश भी दिया है। इससे उन उम्मीदवारों के लिए रास्ता साफ हुआ है, जो नियुक्ति रद्द होने के कारण असमंजस में थे।
इसी तरह Food Safety Officer की नियुक्तियों को रद्द करने के सरकारी आदेश पर भी अगले आदेश तक रोक लगा दी गई है। इस मामले में भी राज्य सरकार और JPSC से जवाब मांगा गया है।
अदालत ने फिलहाल अंतिम फैसला नहीं सुनाया है। इसलिए यह रोक अंतरिम राहत के तौर पर है और आगे की सुनवाई में मामले के तथ्यों, जांच और सरकार के जवाब पर विस्तार से विचार किया जाएगा।
15 सितंबर को होगी अगली सुनवाई
झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से मामले में जवाब दाखिल करने को कहा है। अगली सुनवाई 15 सितंबर को निर्धारित की गई है।
अब सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि परीक्षाओं और नियुक्तियों को व्यापक स्तर पर रद्द करने का आधार क्या था और जांच में किस तरह के तथ्य सामने आए हैं। दूसरी ओर, याचिकाकर्ता अपने चयन और नियुक्ति की प्रक्रिया को सही साबित करने के लिए अदालत के सामने अपना पक्ष रखेंगे।
फिलहाल हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश ने सैकड़ों अभ्यर्थियों के लिए राहत की स्थिति पैदा कर दी है। हालांकि, परीक्षा में कथित अनियमितताओं की जांच और नियुक्तियों की अंतिम वैधता पर फैसला आगे की न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट होगा।
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