12 साल से दफ्तर नहीं, फिर भी वेतन जारी! बिहार उद्यमी आयोग पर सवाल
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👉 WhatsApp से जुड़ेंपटना: बिहार उद्यमी आयोग को लेकर बिहार की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। बिहार उद्यमी आयोग का गठन उद्यमियों और कारोबारियों की समस्याओं को दूर करने तथा उद्योग लगाने की प्रक्रिया आसान बनाने के उद्देश्य से किया गया था। लेकिन उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक, गठन के वर्षों बाद भी आयोग के पास स्थायी कार्यालय नहीं है। अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति के बावजूद उसके कामकाज को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। इसी मुद्दे पर राजद नेता रोहिणी आचार्य ने सरकार पर निशाना साधा है।
रोहिणी आचार्य ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए बिहार सरकार से सवाल पूछा कि जब राज्य को मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने और निवेश आकर्षित करने की बात हो रही है, तब उद्यमियों की शिकायतों के समाधान के लिए बनाए गए आयोग की स्थिति ऐसी क्यों है।
क्या है बिहार उद्यमी आयोग का मामला?
बिहार में उद्योग और कारोबार से जुड़े लोगों को सरकारी विभागों के चक्कर से राहत देने के उद्देश्य से राज्य उद्यमी एवं व्यवसायी आयोग की स्थापना की प्रक्रिया शुरू हुई थी।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, आयोग के गठन की प्रक्रिया 2008 में शुरू हुई और वर्ष 2014 में इसका औपचारिक गठन किया गया। इसका उद्देश्य उद्यमियों और व्यवसायियों की समस्याओं को सरकार तक पहुंचाना तथा उनके सामने आने वाली प्रशासनिक अड़चनों के समाधान में मदद करना था।
लेकिन आरोप है कि इतने वर्षों बाद भी आयोग के पास अपना नियमित कार्यालय नहीं है। इससे उसके वास्तविक कामकाज और शिकायत निवारण व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।
12 साल बाद भी स्थायी दफ्तर नहीं होने का दावा
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि आयोग के पास लंबे समय से अपना स्थायी कार्यालय नहीं है। इसके कारण उद्यमियों को अपनी शिकायतें दर्ज कराने के लिए स्पष्ट व्यवस्था नहीं मिल पा रही है।
आरोप यह भी है कि आयोग के अध्यक्ष और सदस्य फोन पर बातचीत या अनौपचारिक स्थानों पर बैठकें करते हैं। ऐसे में जिस संस्था का उद्देश्य कारोबारियों के लिए एक औपचारिक शिकायत निवारण मंच उपलब्ध कराना था, उसकी कार्यप्रणाली पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
यदि किसी व्यापारी को प्रशासनिक परेशानी या किसी विभाग से जुड़ी शिकायत हो, तो उसे आयोग तक पहुंचने के लिए पहले संपर्क का माध्यम तलाशना पड़ता है। स्थायी कार्यालय नहीं होने से यह प्रक्रिया और जटिल हो सकती है।
रोहिणी आचार्य ने सरकार पर साधा निशाना
रोहिणी आचार्य ने एक मीडिया रिपोर्ट का हवाला देते हुए बिहार सरकार की उद्योग और रोजगार नीति पर सवाल उठाए। उनका कहना है कि एक तरफ बिहार को औद्योगिक और मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने की बातें हो रही हैं, जबकि दूसरी तरफ उद्यमियों की समस्याओं के लिए गठित आयोग ही अव्यवस्थित स्थिति में है।
उन्होंने आरोप लगाया कि आयोग का वर्षों तक दफ्तर नहीं होना केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि उद्योग और रोजगार के प्रति सरकारी उदासीनता को दिखाता है।
रोहिणी ने यह भी सवाल उठाया कि अगर सरकार निवेशकों को बिहार आने के लिए आमंत्रित कर रही है, तो उनके लिए बनाई गई संस्थाओं को मजबूत और प्रभावी क्यों नहीं बनाया जा रहा है।
हालांकि, रोहिणी आचार्य के ये राजनीतिक आरोप हैं। सरकार की ओर से इस मुद्दे पर विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया इस उपलब्ध जानकारी में सामने नहीं आई है।
अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति पर भी सवाल
मामले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू आयोग के पदाधिकारियों की नियुक्ति से जुड़ा है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, जून 2025 में विधानसभा चुनाव से पहले आयोग में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष समेत पदाधिकारियों की नियुक्ति की गई थी।
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि नियुक्ति के बाद करीब 15 महीने बीतने के बावजूद आयोग का नियमित कामकाज प्रभावी तरीके से शुरू नहीं हो सका।
यही वजह है कि अध्यक्ष और सदस्यों को मिलने वाले वेतन को लेकर भी राजनीतिक सवाल उठाए जा रहे हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, अध्यक्ष को करीब एक लाख रुपये और प्रत्येक सदस्य को लगभग 75 हजार रुपये मासिक वेतन दिए जाने का दावा किया गया है।
यदि ये आंकड़े आधिकारिक रूप से सही हैं, तो आयोग की उपयोगिता और खर्च के बीच संतुलन को लेकर सरकार से जवाब मांगना स्वाभाविक है।
आयोग में IAS अधिकारी भी तैनात
आयोग की व्यवस्था में एक IAS अधिकारी को सचिव के तौर पर तैनात किए जाने की जानकारी भी सामने आई है। इसके बावजूद आयोग के पास स्थायी कार्यालय और स्पष्ट कार्यप्रणाली नहीं होने का आरोप लगाया जा रहा है।
रिपोर्ट के मुताबिक, आयोग की कई प्रशासनिक गतिविधियां उद्योग विभाग के अधिकारियों के माध्यम से संचालित होती हैं। नीतिगत मामलों, पत्राचार और बैठकों से जुड़े काम में विभाग की भूमिका महत्वपूर्ण बताई गई है।
ऐसे में एक सवाल यह भी उठता है कि स्वतंत्र आयोग के रूप में इसकी वास्तविक भूमिका कितनी प्रभावी है और उद्यमियों की समस्याओं के समाधान में उसे कितनी स्वायत्तता प्राप्त है।
दफ्तर नहीं होने से उद्यमियों को क्या नुकसान?
किसी भी शिकायत निवारण संस्था के लिए आसान पहुंच और स्पष्ट प्रक्रिया बेहद जरूरी होती है। यदि उद्यमियों को शिकायत दर्ज कराने के लिए अलग-अलग अधिकारियों या विभागों के चक्कर लगाने पड़ें, तो आयोग बनाने का मूल उद्देश्य कमजोर पड़ सकता है।
बिहार जैसे राज्य में छोटे कारोबारियों और नए उद्यमियों के लिए प्रशासनिक प्रक्रियाएं पहले से ही बड़ी चुनौती हो सकती हैं। ऐसे में एक प्रभावी आयोग उन्हें विभागीय स्तर की समस्याओं से राहत देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
स्थायी कार्यालय, शिकायत दर्ज करने की व्यवस्था, समयबद्ध सुनवाई और फैसलों के अनुपालन की निगरानी जैसी व्यवस्थाएं आयोग को अधिक उपयोगी बना सकती हैं।
बिहार में उद्योग के बड़े दावों के बीच उठे सवाल
बिहार सरकार लगातार निवेश, उद्योग, रोजगार और मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने की बात करती रही है। ऐसे में उद्यमी आयोग की स्थिति का मुद्दा सरकार के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि निवेशकों के लिए केवल नीतियां बनाना पर्याप्त नहीं होता।
जमीन, बिजली, अनुमति, प्रशासनिक मंजूरी और स्थानीय स्तर की समस्याओं के समाधान के लिए प्रभावी संस्थागत व्यवस्था भी जरूरी होती है।
अब देखना होगा कि सरकार बिहार उद्यमी आयोग की स्थिति को लेकर क्या कदम उठाती है। क्या आयोग को स्थायी कार्यालय मिलेगा? क्या शिकायत निवारण व्यवस्था को मजबूत किया जाएगा? और क्या अध्यक्ष एवं सदस्यों की भूमिका को स्पष्ट करते हुए आयोग को वास्तविक अधिकार दिए जाएंगे?
इन सवालों के जवाब यह तय करने में महत्वपूर्ण होंगे कि बिहार में उद्यमियों के लिए बनाई गई यह संस्था वास्तव में कितनी प्रभावी साबित होती है।
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