UDISE+ Report 2025-26: स्कूल छोड़ने वाले छात्रों की संख्या घटी, शिक्षा व्यवस्था में बड़ा सुधार
भारत की स्कूली शिक्षा व्यवस्था में पिछले कुछ वर्षों के दौरान कई महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिले हैं। UDISE+ Report 2025-26 के अनुसार देशभर में स्कूल छोड़ने वाले छात्रों (ड्रॉपआउट) की संख्या में उल्लेखनीय कमी आई है। इसके साथ ही स्कूलों में शिक्षकों की संख्या बढ़ी है, छात्र-शिक्षक अनुपात बेहतर हुआ है और कंप्यूटर व इंटरनेट जैसी डिजिटल सुविधाओं का विस्तार भी हुआ है।
शिक्षा मंत्रालय की ओर से जारी इस रिपोर्ट के लिए देशभर के 14 लाख से अधिक स्कूलों से आंकड़े जुटाए गए हैं। रिपोर्ट बताती है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के कई लक्ष्य धीरे-धीरे जमीन पर दिखाई देने लगे हैं। हालांकि कुछ क्षेत्रों में अब भी सुधार की जरूरत बनी हुई है, खासकर इंटरनेट कनेक्टिविटी, दिव्यांग छात्रों की पहुंच और बुनियादी सुविधाओं को लेकर।
ड्रॉपआउट दर में बड़ी गिरावट, माध्यमिक शिक्षा में बढ़ी छात्रों की भागीदारी
रिपोर्ट के अनुसार माध्यमिक स्तर पर स्कूल छोड़ने वाले छात्रों की संख्या में बड़ी कमी दर्ज की गई है। वर्ष 2022-23 में जहां ड्रॉपआउट दर 13.8 प्रतिशत थी, वहीं 2025-26 में यह घटकर 7 प्रतिशत रह गई है।
इसी तरह प्रारंभिक तैयारी (Preparatory Stage) स्तर पर भी ड्रॉपआउट दर 8.7 प्रतिशत से घटकर 1.8 प्रतिशत हो गई है। यह बदलाव इस बात का संकेत है कि पहले की तुलना में अधिक छात्र अपनी पढ़ाई जारी रख रहे हैं।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि माध्यमिक स्तर पर Gross Enrolment Ratio (GER) बढ़कर 68.5 प्रतिशत से 71.7 प्रतिशत हो गया है। यानी अब पहले की तुलना में अधिक बच्चे माध्यमिक शिक्षा में दाखिला ले रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि माध्यमिक विद्यालयों की संख्या बढ़ने से छात्रों को अपने क्षेत्र के आसपास ही आगे की पढ़ाई का अवसर मिल रहा है, जिससे ड्रॉपआउट में कमी आई है।
बढ़ी शिक्षकों की संख्या, छात्र-शिक्षक अनुपात हुआ बेहतर
रिपोर्ट के अनुसार देश में स्कूल शिक्षकों की कुल संख्या अब 1.02 करोड़ से अधिक हो चुकी है। वर्ष 2022-23 में यह संख्या लगभग 94 लाख थी।
शिक्षकों की संख्या बढ़ने का सीधा असर Pupil Teacher Ratio (PTR) पर भी दिखाई दिया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में छात्र-शिक्षक अनुपात 30:1 रखने का लक्ष्य तय किया गया था, लेकिन वर्तमान स्थिति इससे भी बेहतर बताई गई है।
विभिन्न स्तरों पर छात्र-शिक्षक अनुपात इस प्रकार है—
- फाउंडेशन स्तर – 10:1
- प्रिपरेटरी स्तर – 12:1
- मिडिल स्तर – 17:1
- सेकेंडरी स्तर – 21:1
इसका अर्थ है कि अब छात्रों को शिक्षकों से अधिक व्यक्तिगत मार्गदर्शन और बेहतर शैक्षणिक सहयोग मिलने की संभावना बढ़ी है।
डिजिटल सुविधाओं में सुधार, लेकिन कई चुनौतियां अब भी बाकी
रिपोर्ट में स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं में भी सुधार दर्ज किया गया है। वर्ष 2022-23 में जहां केवल करीब 48 प्रतिशत स्कूलों में कंप्यूटर उपलब्ध थे, वहीं अब यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 70 प्रतिशत तक पहुंच गया है।
इंटरनेट सुविधा भी पिछले चार वर्षों में बेहतर हुई है और अब करीब 68 प्रतिशत स्कूलों में इंटरनेट उपलब्ध है।
हालांकि रिपोर्ट यह भी बताती है कि अभी भी लगभग एक-तिहाई स्कूल इंटरनेट से वंचित हैं, जो डिजिटल शिक्षा के विस्तार में बड़ी चुनौती बनी हुई है।
इसी तरह स्कूलों में महिला शिक्षकों की भागीदारी में केवल सीमित वृद्धि दर्ज हुई है। वर्ष 2022-23 में महिला शिक्षकों की हिस्सेदारी 52 प्रतिशत थी, जो अब बढ़कर 54.9 प्रतिशत हुई है।
रिपोर्ट में दिव्यांग छात्रों की सुविधा को लेकर भी चिंता जताई गई है। देश के करीब 42 प्रतिशत स्कूलों में अब भी हैंडरेल वाली रैंप उपलब्ध नहीं है। इसके अलावा कुछ स्कूलों में खेल मैदान की उपलब्धता में मामूली कमी और वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) जैसी पर्यावरणीय व्यवस्थाओं का विस्तार भी अपेक्षा से कम पाया गया।
कुल मिलाकर UDISE+ Report 2025-26 यह संकेत देती है कि भारत की स्कूली शिक्षा व्यवस्था में पिछले कुछ वर्षों के दौरान सकारात्मक बदलाव हुए हैं। ड्रॉपआउट दर में कमी, शिक्षकों की बढ़ती संख्या और डिजिटल संसाधनों का विस्तार शिक्षा क्षेत्र के लिए अच्छी खबर है। हालांकि गुणवत्तापूर्ण और समावेशी शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए इंटरनेट कनेक्टिविटी, दिव्यांग-अनुकूल बुनियादी ढांचे और अन्य आवश्यक सुविधाओं पर अभी भी लगातार काम करने की जरूरत बनी हुई है।
