Saudi-Houthi War: 4 साल बाद फिर भड़की यमन जंग, मिडिल ईस्ट में बढ़ा बड़े युद्ध का खतरा
Saudi-Houthi War एक बार फिर वैश्विक चिंता का विषय बन गया है। Saudi-Houthi War में पिछले कुछ दिनों के दौरान तेजी से बढ़ी सैन्य गतिविधियों ने मिडिल ईस्ट की सुरक्षा स्थिति को फिर से अस्थिर कर दिया है। रेड सी क्षेत्र में मिसाइल और ड्रोन हमलों के बाद सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने जवाबी हवाई कार्रवाई शुरू कर दी है। ऐसे में 2022 के युद्धविराम के बाद शांत दिख रहा यमन संघर्ष फिर से बड़े युद्ध की ओर बढ़ता नजर आ रहा है।
करीब चार वर्षों तक अपेक्षाकृत शांत रहे इस संघर्ष ने अब नई दिशा ले ली है। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका-ईरान तनाव और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में बदलाव ने इस विवाद को फिर से भड़काने में अहम भूमिका निभाई है।
यमन में नया विवाद कैसे शुरू हुआ?
हालिया तनाव की शुरुआत 13 जुलाई को हुई। जानकारी के अनुसार, कुछ हूती नेता ईरान से यमन लौट रहे थे। सऊदी समर्थित यमन सरकार ने उनके विमान को सना एयरपोर्ट पर उतरने की अनुमति नहीं दी।
सरकार चाहती थी कि हूती नेता राष्ट्रीय एयरलाइन से यात्रा करें, जबकि हूती ईरानी विमान पर ही लौटने पर अड़े रहे। विवाद बढ़ने के बाद सरकार समर्थित बलों ने सना एयरपोर्ट के रनवे को नुकसान पहुंचाया।
इसके बाद विमान हूदैदाह एयरपोर्ट पर उतरा और हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के खिलाफ समुद्री नाकेबंदी की घोषणा कर दी। यहीं से दोनों पक्षों के बीच तनाव तेजी से बढ़ने लगा।
अमेरिका-ईरान तनाव का यमन पर क्या असर पड़ा?
जब अमेरिका और इजराइल ने ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया था, तब हूती विद्रोही सीधे संघर्ष में शामिल नहीं हुए थे। हालांकि बाद में क्षेत्रीय हालात बदलने के साथ उनका रुख भी अधिक आक्रामक हो गया।
विश्लेषकों का मानना है कि ईरान के करीबी सहयोगी होने के कारण हूती अब क्षेत्रीय समीकरणों में अधिक सक्रिय भूमिका निभाना चाहते हैं। वहीं वे यमन के भीतर अपनी राजनीतिक स्थिति भी मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।
इसी वजह से उनका ध्यान फिर से सऊदी अरब और रेड सी क्षेत्र की ओर केंद्रित हो गया है।
चार साल बाद फिर क्यों भड़क रही है यमन की जंग?
2022 में हुए युद्धविराम के बाद यमन में बड़े पैमाने पर लड़ाई लगभग रुक गई थी। संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता में शांति वार्ता भी जारी रही, लेकिन कोई स्थायी समझौता नहीं हो सका।
दोनों पक्ष लंबे समय तक सीधे बड़े सैन्य संघर्ष से बचते रहे। अब हालिया मिसाइल हमलों और जवाबी हवाई कार्रवाई ने युद्धविराम को कमजोर कर दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मौजूदा तनाव जारी रहा तो यमन एक बार फिर पूर्ण युद्ध की स्थिति में पहुंच सकता है।
हूती और सऊदी अरब के लक्ष्य क्यों अलग हैं?
सऊदी अरब लंबे समय तक चले युद्ध का दोहराव नहीं चाहता। पिछली लड़ाई में उसे भारी आर्थिक और सैन्य नुकसान उठाना पड़ा था।
दूसरी ओर हूती संगठन यमन की सत्ता और तेल संसाधनों में अधिक हिस्सेदारी चाहता है। उनका मानना है कि सैन्य दबाव के जरिए वे राजनीतिक लाभ हासिल कर सकते हैं।
यही कारण है कि एक पक्ष बातचीत पर जोर देता है, जबकि दूसरा सैन्य दबाव बनाए रखना चाहता है।
हूती विद्रोही इतने ताकतवर कैसे बने?
हूती संगठन की शुरुआत उत्तरी यमन के पहाड़ी इलाकों में सक्रिय एक छोटे शिया विद्रोही समूह के रूप में हुई थी।
2011 की अरब क्रांति और राजनीतिक अस्थिरता के दौरान संगठन ने तेजी से अपनी पकड़ मजबूत की। 2014 में हूतियों ने राजधानी सना पर नियंत्रण स्थापित कर लिया।
इसके बाद 2015 में सऊदी अरब ने सैन्य गठबंधन बनाकर हस्तक्षेप किया। वर्षों तक चले संघर्ष के दौरान हूतियों को सैन्य और राजनीतिक समर्थन मिलता रहा, जिससे उनका प्रभाव उत्तरी यमन के बड़े हिस्से तक फैल गया।
गाजा युद्ध ने क्यों बदल दिया पूरा समीकरण?
2022 के बाद उम्मीद थी कि यमन में स्थायी शांति स्थापित हो सकती है। लेकिन अक्टूबर 2023 में गाजा युद्ध शुरू होने के बाद हालात बदल गए।
हूतियों ने हमास के समर्थन में रेड सी से गुजरने वाले जहाजों को निशाना बनाना शुरू किया। इसके जवाब में अमेरिका और उसके सहयोगियों ने हूती ठिकानों पर सैन्य कार्रवाई की।
इससे पहले चल रही शांति प्रक्रिया कमजोर पड़ गई और अब क्षेत्र में फिर से व्यापक संघर्ष की आशंका बढ़ गई है।
क्या मिडिल ईस्ट में बड़े युद्ध का खतरा बढ़ गया है?
मौजूदा हालात केवल यमन तक सीमित नहीं हैं। रेड सी, सऊदी अरब, ईरान, अमेरिका और इजराइल से जुड़े घटनाक्रम पूरे मिडिल ईस्ट की सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित कर रहे हैं।
यदि कूटनीतिक प्रयास सफल नहीं हुए तो यह तनाव क्षेत्रीय संघर्ष को और व्यापक बना सकता है। हालांकि कई देश अब भी बातचीत के जरिए समाधान निकालने की कोशिश कर रहे हैं।
फिलहाल दुनिया की नजर यमन और रेड सी क्षेत्र में होने वाले अगले घटनाक्रम पर बनी हुई है।
