बिहार में बाढ़ से निपटने के लिए सम्राट सरकार का बड़ा फैसला, देश में पहली बार बनी सिल्ट प्रबंधन नीति
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बिहार में हर साल आने वाली बाढ़ और नदियों में जमा होने वाली गाद (सिल्ट) की समस्या से निपटने के लिए राज्य सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने मंगलवार, 3 नवंबर को घोषणा की कि बिहार देश का पहला राज्य बन गया है, जिसने व्यापक सिल्ट प्रबंधन नीति लागू की है। इस नीति का उद्देश्य नदियों में जमा रेत और गाद का वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन करना और उसका इस्तेमाल सड़क, हाईवे तथा अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में करना है।
नई दिल्ली में केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी की मौजूदगी में 'नदी संजीवनी' पहल के तहत एमओयू हस्ताक्षर कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसी कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने बिहार की बाढ़ समस्या और सिल्ट प्रबंधन को लेकर सरकार की योजना साझा की। उन्होंने कहा कि बिहार अपनी प्राकृतिक चुनौतियों को विकास के अवसर में बदल सकता है।
बिहार में बाढ़ की समस्या का बताया बड़ा कारण
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने कहा कि बिहार में बाढ़ की समस्या केवल राज्य में होने वाली बारिश पर निर्भर नहीं करती। नेपाल से आने वाली सात प्रमुख नदियां बिहार में बाढ़ का बड़ा कारण बनती हैं। नेपाल में अधिक बारिश होने पर बिहार के कई इलाकों में पानी का दबाव बढ़ जाता है।
उन्होंने बताया कि इस साल बिहार में सामान्य से 32 प्रतिशत से अधिक कम बारिश हुई, इसके बावजूद तीन प्रमुख नदियों का जलस्तर उच्चतम बाढ़ स्तर तक पहुंच गया। गंगा नदी में भी इस बार पानी का दबाव इतना अधिक रहा कि पिछले 200 वर्षों का हाई फ्लड लेवल रिकॉर्ड टूट गया।
मुख्यमंत्री के अनुसार, गंडक और सोन नदी के जलस्तर में भी बदलाव देखने को मिला। सोन नदी में लगभग 11.5 लाख क्यूसेक पानी पहुंचा। वहीं नेपाल से अलग-अलग समय पर करीब 2 लाख और 5.5 लाख क्यूसेक पानी छोड़े जाने से बिहार की बाढ़ की स्थिति और गंभीर हो गई।
उन्होंने कहा कि गंगा में बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश से लगभग 17 लाख क्यूसेक पानी पहुंचने के कारण नदी का प्राकृतिक बहाव प्रभावित हुआ। इससे पानी का दबाव बढ़ा और तटबंधों के टूटने का खतरा पैदा हुआ।
नदी की गाद से सड़क और हाईवे निर्माण की तैयारी
सम्राट चौधरी ने कहा कि नदियों में वर्षों से जमा रेत और सिल्ट को केवल बाढ़ की समस्या के रूप में नहीं देखना चाहिए। इसका इस्तेमाल आर्थिक गतिविधियों और विकास परियोजनाओं में भी किया जा सकता है।
उन्होंने बांका जिले के ओढ़नी डैम का उदाहरण देते हुए बताया कि शुरुआत में गाद निकालने के लिए करीब 350 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान लगाया गया था। लेकिन राज्य सरकार ने टेंडर जारी किया तो एक निजी ठेकेदार ने उलटे सरकार को 60 करोड़ रुपये देने की पेशकश की।
इस अनुभव से सरकार को समझ आया कि नदी की गाद का व्यावसायिक महत्व भी है। इसके बाद बिहार सरकार ने 'बिहार जल स्रोत पुनर्स्थापन एवं सिल्ट प्रबंधन नीति 2026' तैयार की।
इस नीति के तहत नदियों से निकाली गई उपयोगी मिट्टी और रेत का इस्तेमाल राष्ट्रीय राजमार्ग, सड़क निर्माण, टाउनशिप और अन्य विकास परियोजनाओं में किया जा सकेगा। सरकार का मानना है कि इससे बाढ़ नियंत्रण के साथ-साथ निर्माण कार्यों के लिए जरूरी सामग्री भी उपलब्ध होगी।
किसानों को मिलेगी आर्थिक मदद, गंगा किनारे एक्सप्रेसवे का प्रस्ताव
मुख्यमंत्री ने बाढ़ और खेतों में जमा बालू से प्रभावित किसानों के लिए आर्थिक सहायता की भी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार किसानों को दो हेक्टेयर जमीन के लिए 20 हजार रुपये की सहायता सीधे उपलब्ध करा रही है, ताकि खेतों में जमा बालू को हटाया जा सके।
उन्होंने 2008-09 में सुपौल में आई भीषण बाढ़ का जिक्र करते हुए कहा कि कई किसानों के खेतों में वर्षों तक बालू जमा रहा था। पहले ऐसी समस्या से निपटने के लिए कोई समर्पित नीति नहीं थी।
इसके अलावा मुख्यमंत्री ने केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी से बिहार में गंगा नदी के दोनों किनारों पर चार लेन की सड़क बनाने का प्रस्ताव भी रखा। उन्होंने कहा कि यदि बक्सर से कटिहार और भागलपुर तक नदी के जलमार्ग को व्यवस्थित करने, गाद निकालने और दोनों किनारों पर सड़क बनाने की योजना लागू होती है, तो एक लाख एकड़ से अधिक उपजाऊ जमीन को फिर से उपयोग में लाया जा सकता है।
मुख्यमंत्री ने इस परियोजना को पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल पर विकसित करने का सुझाव दिया। उनका कहना था कि इसके लिए सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ डाले बिना निजी निवेश की मदद ली जा सकती है।
उन्होंने कहा कि 'नदी संजीवनी' पहल सफल होती है तो बिहार को बाढ़ की समस्या से राहत मिलने के साथ-साथ आधारभूत संरचना के विकास और आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में भी बड़ी मदद मिलेगी।
