शारदा सिन्हा जयंती 2026: छठ के गीतों से घर-घर पहुंची बिहार कोकिला की कहानी
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शारदा सिन्हा जयंती 2026: जब छठ महापर्व का नाम आता है, तो बिहार की लोकगायिका शारदा सिन्हा की मधुर आवाज अपने आप याद आने लगती है। उनके छठ गीतों ने बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश की लोक संस्कृति को देश-दुनिया के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई।
हर साल 1 अक्टूबर को शारदा सिन्हा की जयंती मनाई जाती है। उनका जन्म 1 अक्टूबर 1952 को बिहार के सुपौल जिले के हुलास गांव में हुआ था। लोकसंगीत में उनके योगदान के कारण उन्हें ‘बिहार कोकिला’ और ‘स्वर कोकिला’ जैसे संबोधनों से सम्मान मिला।
शारदा सिन्हा का निधन 5 नवंबर 2024 को हुआ, लेकिन उनकी आवाज आज भी लोकगीतों, विवाह गीतों और खासकर छठ गीतों के माध्यम से लोगों के बीच जीवित है। 2025 में भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत पद्म विभूषण से सम्मानित किया।
कौन थीं शारदा सिन्हा?
शारदा सिन्हा भारतीय लोक और शास्त्रीय संगीत की ऐसी कलाकार थीं, जिन्होंने बिहार की पारंपरिक संगीत विरासत को व्यापक पहचान दिलाई।
उनका जन्म सुपौल जिले के हुलास गांव में हुआ था। बचपन से ही उन्हें संगीत में रुचि थी। आगे चलकर उन्होंने संगीत की औपचारिक शिक्षा हासिल की और लोकसंगीत के साथ-साथ शास्त्रीय संगीत में भी अपनी पहचान बनाई।
भारत सरकार के पद्म पुरस्कार संबंधी आधिकारिक विवरण के अनुसार उन्होंने पंडित रघु झा, पंडित सीताराम हरि डांडेकर और पन्ना देवी जैसे संगीत गुरुओं से प्रशिक्षण प्राप्त किया था। उन्होंने भारतीय शास्त्रीय गायन में मास्टर डिग्री हासिल की थी और मणिपुरी नृत्य में भी प्रशिक्षण लिया था।
यही शास्त्रीय प्रशिक्षण आगे चलकर उनकी लोकगायकी में दिखाई दिया। उनकी आवाज में लोकगीतों की सहजता और शास्त्रीय संगीत की पकड़ दोनों का मेल नजर आता था।
शारदा सिन्हा को क्यों कहा जाता है ‘बिहार कोकिला’?
शारदा सिन्हा की पहचान केवल एक गायिका के रूप में नहीं बनी। उनकी आवाज बिहार की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन गई।
उन्होंने मैथिली, भोजपुरी, मगही और हिंदी सहित विभिन्न भाषाओं और लोक परंपराओं में गीत गाए। विवाह गीतों से लेकर पर्व-त्योहारों तक उनकी आवाज लोगों के घरेलू और सामाजिक जीवन का हिस्सा बनी।
उनकी गायकी की सबसे बड़ी पहचान छठ गीत रहे। छठ के दौरान उनके गीत बिहार और आसपास के क्षेत्रों में घर-घर सुनाई देते रहे।
धीरे-धीरे उनकी लोकप्रियता बिहार से बाहर भी पहुंची। प्रवासी भारतीय समुदाय के बीच भी उनके छठ गीतों को विशेष पहचान मिली।
छठ और शारदा सिन्हा का रिश्ता इतना खास क्यों है?
छठ महापर्व बिहार की प्रमुख लोक और धार्मिक परंपराओं में से एक है। इस पर्व के दौरान लोकगीतों का विशेष महत्व होता है।
शारदा सिन्हा ने छठ की इसी लोक परंपरा को अपनी आवाज दी। उनके गीतों में पूजा की श्रद्धा, परिवार की भावनाएं, लोक जीवन और सूर्य उपासना की परंपरा दिखाई देती है।
उनके लोकप्रिय छठ गीतों में ‘केलवा के पात पर उगलन सूरज मल झके-झुके’, ‘पहिले-पहिले छठी मैया’, ‘सुपवो ना मिले माई’, ‘हे छठी मैया’ और ‘बहंगी लचकत जाए’ जैसे गीतों का नाम लिया जाता है। बिहार भवन की एक आधिकारिक प्रकाशन सामग्री के अनुसार उनके करियर में छठ से जुड़े 62 गीतों का उल्लेख मिलता है।
इन गीतों की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि छठ आते ही कई घरों और घाटों पर आज भी उनकी आवाज सुनाई देती है।
लोकगीतों को नई पहचान देने में रहा बड़ा योगदान
शारदा सिन्हा का योगदान केवल छठ गीतों तक सीमित नहीं था।
उन्होंने विवाह गीत, पारंपरिक लोकगीत और विभिन्न सामाजिक अवसरों से जुड़े गीत भी गाए। उनके गीतों में ग्रामीण जीवन, रिश्ते, परंपराएं और लोक संस्कृति की झलक मिलती थी।
भारत सरकार के पद्म पुरस्कार संबंधी आधिकारिक प्रशस्ति में भी उनके गीतों को सामाजिक जीवन के विभिन्न पहलुओं को अभिव्यक्त करने वाला बताया गया है।
उन्होंने लोकसंगीत को केवल गांवों और पारंपरिक आयोजनों तक सीमित नहीं रहने दिया। रेडियो, रिकॉर्डिंग और फिल्मों के माध्यम से उनकी आवाज बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंची।
बॉलीवुड में भी बनाई अलग पहचान
शारदा सिन्हा ने हिंदी फिल्मों के लिए भी अपनी आवाज दी।
उनकी लोकप्रिय फिल्मी प्रस्तुतियों में ‘मैंने प्यार किया’, ‘हम आपके हैं कौन..!’ और ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर-2’ जैसी फिल्मों से जुड़े गीतों का उल्लेख मिलता है। भारत सरकार की पद्म विभूषण प्रशस्ति में भी इन फिल्मों में उनके योगदान का उल्लेख किया गया है।
इस तरह उन्होंने लोकसंगीत और मुख्यधारा के फिल्म संगीत के बीच भी एक कड़ी बनाई।
उनकी आवाज में लोक संस्कृति की पहचान इतनी मजबूत थी कि फिल्मों में गाए गए गीतों के बावजूद उनकी सबसे बड़ी पहचान लोकगायिका के रूप में ही बनी रही।
शारदा सिन्हा को मिले बड़े सम्मान
लोकसंगीत में लंबे योगदान के लिए शारदा सिन्हा को कई महत्वपूर्ण पुरस्कार मिले।
उन्हें 1991 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया। 2000 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला और 2018 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। 2025 में भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत पद्म विभूषण प्रदान किया।
पद्म पुरस्कार की आधिकारिक वेबसाइट पर 2025 के पुरस्कारों में शारदा सिन्हा का नाम कला क्षेत्र में मरणोपरांत पद्म विभूषण पाने वालों में दर्ज है।
ये सम्मान उनके संगीत योगदान की राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता को दर्शाते हैं।
चार पीढ़ियों तक सुनी गई उनकी आवाज
शारदा सिन्हा के गीतों की खासियत यह रही कि वे केवल एक पीढ़ी तक सीमित नहीं रहे।
उनके गीत माता-पिता से बच्चों और फिर अगली पीढ़ियों तक पहुंचते रहे। भारत सरकार की प्रशस्ति में भी उनके गीतों के चार पीढ़ियों तक गाए जाने और बिहार तथा उत्तर प्रदेश के लोगों में उनसे जुड़ी पुरानी यादों का उल्लेख मिलता है।
यही कारण है कि शारदा सिन्हा की आवाज को केवल मनोरंजन के नजरिए से नहीं देखा जाता। उनके गीत लोक संस्कृति के दस्तावेज की तरह भी काम करते हैं।
संगीत के क्षेत्र में उनकी शिक्षा और योगदान
शारदा सिन्हा ने संगीत को केवल मंचीय प्रदर्शन तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने लंबे समय तक संगीत शिक्षा से भी जुड़कर काम किया।
भारत सरकार के आधिकारिक विवरण के अनुसार उन्होंने समस्तीपुर के महिला कॉलेज के संगीत विभाग में चार दशकों से अधिक समय तक अपनी सेवाएं दीं। 2018 में ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय ने उन्हें मानद डॉक्टर ऑफ लिटरेचर की उपाधि से सम्मानित किया।
इससे उनके जीवन का एक और पहलू सामने आता है। वह केवल कलाकार नहीं थीं, बल्कि संगीत की शिक्षा और लोक परंपरा को आगे बढ़ाने वाली शिक्षिका भी थीं।
विदेशों तक पहुंची बिहार की लोकधुन
शारदा सिन्हा की आवाज बिहार की सीमाओं तक नहीं रुकी।
भारत सरकार के पद्म विभूषण प्रशस्ति के अनुसार उन्होंने सांस्कृतिक प्रतिनिधि के रूप में मॉरीशस, सूरीनाम, जर्मनी, बेल्जियम, नीदरलैंड, लक्जमबर्ग और मिस्र सहित कई देशों में भारतीय लोकसंगीत प्रस्तुत किया।
इन प्रस्तुतियों के माध्यम से भोजपुरी, मैथिली और भारतीय लोकसंगीत की परंपराओं को अंतरराष्ट्रीय मंच मिला।
खासकर प्रवासी भारतीयों के लिए उनके गीत अपनी मिट्टी और संस्कृति से जुड़ने का माध्यम बने।
शारदा सिन्हा की आवाज में ऐसा क्या खास था?
शारदा सिन्हा की गायकी में सबसे खास बात उनकी आवाज की सहजता और भावनात्मक जुड़ाव था।
वह लोकगीतों को इस तरह प्रस्तुत करती थीं कि गीतों में मौजूद पारंपरिक शब्द और भाव आम श्रोता तक आसानी से पहुंचते थे।
उनकी आवाज में ग्रामीण बिहार की मिट्टी, त्योहारों की परंपरा और परिवार की भावनाएं एक साथ महसूस होती थीं।
यही कारण है कि उनके गीत किसी एक वर्ग या उम्र तक सीमित नहीं रहे।
शारदा सिन्हा का अंतिम दौर और निधन
शारदा सिन्हा ने जीवन के अंतिम वर्षों तक संगीत से अपना रिश्ता बनाए रखा।
2024 में उनके निधन की खबर से बिहार समेत देश के संगीत प्रेमियों में शोक की लहर दौड़ गई। उनका निधन 5 नवंबर 2024 को हुआ। उनकी उम्र 72 वर्ष थी।
उनके निधन के बाद भी उनकी आवाज पहले की तरह लोगों के बीच मौजूद रही। खासकर छठ के दौरान उनके पुराने गीतों की मांग और लोकप्रियता उनकी सांस्कृतिक विरासत को दिखाती है।
शारदा सिन्हा जयंती 2026 का महत्व
शारदा सिन्हा जयंती 2026 उनके जन्मदिवस के साथ-साथ बिहार की लोकसंगीत परंपरा को याद करने का अवसर भी है।
1 अक्टूबर को उनकी जयंती पर उनके गीतों, जीवन और संगीत योगदान को याद किया जाता है। स्कूल, कॉलेज और सांस्कृतिक संस्थानों में लोकसंगीत की भूमिका पर कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं।
आज के डिजिटल दौर में भी शारदा सिन्हा के गीतों की लोकप्रियता यह बताती है कि पारंपरिक संगीत आधुनिक माध्यमों के जरिए नई पीढ़ी तक पहुंच सकता है।
उनकी सबसे बड़ी विरासत यही है कि उन्होंने लोकगीतों को मंच, रेडियो, फिल्मों और अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक कार्यक्रमों तक पहुंचाया।
नई पीढ़ी के लिए शारदा सिन्हा की सबसे बड़ी सीख
शारदा सिन्हा का जीवन नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जुड़े रहने की सीख देता है।
उन्होंने लोकसंगीत को आधुनिक मंचों तक पहुंचाया, लेकिन अपनी जड़ों को नहीं छोड़ा। यही संतुलन उनकी पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बना।
आज जब संगीत के क्षेत्र में तेजी से बदलाव हो रहा है, तब उनकी यात्रा यह दिखाती है कि पारंपरिक संगीत को नई प्रस्तुति और नए माध्यमों के साथ आगे बढ़ाया जा सकता है।
उनकी कहानी मेहनत, संगीत साधना और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी हुई कहानी है।
