खगड़िया के संसारपुर में 251 साल से विराज रहीं मां दुर्गा, जानें अनोखी परंपरा
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👉 WhatsApp से जुड़ेंखगड़िया। वरिष्ठ संवाददाता दीपक कुमार।
खगड़िया जिले के संसारपुर में संसारपुर दुर्गा पूजा की परंपरा करीब 251 वर्षों से चली आ रही है। ढाई शताब्दियों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी संसारपुर दुर्गा पूजा का धार्मिक महत्व बरकरार है। शारदीय नवरात्र के दौरान यहां मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की जाती है और पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना होती है। इस ऐतिहासिक परंपरा को देखने और मां के दर्शन करने के लिए दूर-दराज के इलाकों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं।
संसारपुर की दुर्गा पूजा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि क्षेत्र की आस्था, संस्कृति और पारंपरिक विरासत का प्रतीक भी है। संसारपुर दुर्गा पूजा समिति की देखरेख में होने वाले इस आयोजन में पुरानी मान्यताओं और रीति-रिवाजों का विशेष ध्यान रखा जाता है। प्रतिमा निर्माण से लेकर प्राण-प्रतिष्ठा तक, यहां की कई परंपराएं आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ रही हैं।
251 वर्षों से कैसे चली आ रही है संसारपुर की दुर्गा पूजा?
स्थानीय लोगों और पूजा समिति के कार्यकर्ताओं के अनुसार, संसारपुर में मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित करने की शुरुआत करीब 251 वर्ष पहले हुई थी। बताया जाता है कि मूर्ति कलाकार बंदीलाल मिस्त्री के पूर्वजों ने सबसे पहले मां दुर्गा की प्रतिमा बनाकर यहां स्थापित की थी।
उस समय से शुरू हुई पूजा की परंपरा धीरे-धीरे क्षेत्र की धार्मिक पहचान बन गई। वर्षों के दौरान पीढ़ियां बदलती रहीं, लेकिन मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित करने और विधि-विधान से पूजा करने की परंपरा जारी रही।
आज भी इस आयोजन में स्थानीय लोगों की सक्रिय भागीदारी रहती है। श्रद्धालु मां के दर्शन करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। नवरात्र के दौरान मंदिर परिसर में भक्तिमय माहौल रहता है और मां के जयकारों से आसपास का क्षेत्र गूंज उठता है।
प्रतिमा विसर्जन से जुड़ी है अनोखी मान्यता
संसारपुर की दुर्गा पूजा से जुड़ी एक पुरानी मान्यता प्रतिमा विसर्जन को लेकर भी प्रचलित है। स्थानीय लोगों के अनुसार, जब पहली बार बंदीलाल मिस्त्री के पूर्वजों ने मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की थी, तब पूजा के बाद विसर्जन के समय प्रतिमा को उठाने का प्रयास किया गया।
बताया जाता है कि उस समय प्रतिमा अपनी जगह से नहीं उठी। इसके बाद ग्रामीण एकत्र हुए और मां से क्षमा याचना करते हुए प्रार्थना की कि वे हर वर्ष प्रतिमा स्थापित कर पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना करेंगे।
स्थानीय मान्यता के मुताबिक, प्रार्थना के बाद प्रतिमा को विसर्जन के लिए उठाया जा सका। इसके बाद हर साल पूजा करने की परंपरा आगे बढ़ती रही। यह कथा आज भी संसारपुर की दुर्गा पूजा से जुड़ी लोकमान्यताओं में विशेष स्थान रखती है।
हालांकि, यह विवरण स्थानीय धार्मिक मान्यता पर आधारित है। इसकी ऐतिहासिक पुष्टि के लिए स्वतंत्र दस्तावेज उपलब्ध होने की जानकारी नहीं दी गई है।
पाठा और भैंसा बलि की पुरानी परंपरा
संसारपुर दुर्गा मंदिर में पाठा और भैंसा बलि दिए जाने की परंपरा भी लंबे समय से चली आ रही है। स्थानीय लोगों के अनुसार, यह धार्मिक अनुष्ठान यहां की पुरानी पूजा पद्धति का हिस्सा है।
पूजा के दौरान स्थानीय रीति-रिवाजों और निर्धारित धार्मिक विधियों का पालन किया जाता है। इन परंपराओं के कारण संसारपुर की दुर्गा पूजा की अपनी अलग पहचान बनी हुई है।
धार्मिक आयोजन में शामिल होने वाले श्रद्धालुओं के लिए मां दुर्गा के दर्शन और पूजा-अर्चना विशेष महत्व रखते हैं। नवरात्र के दौरान मंदिर में भक्तों की आवाजाही बढ़ जाती है।
स्वर्ण मंदिर की तर्ज पर बना है संसारपुर दुर्गा मंदिर
संसारपुर दुर्गा मंदिर की बनावट भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र है। मंदिर को स्वर्ण मंदिर की तर्ज पर बनाया गया है। इसकी वजह से धार्मिक आयोजन के दौरान यहां आने वाले लोगों का विशेष ध्यान मंदिर की संरचना की ओर जाता है।
श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए मंदिर परिसर में महिला और पुरुष भक्तों के लिए अलग-अलग कतारों की व्यवस्था की जाती है। इससे दर्शन के दौरान भीड़ को व्यवस्थित रखने और लोगों को आसानी से पूजा करने में मदद मिलती है।
स्थानीय लोगों का विश्वास है कि मां दुर्गा के दरबार में सच्चे मन से मांगी गई मनोकामना पूरी होती है। इसी आस्था के कारण नवरात्र के अवसर पर संसारपुर और आसपास के क्षेत्रों के अलावा दूर-दराज से भी लोग यहां पहुंचते हैं।
पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ रही प्रतिमा निर्माण की परंपरा
संसारपुर की दुर्गा पूजा की खास बात यह भी है कि प्रतिमा निर्माण की परंपरा आज तक जारी है। पूजा समिति के कार्यकर्ताओं के अनुसार, सबसे पहले बंदीलाल मिस्त्री के पूर्वजों ने मां दुर्गा की प्रतिमा तैयार की थी।
इसके बाद परिवार की अगली पीढ़ियों ने इस काम को आगे बढ़ाया। बताया जाता है कि बंदीलाल मिस्त्री के पुत्र भी वर्षों से मां दुर्गा की प्रतिमा का निर्माण करते आ रहे हैं।
इस तरह प्रतिमा निर्माण और पूजा-अर्चना की परंपरा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं रही, बल्कि इससे स्थानीय शिल्पकला और पारिवारिक विरासत भी जुड़ी हुई है। पीढ़ियों से चले आ रहे इस काम ने संसारपुर की दुर्गा पूजा को एक विशिष्ट पहचान दी है।
जितिया के दिन होता है प्रतिमाओं का प्राण-प्रतिष्ठा अनुष्ठान
संसारपुर की दुर्गा पूजा में जितिया का दिन भी विशेष महत्व रखता है। आयोजकों के अनुसार, इसी दिन सभी प्रतिमाओं में प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है।
इस अनुष्ठान का समय पहले से निर्धारित रहता है। पूजा समिति और परंपरा से जुड़े लोग समय का विशेष ध्यान रखते हैं। आयोजकों का कहना है कि निर्धारित समय में एक सेकंड का भी अंतर नहीं होने दिया जाता।
यह परंपरा आयोजन की विशिष्ट धार्मिक मान्यताओं और अनुशासन को दर्शाती है। प्राण-प्रतिष्ठा के साथ ही पूजा से जुड़े अनुष्ठानों का महत्व और बढ़ जाता है।
संसारपुर की पहचान बनी 251 साल पुरानी विरासत
शारदीय नवरात्र शुरू होते ही संसारपुर का माहौल भक्तिमय हो जाता है। मंदिर में पूजा-अर्चना, धार्मिक अनुष्ठान और मां दुर्गा के जयकारों के बीच श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
करीब 251 वर्षों से चली आ रही यह परंपरा संसारपुर की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। प्रतिमा निर्माण से लेकर प्राण-प्रतिष्ठा और पूजा की अन्य रस्मों तक, स्थानीय लोगों की भागीदारी इसे जीवंत बनाए रखती है।
बदलते समय के बावजूद इस परंपरा का जारी रहना स्थानीय समुदाय की आस्था और सांस्कृतिक निरंतरता को दर्शाता है। आने वाली पीढ़ियों तक इस विरासत को पहुंचाना भी क्षेत्र के लोगों के लिए महत्वपूर्ण है।
