महिला के ऊपर लेटना और मुंह बंद करना रेप की कोशिश नहीं? पटना हाईकोर्ट का फैसल
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पटना हाईकोर्ट ने बलात्कार की कोशिश से जुड़े एक मामले में अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल महिला के ऊपर लेटने और उसका मुंह बंद करने से अपने आप बलात्कार की कोशिश का अपराध साबित नहीं हो जाता। पटना हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोप की गंभीरता के साथ-साथ घटना से जुड़े ठोस सबूतों को देखना जरूरी है। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपी की दोषसिद्धि और सजा पर विचार किया तथा उसकी सजा को पहले से काटी गई अवधि तक सीमित कर दिया।
लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, यह मामला फरवरी 2010 की एक घटना से जुड़ा था। आरोपी को पहले भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376/511 के तहत चार साल और धारा 448 के तहत छह महीने की सजा सुनाई गई थी। दोनों सजाएं साथ-साथ चलनी थीं।
क्या था पूरा मामला?
अभियोजन पक्ष के अनुसार, घटना 8 फरवरी 2010 की सुबह करीब 10 बजे हुई थी। एक विधवा महिला अपने बच्चों के साथ घर में सो रही थी। इसी दौरान एक व्यक्ति कथित तौर पर घर में घुस आया और महिला के ऊपर लेटकर उसका मुंह बंद कर दिया।
रिपोर्ट के मुताबिक, महिला के चिल्लाने की आवाज सुनकर आसपास के ग्रामीण मौके पर पहुंचे। उन्होंने कथित आरोपी को पकड़ लिया। इसके बाद मामला पुलिस और अदालत तक पहुंचा।
निचली अदालत ने आरोपी को बलात्कार की कोशिश और घर में अनधिकृत प्रवेश से जुड़े अपराधों में दोषी ठहराया था। उसे IPC की धारा 376/511 के तहत चार साल और धारा 448 के तहत छह महीने की जेल की सजा मिली थी।
आरोपी ने इस फैसले और सजा को पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी। बचाव पक्ष ने महिला के बयान में कथित विसंगतियों का मुद्दा उठाया। उसने यह भी कहा कि घटना के दौरान आरोपी को पकड़ने वाले ग्रामीणों से पूछताछ नहीं की गई थी।
हाईकोर्ट ने किन बातों पर विचार किया?
जस्टिस संदीप कुमार की एकल पीठ ने मामले में यह जांच की कि उपलब्ध साक्ष्य बलात्कार की कोशिश का अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त थे या नहीं। अदालत के सामने मुख्य सवाल यह था कि आरोपी के कथित कृत्य को IPC की धारा 376/511 के तहत बलात्कार की कोशिश माना जाए या धारा 354 के दायरे में आने वाला अपराध।
अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य यह साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं थे कि आरोपी ने बलात्कार करने की कोशिश की थी। कोर्ट ने इस बात पर ध्यान दिया कि किसी गंभीर आरोप में दोषसिद्धि के लिए केवल संदेह या घटना की परिस्थितियां पर्याप्त नहीं होतीं। आरोप को कानूनी कसौटी पर खरा उतरना चाहिए।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी महिला के साथ अभद्र व्यवहार या हमला अपने आप बलात्कार की कोशिश के बराबर नहीं होता। दोनों अपराधों के बीच अंतर समझने के लिए आरोपी के कृत्य, उसकी मंशा और घटना के दौरान उठाए गए कदमों का मूल्यांकन जरूरी है।
बलात्कार की कोशिश साबित करने के लिए क्या जरूरी है?
लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के अमन कुमार मामले में की गई टिप्पणियों का हवाला दिया। अदालत ने इस सिद्धांत पर जोर दिया कि बलात्कार की कोशिश साबित करने के लिए ऐसे ठोस तथ्य होने चाहिए, जो दिखाएं कि आरोपी केवल तैयारी तक सीमित नहीं था, बल्कि उसने अपराध को अंजाम देने की दिशा में प्रत्यक्ष कदम उठाए थे।
कोर्ट ने मामले में कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों से यह साबित नहीं हुआ कि आरोपी ने खुद को या महिला को निर्वस्त्र किया था अथवा शारीरिक संबंध बनाने की दिशा में कोई ऐसा कदम उठाया था, जिससे बलात्कार होने की संभावना स्पष्ट होती।
अदालत के अनुसार, केवल महिला के ऊपर लेटने और उसका मुंह बंद करने की घटना के आधार पर बलात्कार की कोशिश का अपराध साबित नहीं किया जा सकता, जब तक अन्य साक्ष्य आरोपी के इरादे और उसके कृत्य को उस स्तर तक पहुंचने की पुष्टि न करें।
ध्यान देने वाली बात: इस फैसले को यह सामान्य नियम नहीं समझना चाहिए कि महिला के ऊपर लेटना या उसका मुंह बंद करना कभी भी गंभीर यौन अपराध नहीं हो सकता। अदालत ने अपने सामने मौजूद विशेष मामले के तथ्यों और सबूतों के आधार पर निर्णय लिया। किसी दूसरे मामले में निष्कर्ष अलग हो सकता है।
आरोपी की सजा क्यों बदली गई?
हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि और सजा के मामले में उपलब्ध रिकॉर्ड पर विचार करते हुए आरोपी की सजा को उस अवधि तक सीमित कर दिया, जितनी वह पहले ही जेल में काट चुका था।
रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने घटना के बाद बीते लंबे समय, आरोपी के पुराने आपराधिक रिकॉर्ड नहीं होने और 13 साल से अधिक समय तक जमानत पर रहने के दौरान उसके आचरण जैसे पहलुओं पर भी गौर किया।
अदालत ने बताया कि जमानत पर रहने की अवधि में आरोपी ने अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग नहीं किया था। इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए सजा में बदलाव किया गया।
इसका अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने घटना को सही ठहराया। फैसला इस बात पर आधारित था कि उपलब्ध साक्ष्य आरोप को किस कानूनी श्रेणी में साबित करते हैं और सजा तय करते समय किन परिस्थितियों पर विचार किया जाना चाहिए।
फैसले का कानूनी महत्व क्या है?
यह मामला बताता है कि आपराधिक मामलों में अदालत आरोप की गंभीरता के साथ-साथ सबूतों की प्रकृति और कानूनी परिभाषा पर भी ध्यान देती है। बलात्कार की कोशिश जैसे अपराध में आरोपी की मंशा और उसके कथित कृत्य के बीच संबंध स्थापित करना महत्वपूर्ण होता है।
साथ ही, महिला के साथ किसी भी तरह के कथित हमले या अभद्र व्यवहार को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। घटना के तथ्य, गवाहों के बयान, उपलब्ध साक्ष्य और लागू कानून मिलकर तय करते हैं कि अपराध की कौन-सी धारा लागू होगी।
पटना हाईकोर्ट की टिप्पणी इसी कानूनी अंतर को रेखांकित करती है। किसी मामले में अंतिम निष्कर्ष निकालने के लिए पूरे फैसले और उसके तथ्यों को पढ़ना जरूरी है, न कि केवल एक वाक्य के आधार पर उसकी व्याख्या करना।
