नवादा के मां दुर्गा मंदिर में 2050 तक बुकिंग फुल, जानें अनोखी परंपरा
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बिहार के नवादा जिले में मां दुर्गा का एक ऐसा मंदिर है, जहां मन्नत पूरी होने के बाद प्रतिमा बनवाने के लिए श्रद्धालुओं को दशकों तक इंतजार करना पड़ता है। पकरीबरावां प्रखंड के रेवार गांव के रेहड़ी टोला स्थित महाशक्ति दुर्गा मंदिर में मूर्ति निर्माण की बुकिंग 2050 तक पहुंचने की जानकारी सामने आई है। यहां मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु प्रतिमा निर्माण और पूजा-मेला का खर्च उठाते हैं। स्थानीय लोगों के मुताबिक, कई भक्तों को अपनी बारी के लिए 40 से 50 साल तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है। वर्ष 2026 की नवरात्रि में अर्जुन यादव और उनकी पत्नी मानो देवी अपने परिवार की करीब 41 साल पुरानी मन्नत पूरी कर रहे हैं।
2050 तक क्यों भरी है मां के दरबार की बुकिंग?
रेवार गांव के इस मंदिर की सबसे चर्चित परंपरा प्रतिमा निर्माण के लिए पहले से नाम दर्ज कराने की है। मंदिर के पुजारी और कमिटी सदस्य शंभू पांडे के अनुसार, श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने पर परमेश्वर दयाल ने यह व्यवस्था शुरू की थी।
हर साल विजयादशमी के विसर्जन के अगले दिन एकादशी को ग्रामीणों, पुजारियों और कमिटी की बैठक होती है। इसमें पिछले आयोजन का हिसाब-किताब किया जाता है और नए श्रद्धालुओं के नाम दर्ज किए जाते हैं। शंभू पांडे के मुताबिक, 2027 में धमोड़ क्षेत्र के निकट धोड़ा गांव के विनोद यादव की बारी है, जबकि नए नाम दर्ज कराने वालों को 2045 से 2050 या उसके बाद का समय मिल रहा है।
जिस श्रद्धालु की बारी आती है, वह प्रतिमा निर्माण, रंग-रोगन, पूजा और मेले का खर्च उठाता है। स्थानीय श्रद्धालु इसे मां के प्रति आभार जताने की परंपरा मानते हैं।
41 साल बाद अर्जुन यादव के परिवार की मन्नत पूरी
वर्ष 2026 की नवरात्रि में रेहड़ी टोला निवासी अर्जुन यादव और उनकी पत्नी मानो देवी प्रतिमा निर्माण और पूजा का जिम्मा संभाल रहे हैं। यह मन्नत अर्जुन की दिवंगत मां जनक नंदनी ने लगभग 40–41 साल पहले मांगी थी।
परिवार की सदस्य मनीता देवी के अनुसार, गोतिया के विवाद और उत्पीड़न के कारण परिवार को लंबे समय तक परेशानियों का सामना करना पड़ा। जनक नंदनी को करीब 10 साल तक गांव से बाहर रहना पड़ा और परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो गई कि भीख मांगकर गुजारा करने की नौबत आ गई।
उन्होंने मां दुर्गा से संकट दूर होने, रोजगार मिलने और संपत्ति वापस मिलने की मन्नत मांगी थी। परिवार का दावा है कि बाद में संपत्ति वापस मिली और एक बेटे को रेलवे में नौकरी भी मिली। परिवार इन घटनाओं को माता की कृपा से जोड़ता है।
पहली बार बारी आने पर आर्थिक तंगी के कारण जनक नंदनी खर्च नहीं उठा सकीं और उन्होंने अपना नंबर दूसरे श्रद्धालु को दे दिया। अब 41 साल बाद परिवार को दोबारा अवसर मिला है।
बेटे की हत्या के बाद भी नहीं टूटी आस्था
अर्जुन यादव का परिवार खेती-किसानी करता है। परिवार के अनुसार, लगभग पांच साल पहले उनके जवान बेटे अवधेश की हत्या हो गई थी। इस दुखद घटना के बावजूद परिवार ने मन्नत पूरी करने का संकल्प नहीं छोड़ा।
अर्जुन यादव ने खर्च जुटाने के लिए अपनी दो बीघा जमीन गिरवी रख दी। उन्होंने कहा कि माता के प्रति उनका संकल्प पूरा करना जरूरी है। ग्रामीण नीतीश कुमार के मुताबिक, परिवार आर्थिक रूप से सक्षम नहीं होने के बावजूद कर्ज लेकर आयोजन करा रहा है।
यह कहानी परिवार की आस्था और कठिन आर्थिक परिस्थितियों के बीच लिए गए फैसले को सामने लाती है। हालांकि, जमीन गिरवी रखने और पारिवारिक घटनाओं का विवरण स्थानीय लोगों के बयानों पर आधारित है।
करीब 100 साल पुराना है मंदिर का इतिहास
स्थानीय जानकारी के अनुसार, रेवार गांव के महाशक्ति दुर्गा मंदिर का इतिहास लगभग एक सदी पुराना है। वर्ष 1923 में निसंतान जमींदार हर्षहाय लाल ने अपनी मन्नत पूरी होने पर मंदिर के लिए नौ बीघा जमीन दान की थी।
इसके बाद परमेश्वर दयाल ने छोटी-सी झोपड़ीनुमा संरचना में मां दुर्गा की पूजा शुरू की। समय के साथ मंदिर की प्रसिद्धि बढ़ी और दूर-दूर से श्रद्धालु आने लगे। इसी बढ़ती भीड़ के बीच प्रतिमा निर्माण के लिए नंबर लगाने की परंपरा विकसित हुई, जो आज भी जारी है।
कैसे बनती है मां दुर्गा की प्रतिमा?
यहां प्रतिमा निर्माण की शुरुआत कर्मा पूजा के दिन से होती है। पांच कारीगर मिलकर लगभग 15 से 20 दिनों में मिट्टी की प्रतिमा तैयार करते हैं और उसमें रंग-रोगन करते हैं।
नवरात्र की अष्टमी को प्रतिमा स्थापित की जाती है और दो दिनों तक पूजा-अर्चना होती है। विजयादशमी पर प्रतिमा का गांव के तालाब में विसर्जन किया जाता है, लेकिन यहां विसर्जन की प्रक्रिया अलग है।
स्थानीय परंपरा के अनुसार, मिट्टी घुलने के बाद प्रतिमा का लकड़ी का ढांचा निकालकर मंदिर में सुरक्षित रख लिया जाता है। साल भर श्रद्धालु उसी ढांचे की पूजा करते हैं। वरुण कुमार वर्मा, दुलार देवी और अन्य ग्रामीण मंदिर की देखरेख में योगदान देते हैं।
पांच लाख रुपये तक खर्च और बलि की परंपरा
मंदिर के पुजारी शंभू पांडे के अनुसार, पहले पूजा और मेले का खर्च लगभग एक से डेढ़ लाख रुपये होता था, लेकिन अब यह बढ़कर चार से पांच लाख रुपये या उससे अधिक हो सकता है। इस आयोजन का खर्च उस श्रद्धालु का परिवार उठाता है, जिसकी बारी आती है।
स्थानीय जानकारी के अनुसार, महानवमी पर मन्नत पूरी होने की खुशी में 600–700 से लेकर लगभग 1,000 खस्सी यानी बकरों की बलि देने की परंपरा भी बताई जाती है। यह संख्या स्थानीय लोगों और आयोजन से जुड़े व्यक्तियों के दावों पर आधारित है।
नौ दिनों तक जुटते हैं दूर-दराज के श्रद्धालु
स्थानीय लोगों के मुताबिक, बिहार के अलावा झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, पुणे और कर्नाटक से भी श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। कई भक्त नौ दिनों तक मंदिर परिसर में रहकर पूजा-अर्चना करते हैं।
गांव की लगभग 40 महिलाएं दस दिनों तक अन्न त्यागकर मंदिर में साधना करती हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार, वे इस अवधि में मंदिर परिसर से बाहर नहीं निकलतीं। शाम के समय आसपास के करीब 10 किलोमीटर के दायरे से श्रद्धालु पैदल आकर मंदिर में दीप जलाते हैं।
पड़रिया गांव के बिरजू प्रसाद ने बताया कि पारिवारिक परेशानियों के दौरान उन्होंने भी मां की शरण ली थी। उनके अनुसार, बाद में परिवार की स्थिति बेहतर हुई और उन्होंने नवादा तथा दिल्ली में मकान बनाए।
आस्था, परंपरा और लंबा इंतजार
रेवार का मां दुर्गा मंदिर केवल पूजा-अर्चना के लिए ही नहीं, बल्कि प्रतिमा निर्माण की लंबी प्रतीक्षा और मन्नत पूरी करने की परंपरा के लिए भी जाना जाता है। अर्जुन यादव के परिवार की कहानी इस परंपरा से जुड़ी एक भावनात्मक मिसाल है।
मंदिर की मान्यताओं, मन्नतों और चमत्कारों से जुड़े दावे श्रद्धालुओं के व्यक्तिगत विश्वास का हिस्सा हैं। वहीं, बुकिंग की व्यवस्था, पुराने मंदिर का इतिहास और सालाना आयोजन इस गांव की धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान को सामने लाते हैं।
