नालंदा के मां आशापुरी मंदिर में 10 दिन महिलाओं की नो एंट्री, जानें वजह

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नालंदा के मां आशापुरी मंदिर में 10 दिन महिलाओं की नो एंट्री, जानें वजह

बिहार के नालंदा जिले में स्थित मां आशापुरी मंदिर नवरात्र के दौरान अपनी एक अनोखी परंपरा को लेकर चर्चा में रहता है। यहां मां आशापुरी मंदिर में नवरात्र के प्रतिपदा से लेकर विजयादशमी की आरती से पहले तक महिलाओं के प्रवेश पर रोक रहती है। गिरियक प्रखंड के घोसरावां गांव में स्थित इस मंदिर की परंपरा सदियों से चली आने की बात कही जाती है। मंदिर के पुजारी और ग्रामीण इसे तांत्रिक पूजा-पद्धति से जुड़ी परंपरा बताते हैं। नवरात्र के इन दस दिनों में बिहार समेत दूसरे राज्यों से भी श्रद्धालु मां के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं।

कहां स्थित है मां आशापुरी मंदिर?

मां आशापुरी मंदिर नालंदा जिले के गिरियक प्रखंड के घोसरावां गांव में स्थित है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यह बिहारशरीफ मुख्यालय से लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर है। नवरात्र के दौरान यहां विशेष पूजा-अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं।

इस मंदिर की पहचान केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। नवरात्र के दौरान महिलाओं के प्रवेश पर रोक की परंपरा इसे क्षेत्र के दूसरे मंदिरों से अलग बनाती है। मंदिर के पुजारी के मुताबिक, प्रतिपदा से लेकर विजयादशमी की आरती से पहले तक महिलाएं मंदिर के भीतर प्रवेश नहीं करती हैं।

यह परंपरा स्थानीय धार्मिक मान्यताओं और तांत्रिक अनुष्ठानों से जुड़ी बताई जाती है। हालांकि, इस प्रथा की शुरुआत कब हुई और इसके ऐतिहासिक प्रमाण क्या हैं, इसकी स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध जानकारी में नहीं है।

नवरात्र में महिलाओं के प्रवेश पर क्यों रहती है रोक?

मंदिर के पुजारी के अनुसार, नवरात्र के दौरान यहां विशेष तांत्रिक पूजा की जाती है। स्थानीय परंपरा में इसे तंत्रियाण पूजा कहा जाता है। पुजारी का कहना है कि इस पूजा-पद्धति में महिलाओं का मंदिर के भीतर प्रवेश निषेध माना जाता है।

स्थानीय लोगों के मुताबिक, यह नियम प्रतिपदा से शुरू होकर विजयादशमी की आरती से पहले तक लागू रहता है। इसी कारण नवरात्र के दस दिनों में मंदिर के अंदर पूजा करने की व्यवस्था पुरुष श्रद्धालुओं और साधकों के लिए रहती है।

इस परंपरा को लेकर लोगों में उत्सुकता बनी रहती है। कुछ श्रद्धालु इसे पुरानी धार्मिक मान्यता का हिस्सा मानते हैं, जबकि मंदिर से जुड़ी जानकारी जानने के लिए दूर-दराज से आने वाले लोग भी इसके बारे में पूछते हैं।

यह ध्यान रखना जरूरी है कि महिलाओं के प्रवेश पर रोक मंदिर की स्थानीय परंपरा के रूप में बताई गई है। इसे सभी हिंदू मंदिरों या धार्मिक परंपराओं का नियम नहीं माना जा सकता।

राजा घोष से जुड़ी है मंदिर निर्माण की मान्यता

घोसरावां गांव के नाम और मां आशापुरी मंदिर के इतिहास को लेकर एक स्थानीय मान्यता प्रचलित है। पूर्वजों से चली आ रही कथाओं के अनुसार, मंदिर का निर्माण राजा घोष ने करवाया था। इसी वजह से गांव का नाम घोसरावां पड़ा, ऐसा बताया जाता है।

स्थानीय धार्मिक विश्वास यह भी है कि मां आशापुरी इसी क्षेत्र में स्वयं प्रकट हुई थीं। मान्यता के अनुसार, जिस स्थान पर देवी के प्रकट होने की बात कही जाती है, वहीं मंदिर का निर्माण कराया गया।

हालांकि, राजा घोष, मंदिर निर्माण की सटीक तिथि और देवी के प्रकट होने से जुड़ी कथा की पुष्टि के लिए ऐतिहासिक अभिलेख या पुरातात्विक प्रमाण उपलब्ध कराए जाने की जरूरत है। फिलहाल ये बातें स्थानीय परंपरा और धार्मिक आस्था के रूप में प्रचलित हैं।

बौद्ध काल के 1800 भिक्षुओं से जुड़ी मान्यता

मां आशापुरी मंदिर को लेकर एक अन्य मान्यता बौद्ध काल से जुड़ी है। स्थानीय परंपरा के अनुसार, प्राचीन समय में यहां 1800 बौद्ध भिक्षु आकर अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करते थे। इसी मान्यता के कारण मंदिर को मनोकामना पूरी करने वाले धार्मिक स्थल के रूप में देखा जाता है।

श्रद्धालुओं का विश्वास है कि मां आशापुरी के सामने सच्चे मन से प्रार्थना करने पर भक्तों को मानसिक शांति और कठिन परिस्थितियों से जूझने की शक्ति मिलती है। नवरात्र के दौरान कई लोग विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों में शामिल होने के लिए यहां पहुंचते हैं।

हालांकि, 1800 बौद्ध भिक्षुओं से जुड़ी कथा का ऐतिहासिक आधार उपलब्ध जानकारी में स्पष्ट नहीं है। इसलिए इसे प्रमाणित इतिहास के बजाय स्थानीय धार्मिक मान्यता के रूप में समझना उचित होगा।

बिहार से बाहर के राज्यों से भी आते हैं श्रद्धालु

नवरात्र के दौरान मां आशापुरी मंदिर में श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला जारी रहता है। दी गई जानकारी के अनुसार, बिहार के अलावा कोलकाता, ओडिशा, मध्य प्रदेश, असम, दिल्ली और झारखंड से भी भक्त यहां आते हैं।

श्रद्धालु मां की पूजा-अर्चना करते हैं और अपनी मनोकामनाओं के लिए प्रार्थना करते हैं। मंदिर से जुड़ी पुरानी मान्यताएं और नवरात्र में होने वाले विशेष अनुष्ठान इसे स्थानीय धार्मिक परंपरा में महत्वपूर्ण स्थान देते हैं।

दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए मंदिर की प्रवेश परंपरा जानना उपयोगी है। विशेष रूप से नवरात्र के दौरान दर्शन की योजना बनाने वाले लोगों को यात्रा से पहले स्थानीय स्तर पर प्रवेश संबंधी नियमों और पूजा के समय की जानकारी लेनी चाहिए।

मां आशापुरी मंदिर की परंपरा क्यों है खास?

नालंदा का मां आशापुरी मंदिर अपनी धार्मिक मान्यताओं, तांत्रिक पूजा-पद्धति और नवरात्र के दौरान महिलाओं के प्रवेश पर रोक की परंपरा के कारण अलग पहचान रखता है। राजा घोष से जुड़ी कथा और बौद्ध काल के भिक्षुओं की मान्यता भी इसके धार्मिक महत्व से जुड़ी बताई जाती है।

इस मंदिर की परंपरा आज भी स्थानीय आस्था का हिस्सा है। हालांकि, इसके इतिहास और प्रथा की शुरुआत को प्रमाणित रूप से समझने के लिए ऐतिहासिक दस्तावेजों और स्वतंत्र शोध की आवश्यकता बनी हुई है।

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