मधेपुरा का इतिहास: प्राचीन अंग देश से आधुनिक बिहार तक की पूरी कहानी

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मधेपुरा का इतिहास

बिहार के उत्तर-पूर्वी हिस्से में स्थित मधेपुरा का इतिहास प्राचीन सभ्यताओं, धार्मिक आस्थाओं, मिथिला की संस्कृति और कोसी नदी के संघर्ष से जुड़ा हुआ है। मधेपुरा का इतिहास केवल एक जिले के गठन की कहानी नहीं है, बल्कि उस क्षेत्र की यात्रा है जिसने प्राचीन राजवंशों का प्रभाव देखा, धार्मिक परंपराओं को सहेजा और बाढ़ जैसी प्राकृतिक चुनौतियों का सामना करते हुए अपनी अलग पहचान बनाई।

मधेपुरा आज बिहार के कोसी प्रमंडल का एक प्रमुख जिला है। यहां की पहचान खेती, ग्रामीण जीवन, मैथिली संस्कृति, सिंहेश्वर स्थान और शिक्षा के क्षेत्र में बढ़ती गतिविधियों से होती है। इस क्षेत्र की ऐतिहासिक परंपराएं इसे बिहार के महत्वपूर्ण सांस्कृतिक इलाकों में शामिल करती हैं।

मधेपुरा का प्राचीन इतिहास

मधेपुरा क्षेत्र का इतिहास प्राचीन भारत के कई राजवंशों से जुड़ा माना जाता है। जिला प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, प्राचीन काल में यह इलाका अंग देश का हिस्सा रहा और समय के साथ यहां मौर्य, शुंग, कण्व तथा कुषाण जैसे राजवंशों का प्रभाव रहा।

प्राचीन अंग महाजनपद का केंद्र वर्तमान बिहार के पूर्वी हिस्से में था। अंग और मगध के बीच राजनीतिक संबंधों तथा संघर्षों का उल्लेख भारतीय इतिहास में मिलता है। मधेपुरा क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति इसे उत्तर बिहार और पूर्वी बिहार के ऐतिहासिक संपर्क क्षेत्रों से जोड़ती थी।

हालांकि, आज के मधेपुरा जिले की सीमाओं को प्राचीन राज्यों की सीमाओं के बराबर नहीं माना जा सकता। उस समय राजनीतिक क्षेत्रों का विस्तार और प्रशासनिक व्यवस्था अलग-अलग थी।

मौर्य काल से जुड़ी ऐतिहासिक मान्यताएं

मौर्य साम्राज्य प्राचीन भारत के सबसे प्रभावशाली साम्राज्यों में से एक था। चंद्रगुप्त मौर्य और सम्राट अशोक के शासनकाल में साम्राज्य का विस्तार बड़े भूभाग तक हुआ।

मधेपुरा जिला प्रशासन की वेबसाइट उदा-किशनगंज क्षेत्र में मौर्यकालीन स्तंभ का उल्लेख करती है। इसे क्षेत्र के प्राचीन इतिहास से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, किसी पुरातात्विक अवशेष की सटीक तिथि और ऐतिहासिक महत्व तय करने के लिए विशेषज्ञों के अध्ययन को भी ध्यान में रखना चाहिए।

मौर्य काल के बाद इस इलाके पर शुंग और कण्व राजवंशों का प्रभाव रहा। बाद के समय में कुषाण राजवंश का प्रभाव भी इस क्षेत्र से जुड़ी ऐतिहासिक परंपराओं में दिखाई देता है।

कुषाण वंश और भांट समुदाय का उल्लेख

कुषाण राजवंश प्राचीन भारतीय इतिहास का महत्वपूर्ण राजवंश था। इसका प्रभाव उत्तर-पश्चिम भारत से लेकर उत्तर भारत के कई क्षेत्रों तक फैला था। व्यापार, कला और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के विकास में कुषाण शासकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

मधेपुरा जिला प्रशासन के ऐतिहासिक विवरण में शंकरपुर प्रखंड के बसंतपुर और रायभीर गांवों में रहने वाले भांट समुदाय का उल्लेख कुषाण वंश से संबंधित परंपरा के रूप में किया गया है।

यह उल्लेख क्षेत्र की स्थानीय ऐतिहासिक स्मृतियों को समझने में उपयोगी है। हालांकि, किसी समुदाय की वंशावली के बारे में अंतिम निष्कर्ष निकालने के लिए ऐतिहासिक दस्तावेजों, पुरातात्विक प्रमाणों और अन्य शोधों की जरूरत होती है।

मधेपुरा का प्राचीन इतिहास केवल राजाओं और साम्राज्यों तक सीमित नहीं था। ग्रामीण बस्तियां, कृषि, स्थानीय समुदाय और नदियों के किनारे विकसित जीवन भी इस क्षेत्र के सामाजिक इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे होंगे।

गुप्त काल और मिथिला से संबंध

गुप्त काल को भारतीय इतिहास में कला, साहित्य, ज्ञान और सांस्कृतिक विकास के महत्वपूर्ण दौर के रूप में जाना जाता है। मधेपुरा जिला प्रशासन के इतिहास संबंधी विवरण में इस क्षेत्र को गुप्त काल के दौरान मिथिला प्रांत से जुड़ा बताया गया है।

मिथिला की सांस्कृतिक पहचान प्राचीन समय से ही मजबूत रही है। यहां की परंपराओं में भाषा, लोकगीत, धार्मिक अनुष्ठान, विवाह संस्कार और सामाजिक जीवन का विशेष स्थान है।

मधेपुरा की सांस्कृतिक पहचान भी मैथिली परंपराओं से गहराई से जुड़ी है। यहां के ग्रामीण समाज में लोकगीत, पर्व-त्योहार और पारिवारिक रीति-रिवाज आज भी स्थानीय जीवन का हिस्सा हैं।

यह ध्यान रखना जरूरी है कि आधुनिक मधेपुरा जिले की प्रशासनिक सीमा और प्राचीन मिथिला की ऐतिहासिक-सांस्कृतिक सीमा एक जैसी नहीं थीं। फिर भी, सांस्कृतिक संबंधों ने इस क्षेत्र की पहचान को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

मधेपुरा नाम कैसे पड़ा?

मधेपुरा नाम की उत्पत्ति को लेकर अलग-अलग मत मिलते हैं। जिला प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट पर भी इसके नामकरण के कई संभावित कारणों का उल्लेख है।

एक मत के अनुसार, कोसी नदी के पुराने प्रवाह और उसके आसपास के भूभाग के बीच स्थित होने के कारण इस क्षेत्र को कभी ‘मध्यपुर’ या ‘मध्यपुरा’ जैसे नामों से जोड़ा गया। समय के साथ नाम का रूप बदलकर मधेपुरा हो गया होगा।

एक अन्य मत इसे ‘माधवपुर’ नाम से जोड़ता है। इस व्याख्या में भगवान श्रीकृष्ण के माधव नाम और उनसे संबंधित स्थानीय परंपराओं का उल्लेख किया जाता है।

कुछ ऐतिहासिक विवरणों में गंगापुर और स्थानीय राजवंशों से जुड़ी परंपराओं का भी जिक्र मिलता है। लेकिन नाम की उत्पत्ति के इन मतों को अलग-अलग ऐतिहासिक व्याख्याओं के रूप में समझना चाहिए। उपलब्ध जानकारी से किसी एक मत को निर्विवाद रूप से अंतिम नहीं कहा जा सकता।

मध्यकाल में मधेपुरा का इतिहास

प्राचीन राजवंशों के बाद मधेपुरा क्षेत्र पर समय-समय पर अलग-अलग स्थानीय और क्षेत्रीय शासकों का प्रभाव रहा। जिला प्रशासन के ऐतिहासिक विवरण में राजपूत काल के दौरान बिहार के शासकों के प्रभाव तथा रायभीर गांव को भर समुदाय का एक प्रमुख केंद्र बताया गया है।

मध्यकालीन भारत में सत्ता का स्वरूप लगातार बदलता रहा। अलग-अलग इलाकों में स्थानीय शासक, जमींदार और क्षेत्रीय प्रशासनिक व्यवस्थाएं सक्रिय थीं। नदियों और उपजाऊ मैदानों के कारण इस क्षेत्र में कृषि और ग्रामीण बस्तियों का विशेष महत्व रहा होगा।

मुगल काल में तिरहुत सरकार का हिस्सा

मुगल काल में मधेपुरा क्षेत्र को तिरहुत सरकार के अंतर्गत बताया गया है। जिला प्रशासन के इतिहास पृष्ठ के अनुसार, उदाकिशुनगंज के सरसंडी गांव में अकबर के समय की बताई जाने वाली एक मस्जिद मौजूद है।

यह उल्लेख क्षेत्र के मध्यकालीन इतिहास और धार्मिक स्थापत्य की परंपरा को समझने में मदद करता है। मधेपुरा के आसपास के इलाकों में हिंदू और मुस्लिम समुदायों की धार्मिक-सामाजिक परंपराएं समय के साथ विकसित हुईं।

जिला प्रशासन के विवरण में सहूगढ़ गांव से मिले सिक्कों का भी उल्लेख है, जिन्हें सिकंदर शाह के क्षेत्र में आने की परंपरा से जोड़ा गया है। इन सिक्कों और उनसे संबंधित ऐतिहासिक व्याख्याओं को समझने के लिए पुरातात्विक संदर्भ महत्वपूर्ण हैं।

सिंहेश्वर स्थान: मधेपुरा की धार्मिक पहचान

मधेपुरा जिले की सबसे प्रसिद्ध धार्मिक पहचान सिंहेश्वर स्थान मंदिर है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और बिहार के प्रमुख शिवधामों में गिना जाता है।

स्थानीय धार्मिक मान्यता के अनुसार, सिंहेश्वर क्षेत्र का संबंध ऋषि श्रृंगी की तपस्या से है। इसी कारण इस स्थान को प्राचीन काल से पवित्र माना जाता है। यह मान्यता पीढ़ियों से श्रद्धालुओं और स्थानीय समुदायों के बीच प्रचलित है।

धार्मिक परंपराओं में ऋषि श्रृंगी का उल्लेख रामायण से जुड़ी कथाओं में भी मिलता है। हालांकि, मंदिर की उत्पत्ति और प्राचीन इतिहास की हर बात को प्रमाणित ऐतिहासिक घटना मानने के बजाय धार्मिक परंपरा और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर अलग-अलग समझना चाहिए।

सिंहेश्वर मंदिर का महत्व

सिंहेश्वर स्थान में भगवान शिव की पूजा के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। महाशिवरात्रि जैसे अवसरों पर यहां विशेष धार्मिक गतिविधियां होती हैं। मंदिर स्थानीय आस्था के साथ-साथ क्षेत्र की सांस्कृतिक और आर्थिक गतिविधियों में भी योगदान देता है।

धार्मिक आयोजनों के समय दुकानदारों, छोटे व्यापारियों, फूल-माला विक्रेताओं और स्थानीय सेवा प्रदाताओं को भी काम मिलता है। इस तरह सिंहेश्वर स्थान मधेपुरा की पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

कोसी नदी और मधेपुरा का संघर्षपूर्ण इतिहास

मधेपुरा की कहानी कोसी नदी के बिना अधूरी है। कोसी नदी को अक्सर बिहार का ‘शोक’ कहा जाता है, क्योंकि इसके बदलते प्रवाह और बाढ़ ने उत्तर बिहार के कई इलाकों को प्रभावित किया है।

मधेपुरा कोसी के मैदानी क्षेत्र में स्थित है। यहां की भूमि, खेती, बस्तियों और आवागमन पर नदी का लंबे समय से प्रभाव रहा है। जिला प्रशासन के विवरण के अनुसार, पुराने समय में कोसी नदी के प्रवाह में बड़े बदलाव हुए। नदी के रास्ते बदलने से कई इलाकों की भौगोलिक स्थिति प्रभावित हुई।

बाढ़ ने कैसे बदली लोगों की जिंदगी?

बाढ़ के दौरान खेतों में पानी भरना, फसलों का नुकसान, घरों और सड़कों को क्षति पहुंचना तथा लोगों का सुरक्षित स्थानों पर जाना जैसी समस्याएं सामने आती रही हैं। कई बार बाढ़ के बाद मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है, लेकिन अत्यधिक जलभराव और रेत जमा होने से खेती को भारी नुकसान भी हो सकता है।

कोसी क्षेत्र में रहने वाले लोगों ने समय के साथ इन परिस्थितियों के अनुसार जीवन जीने के तरीके विकसित किए। स्थानीय समुदायों की मेहनत, पारस्परिक सहयोग और कृषि पर निर्भरता इस क्षेत्र के सामाजिक इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

वर्ष 2008 की बाढ़

वर्ष 2008 में कोसी क्षेत्र में आई भीषण बाढ़ ने बिहार के कई जिलों को प्रभावित किया। मधेपुरा भी इससे प्रभावित जिलों में शामिल था। इस घटना ने बाढ़ प्रबंधन, तटबंधों की निगरानी, राहत कार्य और आपदा से निपटने की तैयारी की जरूरत को फिर सामने रखा।

इसलिए मधेपुरा का इतिहास केवल प्राचीन राजवंशों या धार्मिक स्थलों की कहानी नहीं है। यह प्रकृति के साथ संघर्ष और जीवन को दोबारा व्यवस्थित करने की मानवीय क्षमता की कहानी भी है।

मधेपुरा जिले का गठन कब हुआ?

मधेपुरा के आधुनिक प्रशासनिक इतिहास में वर्ष 1981 महत्वपूर्ण है। जिला प्रशासन के अनुसार, मधेपुरा को 9 मई 1981 को पूर्ण जिले का दर्जा मिला। इससे पहले यह सहारसा जिले का अनुमंडल था।

प्रशासनिक बदलावों के साथ क्षेत्र में विकास योजनाओं, राजस्व व्यवस्था, पुलिस प्रशासन और सार्वजनिक सेवाओं को अलग जिले के रूप में व्यवस्थित करने का अवसर मिला।

मधेपुरा अनुमंडल से जिला बनने तक

मधेपुरा के प्रशासनिक इतिहास में 19वीं सदी के दौरान अनुमंडल का दर्जा मिलने का उल्लेख है। आधिकारिक जिला वेबसाइट के अनुसार, 9 मई 1845 को मधेपुरा को अनुमंडल का दर्जा मिला था।

1 अप्रैल 1954 को सहारसा जिला बनने के बाद मधेपुरा उसका अनुमंडल बना रहा। बाद में 9 मई 1981 को मधेपुरा को जिला बनाया गया।

21 मई 1983 को उदाकिशुनगंज को अनुमंडल का दर्जा दिया गया। इसके बाद प्रशासनिक जरूरतों के अनुसार नए प्रखंडों का गठन हुआ। 1994 में ग्वालपाड़ा, पुरैनी, बिहारगंज और शंकरपुर जैसे प्रखंडों का गठन हुआ। वर्ष 1999 में घैलाढ़ और गम्हरिया प्रखंड भी बनाए गए।

आज जिले में दो अनुमंडल और 13 प्रखंड हैं। यह प्रशासनिक व्यवस्था ग्रामीण क्षेत्रों तक सरकारी सेवाएं पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

मधेपुरा की भौगोलिक स्थिति और पड़ोसी जिले

मधेपुरा बिहार के उत्तर-पूर्वी हिस्से में स्थित है और कोसी प्रमंडल का हिस्सा है। इसकी भौगोलिक स्थिति इसे आसपास के कई जिलों से जोड़ती है।

इसके आसपास सुपौल, सहरसा, पूर्णिया, अररिया, खगड़िया और भागलपुर जैसे जिले स्थित हैं। जिले का अधिकांश भूभाग मैदानी है और यहां की कृषि व्यवस्था पर नदियों तथा वर्षा का प्रभाव रहता है।

कोसी क्षेत्र की मिट्टी और जलवायु धान, गेहूं और मक्का जैसी फसलों की खेती के लिए महत्वपूर्ण हैं। हालांकि, अत्यधिक वर्षा, बाढ़ और सूखे जैसी स्थितियां किसानों के लिए चुनौती बन सकती हैं।

मधेपुरा की अर्थव्यवस्था और कृषि का इतिहास

मधेपुरा की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि रहा है। ग्रामीण आबादी का बड़ा हिस्सा खेती, पशुपालन, कृषि मजदूरी और छोटे कारोबार से जुड़ा है।

जिला प्रशासन की जानकारी में धान, गेहूं, मक्का, जूट, तिलहन और दलहन को जिले की प्रमुख फसलों में शामिल किया गया है। आम, केला, अमरूद, नारियल और लीची जैसी बागवानी फसलें भी यहां उगाई जाती हैं।

खेती और ग्रामीण बाजार

खेती के साथ-साथ ग्रामीण हाट और साप्ताहिक बाजार स्थानीय अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका निभाते हैं। किसान इन बाजारों के जरिए अपनी उपज बेचते हैं और रोजमर्रा की जरूरतों का सामान खरीदते हैं।

कृषि पर निर्भरता के कारण मौसम में बदलाव का असर स्थानीय आय पर भी पड़ता है। बाढ़ या सूखे की स्थिति में किसानों को फसल नुकसान और आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।

जिले के विकास के लिए कृषि उत्पादों का बेहतर भंडारण, बाजार तक पहुंच, सिंचाई व्यवस्था और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ाना महत्वपूर्ण है।

मैथिली संस्कृति और लोकजीवन

मधेपुरा की संस्कृति पर मिथिला और कोसी क्षेत्र की परंपराओं का प्रभाव दिखाई देता है। मैथिली भाषा, लोकगीत, पारंपरिक विवाह संस्कार, धार्मिक अनुष्ठान और सामुदायिक पर्व यहां के सामाजिक जीवन को विशिष्ट बनाते हैं।

छठ पूजा, होली, दीपावली, दुर्गा पूजा और महाशिवरात्रि जैसे पर्व उत्साह से मनाए जाते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में लोकगीत और पारंपरिक रीति-रिवाज सामाजिक संबंधों को मजबूत बनाते हैं।

मैथिली के साथ हिंदी और स्थानीय बोलियों का भी व्यापक उपयोग होता है। भाषा और लोकसंस्कृति का यह मेल मधेपुरा को एक अलग सांस्कृतिक पहचान देता है।

स्थानीय खानपान, पहनावा और पारिवारिक परंपराओं में भी ग्रामीण बिहार तथा मिथिला की झलक दिखाई देती है। यहां की संस्कृति किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं, बल्कि अलग-अलग सामाजिक समूहों के लंबे सह-अस्तित्व से विकसित हुई है।

शिक्षा और आधुनिक मधेपुरा

आधुनिक मधेपुरा में शिक्षा का महत्व लगातार बढ़ा है। जिले में विद्यालयों और उच्च शिक्षा संस्थानों के माध्यम से विद्यार्थियों को आगे बढ़ने के अवसर मिलते हैं।

मधेपुरा स्थित भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय क्षेत्र की उच्च शिक्षा व्यवस्था का प्रमुख केंद्र है। इससे आसपास के विद्यार्थियों को स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर की पढ़ाई के अवसर मिलते हैं।

शिक्षा के साथ-साथ सड़क, स्वास्थ्य, संचार और रोजगार के क्षेत्र में विकास जिले के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है। ग्रामीण क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं और युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ने से स्थानीय विकास को गति मिल सकती है।

मधेपुरा की आधुनिक पहचान कृषि और धार्मिक पर्यटन के साथ-साथ शिक्षा तथा प्रशासनिक गतिविधियों से भी बन रही है।

मधेपुरा के प्रमुख ऐतिहासिक और दर्शनीय स्थल

मधेपुरा आने वाले लोग धार्मिक और स्थानीय विरासत से जुड़े कई स्थानों को जान सकते हैं।

सिंहेश्वर स्थान मंदिर: भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर जिले का प्रमुख धार्मिक केंद्र है। महाशिवरात्रि के समय यहां विशेष चहल-पहल रहती है।

सरसंडी की ऐतिहासिक मस्जिद: जिला प्रशासन के इतिहास पृष्ठ में उदाकिशुनगंज क्षेत्र के सरसंडी गांव में अकबर के समय की बताई जाने वाली मस्जिद का उल्लेख मिलता है।

सहूगढ़ गांव: यहां से मिले सिक्कों का उल्लेख जिला प्रशासन के ऐतिहासिक विवरण में है। इनसे संबंधित जानकारी को स्थानीय इतिहास और पुरातात्विक अध्ययन के संदर्भ में समझा जा सकता है।

उदा-किशनगंज क्षेत्र: यह क्षेत्र मधेपुरा के ऐतिहासिक और प्रशासनिक विकास की चर्चा में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यहां के पुराने अवशेषों का उल्लेख जिले के इतिहास संबंधी विवरण में किया गया है।

किसी भी ऐतिहासिक स्थल पर जाने से पहले वहां की वर्तमान स्थिति, पहुंचने के रास्ते और स्थानीय नियमों की जानकारी लेना उपयोगी रहेगा।

निष्कर्ष: इतिहास, आस्था और संघर्ष की धरती है मधेपुरा

मधेपुरा का इतिहास कई परतों से मिलकर बना है। प्राचीन अंग देश और मौर्य-कुषाण काल से जुड़ी परंपराएं, मिथिला की सांस्कृतिक विरासत, सिंहेश्वर स्थान की धार्मिक आस्था और कोसी नदी से जुड़ी चुनौतियां इस क्षेत्र को विशिष्ट बनाती हैं।

9 मई 1981 को जिला बनने के बाद मधेपुरा ने अपनी अलग प्रशासनिक पहचान बनाई। आज भी कृषि, शिक्षा, संस्कृति और धार्मिक स्थलों का यहां के जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है।

मधेपुरा की असली पहचान केवल उसके अतीत में नहीं, बल्कि उन लोगों की मेहनत और संघर्ष में भी है जो बाढ़ और अन्य चुनौतियों के बावजूद अपने क्षेत्र को आगे बढ़ाने में जुटे हैं। इतिहास को समझने के लिए स्थानीय परंपराओं के साथ प्रमाणित दस्तावेजों और पुरातात्विक शोध को भी महत्व देना चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

1. मधेपुरा जिला कब बना?
मधेपुरा को 9 मई 1981 को बिहार के अलग जिले का दर्जा मिला।

2. मधेपुरा पहले किस जिले का हिस्सा था?
जिला बनने से पहले मधेपुरा, सहारसा जिले का अनुमंडल था।

3. मधेपुरा का सबसे प्रसिद्ध धार्मिक स्थल कौन-सा है?
सिंहेश्वर स्थान मंदिर जिले का प्रमुख धार्मिक स्थल है, जहां भगवान शिव की पूजा की जाती है।

4. मधेपुरा का नाम कैसे पड़ा?
इसके नाम की उत्पत्ति को लेकर मध्यपुरा और माधवपुर जैसी अलग-अलग व्याख्याएं मिलती हैं। किसी एक व्याख्या को अंतिम रूप से प्रमाणित नहीं माना जा सकता।

5. मधेपुरा की प्रमुख फसलें कौन-सी हैं?
धान, गेहूं, मक्का, जूट, तिलहन और दलहन जिले की प्रमुख फसलों में शामिल हैं।

6. मधेपुरा किस नदी क्षेत्र में स्थित है?
मधेपुरा कोसी नदी के मैदानी क्षेत्र में स्थित है। बाढ़ और नदी के बदलते प्रवाह ने इसके इतिहास तथा कृषि को प्रभावित किया है।

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