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ISRO की बड़ी कामयाबी से गदगद हुए पूर्व प्रमुख, NavIC को लेकर कही बड़ी बात

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ISRO की बड़ी कामयाबी से गदगद हुए पूर्व प्रमुख, NavIC को लेकर कही बड़ी बात

भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए 31 अक्टूबर का दिन एक बड़ी उपलब्धि लेकर आया है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने GSLV-F18 रॉकेट के जरिए NVS-03 नेविगेशन सैटेलाइट को सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में स्थापित कर दिया है। इस सफलता पर इसरो के पूर्व चेयरमैन जी. माधवन नायर ने खुशी जाहिर करते हुए इसे पूरे देश के लिए गर्व का क्षण बताया है।

उन्होंने कहा कि पिछले मिशन में मिली असफलता के बाद NVS-03 का सफल प्रक्षेपण इसरो के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इससे संगठन ने एक बार फिर साबित किया है कि वह कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपने मिशनों को निर्धारित समय पर और सटीकता के साथ पूरा करने की क्षमता रखता है।

माधवन नायर के मुताबिक, इस सफल लॉन्चिंग से इसरो का प्रक्षेपण कार्यक्रम फिर से पटरी पर लौट आया है। यह उपलब्धि भारत की अंतरिक्ष तकनीक और वैज्ञानिकों की मेहनत को भी दर्शाती है।

NavIC सिस्टम की ताकत, GPS से कैसे है अलग?

पूर्व इसरो प्रमुख जी. माधवन नायर ने भारत के स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम NavIC की विशेषताओं पर भी विस्तार से बात की। उन्होंने बताया कि इस क्षेत्रीय नेविगेशन प्रणाली की परिकल्पना उन्होंने वर्ष 2005 में की थी। इसका उद्देश्य भारत और आसपास के क्षेत्रों को सटीक लोकेशन, समय और नेविगेशन सेवाएं उपलब्ध कराना था।

नायर के अनुसार, NavIC की सबसे बड़ी खासियत यह है कि केवल सात सैटेलाइट की मदद से भारतीय उपमहाद्वीप और आसपास के क्षेत्रों में नेविगेशन सेवाएं उपलब्ध कराई जा सकती हैं। वहीं, अमेरिकी GPS सिस्टम में वैश्विक कवरेज के लिए 32 सैटेलाइट का इस्तेमाल किया जाता है।

उन्होंने इसे अंतरिक्ष संसाधनों के कुशल और किफायती इस्तेमाल का उदाहरण बताया। नायर ने यह भी कहा कि उन्हें मिली जानकारी के अनुसार NavIC का प्रदर्शन GPS की तुलना में बेहतर रहा है। इसके सिग्नल विभिन्न सुरक्षा जरूरतों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण हैं।

NVS-03 में स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक, बढ़ेगी आत्मनिर्भरता

NVS-03 मिशन की एक और खास उपलब्धि स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक का विकास और उसका अंतरिक्ष में इस्तेमाल है। माधवन नायर ने कहा कि भारत में विकसित एटॉमिक क्लॉक को इस मिशन में भेजा गया है। इससे देश की नेविगेशन तकनीक को और मजबूती मिलने की उम्मीद है।

एटॉमिक क्लॉक किसी भी नेविगेशन सिस्टम के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि सटीक समय के आधार पर ही सैटेलाइट लोकेशन और दूरी की गणना करने में मदद मिलती है। स्वदेशी तकनीक के सफल इस्तेमाल से भारत को विदेशी उपकरणों पर निर्भरता कम करने में सहायता मिल सकती है।

उन्होंने इसे भारतीय वैज्ञानिकों के लिए आत्मविश्वास बढ़ाने वाला कदम बताया। आने वाले समय में इस तकनीक को और बेहतर बनाना देश के नेविगेशन कार्यक्रम के लिए महत्वपूर्ण होगा।

मोबाइल में सीधे सैटेलाइट इंटरनेट पहुंचाने की तैयारी

माधवन नायर ने भारत के भविष्य के अंतरिक्ष कार्यक्रम को लेकर एक और महत्वपूर्ण सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि अब देश को अंतरिक्ष से सीधे मोबाइल और अन्य हैंडहेल्ड डिवाइस तक संचार सेवाएं पहुंचाने पर काम करना चाहिए।

इसके लिए उन्होंने वर्ष 2010 में लॉन्च किए गए GSAT-6 सैटेलाइट की तकनीक को दोबारा उपयोग में लाने की संभावना जताई। इस सैटेलाइट में विकसित डिप्लॉयबल एंटीना, हाई-पावर एम्पलीफायर और संवेदनशील रिसीवर जैसी तकनीकें सीधे मोबाइल कनेक्टिविटी उपलब्ध कराने में उपयोगी हो सकती हैं।

उनके आकलन के मुताबिक, भारत के लगभग 98.5 प्रतिशत भूभाग पर जमीन आधारित 5G नेटवर्क की पहुंच है। ऐसे में बाकी 1.5 प्रतिशत क्षेत्रों तक इंटरनेट और संचार सेवाएं पहुंचाने में सैटेलाइट नेटवर्क बड़ी भूमिका निभा सकता है।

उन्होंने कहा कि सैटेलाइट कनेक्टिविटी में थोड़ा समय लग सकता है, लेकिन इंटरनेट सेवाओं के लिए यह बड़ी बाधा नहीं होगी। यदि भारत इस दिशा में आगे बढ़ता है, तो दूरदराज के इलाकों में रहने वाले लोगों को भी बेहतर डिजिटल सुविधाएं मिल सकती हैं।

NVS-03 की सफल लॉन्चिंग के साथ भारत ने नेविगेशन के क्षेत्र में अपनी तकनीकी क्षमता का प्रदर्शन किया है। अब स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक और सैटेलाइट आधारित मोबाइल कनेक्टिविटी जैसी योजनाओं पर आगे बढ़ना देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम की अगली बड़ी चुनौती होगी।

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