भागलपुर में 98 लाख के फर्जी भुगतान का खुलासा, DEO-DPO सस्पेंड
📌 पटना और बिहार के सभी ज़िलों की ताज़ा ख़बरें सीधे अपने मोबाइल पर पाएं!
👉 WhatsApp से जुड़ें
भागलपुर के शिक्षा विभाग में 98 लाख रुपये से अधिक के कथित वित्तीय घोटाले ने प्रशासनिक महकमे में हलचल बढ़ा दी है। भागलपुर शिक्षा विभाग घोटाला मामले में जिला शिक्षा पदाधिकारी (DEO) चंदन कुमार और जिला कार्यक्रम पदाधिकारी (DPO) शशि चंद चौधरी को निलंबित कर दिया गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, HRMS पोर्टल पर फर्जी शिक्षिका की पहचान बनाकर 98,12,773 रुपये के भुगतान का आरोप है। मामले की जांच के बाद जिलाधिकारी अलंकृता पांडे ने दोनों अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की। पुलिस ने भी इस प्रकरण में केस दर्ज किया है। अब आरोपियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की तैयारी चल रही है।
HRMS पोर्टल पर फर्जी शिक्षिका के नाम से भुगतान का आरोप
मामले के केंद्र में शिक्षा विभाग का ह्यूमन रिसोर्स मैनेजमेंट सिस्टम यानी HRMS पोर्टल है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, सुल्तानगंज प्रखंड के अंतर्गत ‘तनूश्री’ नाम से एक कथित फर्जी विशिष्ट शिक्षिका की आईडी तैयार की गई।
आरोप है कि इसी पहचान के आधार पर कुल 98,12,773 रुपये का अवैध भुगतान किया गया। इस मामले में संविदा पर कार्यरत कंप्यूटर ऑपरेटर अविनाश का नाम सामने आया है। शुरुआती जानकारी के अनुसार, फर्जी आईडी तैयार करने और भुगतान की प्रक्रिया में कथित अनियमितता की जांच की जा रही है।
इतनी बड़ी राशि के भुगतान से जुड़े मामले ने सरकारी धन के इस्तेमाल और डिजिटल भुगतान प्रणाली की निगरानी पर सवाल खड़े किए हैं। हालांकि, घोटाले में किस व्यक्ति की कितनी भूमिका थी, इसका अंतिम निर्धारण जांच और न्यायिक प्रक्रिया से ही होगा।
डीएम अलंकृता पांडे ने जांच रिपोर्ट के बाद लिया एक्शन
इस मामले के सामने आने के बाद प्रशासन ने जांच शुरू कराई। उपलब्ध समाचार जानकारी के अनुसार, भागलपुर के उप विकास आयुक्त (DDC) पूरे प्रकरण की जांच कर रहे थे।
जांच रिपोर्ट मिलने के बाद जिलाधिकारी अलंकृता पांडे ने DEO चंदन कुमार और DPO शशि चंद चौधरी को निलंबित करने की कार्रवाई की। दोनों अधिकारियों के खिलाफ आरोप पत्र गठित करने और विभागीय स्तर पर आगे की कार्रवाई की तैयारी भी बताई गई है।
इस प्रकरण में छह लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किए जाने की जानकारी सामने आई है। इनमें कंप्यूटर ऑपरेटर अविनाश और दोनों शिक्षा अधिकारी भी शामिल बताए गए हैं।
प्रशासनिक कार्रवाई का उद्देश्य मामले में कथित अनियमितताओं की जिम्मेदारी तय करना और आगे की जांच को आगे बढ़ाना है। हालांकि, निलंबन अपने आप में किसी व्यक्ति के दोषी होने का अंतिम प्रमाण नहीं है। संबंधित अधिकारियों का पक्ष और जांच के अंतिम निष्कर्ष भी महत्वपूर्ण होंगे।
जोगसर थाने में दर्ज हुई प्राथमिकी
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इस मामले में जोगसर थाना में कांड संख्या 198/26 के तहत 8 अक्टूबर 2026 को प्राथमिकी दर्ज की गई। प्राथमिकी में कथित वित्तीय अनियमितता और फर्जी पहचान के जरिए भुगतान से जुड़े आरोप शामिल हैं।
समाचार में यह भी बताया गया है कि पुलिस ने मामले में कार्रवाई करते हुए संबंधित अधिकारियों को गिरफ्तार किया था। उपलब्ध विवरण के मुताबिक, दोनों अधिकारियों की गिरफ्तारी 9 अक्टूबर 2026 को हुई थी।
इस बिंदु पर प्रशासनिक और पुलिस कार्रवाई के बीच अंतर समझना जरूरी है। प्राथमिकी दर्ज होने का अर्थ आरोपों की जांच शुरू होना है, जबकि गिरफ्तारी या निलंबन से आरोप स्वतः सिद्ध नहीं हो जाते। मामले में सबूतों, दस्तावेजों और संबंधित लोगों की भूमिका की जांच आवश्यक है।
निलंबन के दौरान कहां रहेगा अधिकारियों का मुख्यालय?
जारी आदेश से संबंधित जानकारी के मुताबिक, दोनों अधिकारियों को गिरफ्तारी की तारीख यानी 9 अक्टूबर 2026 से अगले आदेश तक निलंबित किया गया है। निलंबन अवधि के दौरान उनके मुख्यालय भी अलग-अलग निर्धारित किए गए हैं।
शशि चंद चौधरी (DPO): क्षेत्रीय शिक्षा उप निदेशक, दरभंगा प्रमंडल, दरभंगा कार्यालय।
चंदन कुमार (DEO): क्षेत्रीय शिक्षा उप निदेशक, पूर्णिया प्रमंडल, पूर्णिया कार्यालय।
आदेश के अनुसार, निलंबन अवधि में दोनों अधिकारियों को नियमानुसार जीवन निर्वाह भत्ता (Subsistence Allowance) दिया जाएगा। इस अवधि में वे सामान्य रूप से अपने पद का कार्य नहीं करेंगे और उन्हें निलंबन से जुड़े विभागीय नियमों का पालन करना होगा।
इसके अलावा, दोनों अधिकारियों के खिलाफ अलग से आरोप पत्र तैयार कर विभागीय कार्रवाई शुरू करने की बात कही गई है। आगे की प्रक्रिया में आरोपों का विवरण, संबंधित दस्तावेज और अधिकारियों के जवाब अहम भूमिका निभा सकते हैं।
सरकारी भुगतान प्रणाली की निगरानी पर उठे सवाल
भागलपुर का यह मामला सरकारी विभागों में डिजिटल भुगतान और कर्मचारी पहचान की पुष्टि की प्रक्रिया को लेकर महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करता है। HRMS जैसे पोर्टल का उद्देश्य कर्मचारियों से जुड़े रिकॉर्ड और भुगतान प्रक्रिया को व्यवस्थित बनाना है, लेकिन किसी कथित फर्जी पहचान के जरिए भुगतान होने का आरोप निगरानी व्यवस्था की जांच को जरूरी बनाता है।
ऐसे मामलों में यह पता लगाना महत्वपूर्ण होता है कि फर्जी आईडी किसने बनाई, भुगतान को किस स्तर पर मंजूरी मिली और संबंधित रिकॉर्ड की जांच कैसे हुई। साथ ही, यह भी देखना होगा कि भुगतान की राशि की वसूली या अन्य वित्तीय कार्रवाई को लेकर प्रशासन क्या कदम उठाता है।
फिलहाल, उपलब्ध जानकारी में निलंबन, प्राथमिकी और विभागीय कार्रवाई की तैयारी का उल्लेख है। आगे की जांच से जिम्मेदारी और कथित घोटाले से जुड़े अन्य पहलुओं पर स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
