अभिजीत दीपके रिहा, रांका-दास जेल में क्यों? जानिए पूरा मामला
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दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं की हिरासत को लेकर सवाल उठ रहे हैं। अभिजीत दीपके को शर्तों के साथ रिहा कर दिया गया, जबकि आशुतोष रांका और सौरव दास को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल भेजा गया। अभिजीत दीपके की रिहाई और बाकी दोनों नेताओं की जेल में मौजूदगी के पीछे मुख्य अंतर जंतर-मंतर पर कथित रूप से प्रतिबंधों का उल्लंघन करने और पहले से दिए गए शांति बॉन्ड से जुड़े मामलों में बताया गया है।
अभिजीत दीपके को रिहाई कैसे मिली?
कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके को 16 अक्टूबर को दिल्ली में ‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च से जुड़े घटनाक्रम के दौरान हिरासत में लिया गया था। उन्हें भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 126 और 170 के तहत कार्रवाई के बाद विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया।
रिपोर्टों के मुताबिक, दीपके ने शांति बनाए रखने का बॉन्ड दिया और आवश्यक औपचारिकताओं के बाद रिहा हो गए। अधिकारियों से जुड़ी रिपोर्ट में उनकी रिहाई का एक कारण यह बताया गया कि वह जंतर-मंतर पर हुए उस प्रदर्शन में सक्रिय रूप से शामिल नहीं थे, जिसके लिए रांका और दास के खिलाफ कार्रवाई हुई थी।
रिहाई के बाद दीपके ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपने साथियों की रिहाई की उम्मीद जताई। उनकी पोस्ट से साफ था कि वह आशुतोष रांका और सौरव दास की रिहाई का इंतजार कर रहे हैं।
आशुतोष रांका और सौरव दास जेल क्यों भेजे गए?
दिल्ली पुलिस के मुताबिक, 13 अक्टूबर को आशुतोष रांका और सौरव दास समेत कुछ CJP कार्यकर्ता जंतर-मंतर पहुंचे थे। पुलिस का आरोप है कि प्रतिबंधों के बावजूद प्रदर्शनकारियों ने गेट और बैरिकेड पार कर परिसर में प्रवेश किया तथा वहां विरोध प्रदर्शन किया।
पुलिस ने इस कार्रवाई को केवल प्रदर्शन तक सीमित नहीं माना। अधिकारियों ने कथित अतिक्रमण, पुलिसकर्मियों के काम में बाधा और पहले दिए गए शांति बॉन्ड के उल्लंघन जैसे आरोप भी उठाए।
14 अक्टूबर को रांका और दास को विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। अदालत ने दोनों को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। यह आदेश उस समय सामने आया जब पुलिस ने उनके दोबारा कानून-व्यवस्था से जुड़ी स्थिति पैदा करने की आशंका जताई थी।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि पुलिस के आरोप अपने आप में दोषसिद्धि नहीं हैं। किसी व्यक्ति की कानूनी जिम्मेदारी का निर्धारण संबंधित प्रक्रिया और सक्षम अदालत के फैसले के अनुसार होता है।
दोनों मामलों में सबसे बड़ा कानूनी अंतर क्या है?
इस पूरे मामले में दो प्रमुख बातें सामने आती हैं—पहली, दोनों घटनाओं की परिस्थितियां अलग थीं; दूसरी, पुलिस ने रांका और दास के मामले में पहले दिए गए शांति बॉन्ड के कथित उल्लंघन को भी आधार बनाया।
रिपोर्टों के अनुसार, तीनों नेताओं को इससे पहले भी हिरासत में लिया गया था और शांति बनाए रखने की शर्तों पर रिहा किया गया था। बाद में जंतर-मंतर पर हुए घटनाक्रम में पुलिस ने रांका और दास के खिलाफ अलग कार्रवाई की। दीपके के मामले में अधिकारियों ने उनकी भूमिका और परिस्थितियों को अलग बताया।
इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि एक ही कानून लागू होने पर सभी लोगों को अनिवार्य रूप से एक जैसा आदेश मिलना चाहिए। मजिस्ट्रेट संबंधित व्यक्ति की भूमिका, उपलब्ध सामग्री और परिस्थितियों को देखकर निर्णय ले सकता है। हालांकि, किसी भी कार्रवाई की वैधता का अंतिम आकलन पूरे आदेश और कानूनी रिकॉर्ड को देखकर ही किया जा सकता है।
BNSS की धारा 126 और 170 क्या कहती हैं?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 126 शांति बनाए रखने के लिए बंधपत्र से जुड़ी प्रक्रिया का प्रावधान करती है। वहीं, धारा 170 कुछ परिस्थितियों में संज्ञेय अपराध को रोकने के उद्देश्य से पुलिस को गिरफ्तारी की शक्ति देती है।
इन प्रावधानों का उद्देश्य संभावित शांति भंग या अपराध को रोकना है। इनका इस्तेमाल होने का अर्थ यह नहीं कि संबंधित व्यक्ति को किसी अपराध में दोषी ठहरा दिया गया है।
इस मामले में दीपके की रिहाई शांति बॉन्ड से जुड़ी शर्तों के बाद हुई, जबकि रांका और दास को न्यायिक हिरासत में भेजा गया। दोनों स्थितियों में संबंधित आदेश, पुलिस की दलीलें और अदालत के सामने रखी गई परिस्थितियां महत्वपूर्ण हैं।
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन को लेकर विवाद
जंतर-मंतर लंबे समय से दिल्ली में विरोध-प्रदर्शनों का प्रमुख स्थल रहा है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, प्रदर्शन से पहले इस स्थल की निर्धारित विरोध स्थल के रूप में स्थिति को लेकर आदेश जारी हुआ था। इसके बाद CJP कार्यकर्ताओं ने वहां पहुंचकर प्रदर्शन किया, जिस पर पुलिस ने कार्रवाई की।
CJP का आंदोलन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े मुद्दों पर विरोध से भी जुड़ा है। पार्टी और उसके समर्थक चुनावी प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। दूसरी ओर, चुनाव आयोग की प्रक्रिया और उस पर लगाए गए आरोपों को अलग-अलग तथ्यों तथा आधिकारिक प्रतिक्रियाओं के आधार पर समझना जरूरी है।
आगे क्या होगा?
रिपोर्ट के अनुसार, आशुतोष रांका और सौरव दास की पांच दिन की न्यायिक हिरासत 18 अक्टूबर को समाप्त होने वाली थी। इसके बाद उनकी स्थिति संबंधित कानूनी प्रक्रिया और आगे के आदेशों पर निर्भर करेगी।
फिलहाल, अभिजीत दीपके की रिहाई और उनके दो साथियों की हिरासत का अंतर पुलिस द्वारा बताई गई भूमिका, कथित शांति बॉन्ड उल्लंघन और मजिस्ट्रेट के आदेश से जुड़ा है। मामले की पूरी तस्वीर समझने के लिए आधिकारिक आदेशों और आगे की कानूनी कार्रवाई पर नजर रखना जरूरी है।
