तेजस्वी का बड़ा संगठन प्लान, RJD में घटेगी यादवों की हिस्सेदारी?

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बिहार की राजनीति में तेजस्वी यादव की अगुवाई वाली RJD अब संगठन को नए सिरे से मजबूत करने की तैयारी में है। तेजस्वी यादव के नेतृत्व में पार्टी 55 नए जिलाध्यक्षों के चयन की प्रक्रिया पर काम कर रही है। इसके लिए युवा चेहरों, अति पिछड़ा वर्ग यानी EBC और गैर-यादव OBC नेताओं को प्राथमिकता देने की रणनीति सामने आई है। पार्टी के इस संभावित बदलाव का असर जिलाध्यक्षों की सामाजिक और उम्र संबंधी संरचना पर पड़ सकता है। माना जा रहा है कि इस बार 34 से 40 वर्ष के सक्रिय और साफ छवि वाले नेताओं पर अधिक भरोसा किया जाएगा।

RJD का 'A टू Z' फॉर्मूला क्या है?

RJD संगठन में बदलाव के लिए सामाजिक समीकरण को नए सिरे से साधने की कोशिश कर रही है। पार्टी का फोकस अपने पारंपरिक MY यानी मुस्लिम-यादव आधार के साथ अन्य पिछड़े और वंचित सामाजिक समूहों को जोड़ने पर है।

'A टू Z' फॉर्मूले के तहत EBC और गैर-यादव OBC समुदाय के नेताओं को संगठन में ज्यादा जिम्मेदारी देने की चर्चा है। पार्टी का उद्देश्य संगठन को सामाजिक रूप से अधिक व्यापक बनाना और अलग-अलग वर्गों के बीच अपनी राजनीतिक पहुंच मजबूत करना बताया जा रहा है।

इस रणनीति में केवल सामाजिक समीकरण ही नहीं, बल्कि उम्र, संगठन के प्रति निष्ठा और स्थानीय स्तर पर नेता की छवि को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

34 से 40 साल के नेताओं पर दांव

नए जिलाध्यक्षों के चयन में युवा नेतृत्व RJD की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल है। पार्टी 34 से 40 वर्ष की उम्र वाले ऊर्जावान नेताओं को जिला संगठन की कमान देने पर विचार कर रही है।

इसके पीछे संगठन को ज्यादा सक्रिय और चुनावी स्तर पर प्रभावी बनाने की सोच मानी जा रही है। युवा जिलाध्यक्षों से बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं के साथ बेहतर समन्वय और डिजिटल माध्यमों पर अधिक सक्रियता की उम्मीद की जा सकती है।

वहीं, 55 वर्ष से अधिक उम्र के नेताओं के लिए इस बार जिलाध्यक्ष बनने की राह मुश्किल बताई जा रही है। हालांकि अंतिम चयन पार्टी की आंतरिक प्रक्रिया और नेतृत्व के फैसले पर निर्भर करेगा।

दो बार जिलाध्यक्ष रह चुके नेताओं को झटका?

RJD संगठन में एक और महत्वपूर्ण बदलाव की चर्चा है। पार्टी किसी एक नेता को दो से अधिक बार जिलाध्यक्ष नहीं बनाने का नियम लागू करने की तैयारी कर रही है।

इसका उद्देश्य संगठन में लंबे समय से एक ही पद पर बने चेहरों की जगह नए कार्यकर्ताओं को अवसर देना है। पार्टी के मौजूदा ढांचे में जिलाध्यक्षों का कार्यकाल तीन वर्ष का बताया गया है।

नए नियम के लागू होने पर ऐसे कई नेताओं की दावेदारी प्रभावित हो सकती है, जो पहले ही दो बार इस पद की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। इससे जिला स्तर पर नेतृत्व परिवर्तन का रास्ता भी साफ हो सकता है।

बेदाग छवि और पार्टी निष्ठा भी अहम

जिलाध्यक्षों के चयन में केवल जातीय या उम्र का समीकरण ही निर्णायक नहीं होगा। पार्टी ऐसे नेताओं को आगे लाने पर भी जोर दे रही है, जिनकी स्थानीय स्तर पर छवि साफ हो और जिनके खिलाफ गंभीर विवाद न हों।

इसके साथ ही पार्टी के प्रति निष्ठा को भी अहम आधार माना जा रहा है। संगठन के भीतर असंतोष और बगावत जैसी स्थितियों को कम करने के लिए नेतृत्व ऐसे कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता देना चाहता है, जो लंबे समय से पार्टी के साथ सक्रिय रूप से जुड़े रहे हैं।

यानी नए जिलाध्यक्षों के चयन में सामाजिक प्रतिनिधित्व के साथ संगठनात्मक अनुभव, सक्रियता और व्यक्तिगत छवि का संतुलन बनाने की कोशिश दिखाई दे रही है।

जिलाध्यक्ष के चयन में आरक्षण पर मतभेद

जिलाध्यक्षों के चयन को लेकर पार्टी के भीतर आरक्षण के मुद्दे पर अलग-अलग विचार भी सामने आए हैं। RJD विधायक भाई वीरेंद्र ने जिलाध्यक्षों के चयन में आरक्षण लागू नहीं करने और मजबूत संगठनात्मक नेताओं को प्राथमिकता देने की बात कही है।

दूसरी ओर, RJD के SC-ST प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष अनिल कुमार साधु ने संगठन में वंचित वर्गों की भागीदारी और आरक्षण के प्रति पार्टी की प्रतिबद्धता पर जोर दिया है।

पार्टी के प्रधान महासचिव रणविजय साहू की ओर से भी संगठन को लोकतांत्रिक तरीके से आगे बढ़ाने और गरीब एवं वंचित वर्गों को प्रतिनिधित्व देने की बात कही गई है।

इससे साफ है कि जिलाध्यक्षों के चयन में सामाजिक प्रतिनिधित्व का मुद्दा पार्टी के भीतर महत्वपूर्ण चर्चा का विषय बना हुआ है। अंतिम तस्वीर चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी।

चुनाव लड़ने वालों को संगठन की कमान नहीं?

RJD के नए संगठनात्मक प्लान में एक और अहम पहलू सामने आया है। पार्टी चाहती है कि जिलाध्यक्ष का पद संभालने वाला नेता खुद चुनाव लड़ने की दौड़ में शामिल न हो।

पार्टी का तर्क है कि जिलाध्यक्ष की मुख्य जिम्मेदारी पूरे जिले में संगठन को मजबूत करना और पार्टी के घोषित उम्मीदवारों के लिए काम करना है। यदि वही जिलाध्यक्ष खुद चुनावी उम्मीदवार बनने की तैयारी करता है, तो संगठनात्मक गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं।

इसलिए पार्टी ऐसे चेहरों को जिला संगठन की जिम्मेदारी देना चाहती है, जो संगठन के विस्तार और कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय पर पूरा ध्यान दे सकें।

पटना से मोतिहारी तक फीडबैक ले रहे तेजस्वी

संगठन के पुनर्गठन की तैयारी के बीच तेजस्वी यादव अलग-अलग जिलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं से फीडबैक ले रहे हैं। पटना, पश्चिम चंपारण, भागलपुर और मोतिहारी समेत कई क्षेत्रों के नेताओं से संगठन की स्थिति और संभावित चेहरों को लेकर जानकारी जुटाई जा रही है।

55 नए जिलाध्यक्षों का चयन RJD के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि जिला संगठन पार्टी की चुनावी रणनीति को जमीन तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाता है।

यदि पार्टी युवा, EBC और गैर-यादव OBC नेताओं को अपेक्षाकृत अधिक जिम्मेदारी देती है, तो इससे RJD के संगठनात्मक ढांचे में बड़ा बदलाव दिखाई दे सकता है। हालांकि इसे पार्टी की सामाजिक रणनीति के व्यापक विस्तार के रूप में देखा जा रहा है, न कि केवल किसी एक समुदाय की भूमिका घटाने के तौर पर।

आने वाले समय में नए जिलाध्यक्षों के नाम और चयन के बाद यह स्पष्ट होगा कि RJD का 'A टू Z' फॉर्मूला जमीन पर किस तरह लागू होता है और संगठन में इसका वास्तविक असर कितना दिखाई देता है।

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