जेडीयू का नाम बदलकर जनता दल नीतीश करने की मांग, संजय झा ने कही बड़ी बात
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👉 WhatsApp से जुड़ेंबिहार की राजनीति में जेडीयू का नाम बदलकर जनता दल नीतीश करने की मांग सामने आई है। जेडीयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद संजय झा ने खगड़िया में पार्टी नेताओं के सामने यह प्रस्ताव रखा। उन्होंने कहा कि बिहार के विकास और पार्टी को मजबूत करने में नीतीश कुमार के योगदान को देखते हुए पार्टी का नाम उनके नाम पर होना चाहिए। जेडीयू का नाम बदलकर जनता दल नीतीश करने की अपील उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा को संबोधित करते हुए की।
संजय झा ने क्यों उठाया नाम बदलने का प्रस्ताव?
खगड़िया में आयोजित नीतीश संवाद कार्यक्रम के दौरान संजय झा ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राजनीतिक और विकास कार्यों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि जब भी बिहार के विकास की चर्चा होती है, नीतीश कुमार का नाम प्रमुखता से सामने आता है। संजय झा ने पार्टी नेताओं से अपील करते हुए कहा कि नीतीश कुमार ने बिहार के विकास और जनता दल यूनाइटेड के उत्थान के लिए पूरी ताकत और मनोयोग से काम किया है। ऐसे में उनके योगदान को सम्मान देने के लिए पार्टी का नाम उनके नाम पर किया जाना चाहिए। उन्होंने खगड़िया में मौजूद जेडीयू प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा की ओर मुखातिब होकर कहा कि पार्टी को अब जनता दल नीतीश के नाम से जाना जाए। यह बयान ऐसे समय आया है जब बिहार में नीतीश कुमार के नाम और विरासत को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हैं।
फरक्का जल संधि को लेकर बिहार के हितों की बात
संजय झा इन दिनों बिहार के गंगा तटवर्ती जिलों में नीतीश संवाद कार्यक्रम कर रहे हैं। इस दौरे का मुख्य मुद्दा बांग्लादेश के साथ फरक्का जल संधि और इससे बिहार के हितों पर पड़ने वाला असर है। संजय झा के अनुसार फरक्का जल संधि में बिहार के हितों की पर्याप्त चिंता नहीं की गई। उनका कहना है कि बिहार को अपने हिस्से के पानी से जुड़े अधिकारों को ध्यान में रखकर आगे की नीति तय करनी चाहिए। उन्होंने गंगा नदी के तटवर्ती 12 जिलों में संवाद कार्यक्रम करने की योजना बनाई है। इसकी शुरुआत बक्सर से हुई है, जबकि दौरे का समापन कटिहार में होना है।
'बिहार के साथ 30 साल से हो रहा अन्याय'
संजय झा ने फरक्का बराज और बिहार में बाढ़ की स्थिति के बीच संबंध का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि गंगा में लगातार गाद जमा होने से नदी की जल ग्रहण क्षमता प्रभावित हो रही है। इसके कारण पानी के फैलाव और बाढ़ की समस्या गंभीर हो रही है। उनका कहना है कि बांग्लादेश के साथ गंगाजल बंटवारे का समझौता करते समय बिहार की हिस्सेदारी स्पष्ट रूप से तय होनी चाहिए। साथ ही वर्ष 2050 तक बिहार की संभावित जल जरूरतों का आकलन करके पानी में राज्य का हिस्सा निर्धारित किया जाना चाहिए। संजय झा ने आरोप लगाया कि पिछले करीब 30 वर्षों से बिहार के साथ अन्याय होता रहा है। उन्होंने कहा कि बिहार अब इस स्थिति को आगे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है और उनकी पार्टी भी इस मुद्दे पर पीछे नहीं हटेगी।
फरक्का संधि के नवीनीकरण का विरोध
जेडीयू नेता ने फरक्का जल संधि के नवीनीकरण को लेकर भी अपना रुख स्पष्ट किया है। उन्होंने कहा कि बिहार के हितों को ध्यान में रखे बिना इस समझौते को आगे नहीं बढ़ाया जाना चाहिए। गुरुवार को जेडीयू प्रदेश कार्यालय में पत्रकारों से बातचीत के दौरान भी उन्होंने इस मुद्दे को उठाया। उनका कहना था कि बांग्लादेश के साथ जल समझौते में बिहार की हिस्सेदारी और भविष्य की जरूरतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। संजय झा ने संकेत दिया कि पार्टी इस मुद्दे को लेकर जनता के बीच जाएगी। यानी आने वाले दिनों में फरक्का जल संधि बिहार की राजनीति में एक बड़ा मुद्दा बन सकती है।
नीतीशपुर नाम की मांग से जुड़ा नया राजनीतिक संदर्भ
संजय झा की यह अपील इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि नीतीश कुमार की जन्मस्थली बख्तियारपुर का नाम बदलकर नीतीशपुर करने की मांग भी सामने आई है। हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के अध्यक्ष और बिहार सरकार में मंत्री संतोष कुमार सुमन ने बुधवार को बख्तियारपुर का नाम नीतीशपुरम करने की मांग की थी। इसके बाद अब जेडीयू का नाम बदलकर जनता दल नीतीश करने की संजय झा की अपील ने राजनीतिक चर्चा को और बढ़ा दिया है। हालांकि, पार्टी के नाम में आधिकारिक बदलाव के लिए निर्धारित संगठनात्मक और कानूनी प्रक्रिया का पालन करना होगा। फिलहाल संजय झा की ओर से यह मांग एक राजनीतिक प्रस्ताव और अपील के रूप में सामने आई है।
बिहार की राजनीति में क्या होगा असर?
जेडीयू का नाम बदलने का सुझाव सामने आने के बाद बिहार की राजनीति में इसके संभावित असर पर चर्चा शुरू होना स्वाभाविक है। नीतीश कुमार लंबे समय से जेडीयू की राजनीति के केंद्र में रहे हैं और पार्टी की पहचान उनके नेतृत्व से गहराई से जुड़ी रही है। ऐसे में अगर पार्टी के नाम में नीतीश कुमार का नाम शामिल करने का प्रस्ताव आगे बढ़ता है तो यह संगठन और उसकी राजनीतिक पहचान में बड़ा बदलाव माना जाएगा। दूसरी ओर, फरक्का जल संधि का मुद्दा सीधे बिहार के बाढ़, गंगा और जल अधिकारों से जुड़ा है। जेडीयू इसे जनता के बीच ले जाने की तैयारी कर रही है। इससे आने वाले समय में यह मुद्दा राज्य की राजनीति में और ज्यादा चर्चा में आ सकता है।