IRCTC घोटाले की कहानी: लालू परिवार की मुश्किलें बढ़ाने वाला कौन था?
📌 पटना और बिहार के सभी ज़िलों की ताज़ा ख़बरें सीधे अपने मोबाइल पर पाएं!
👉 WhatsApp से जुड़ें
बिहार की राजनीति में IRCTC घोटाला लंबे समय से लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार से जुड़ा चर्चित मामला रहा है। IRCTC घोटाला अचानक सामने आया मामला नहीं था, बल्कि इसकी जड़ें करीब दो दशक पुराने रेलवे होटल टेंडर विवाद से जुड़ी बताई जाती हैं। इस मामले में रेलवे विजिलेंस की शिकायत से लेकर CBI और ED की जांच तक कई पड़ाव आए।
लेकिन सवाल यह है कि पुराने मामले को दोबारा राजनीतिक और कानूनी चर्चा के केंद्र में कौन लेकर आया? उपलब्ध घटनाक्रम पर नजर डालें तो इसमें रेलवे विजिलेंस, CBI के दस्तावेजों और बाद में भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी की ओर से पेश किए गए दस्तावेजी आरोपों की अहम भूमिका दिखाई देती है।
BNR होटल से शुरू हुई थी पूरे मामले की कहानी
मामले की शुरुआत 2006 के आसपास पुरी और रांची स्थित BNR होटलों को निजी कंपनी सुजाता होटल्स प्राइवेट लिमिटेड को लीज पर दिए जाने से जुड़ी बताई जाती है।
BNR यानी बंगाल-नागपुर रेलवे के दौर में बनाए गए ये होटल रेलवे की पुरानी विरासत से जुड़े थे। बाद में इनके संचालन की जिम्मेदारी IRCTC के पास रही।
होटलों को लीज पर देने की प्रक्रिया को लेकर रेलवे विजिलेंस के पास शिकायतें पहुंचीं। शुरुआती जांच में टेंडर प्रक्रिया और नियमों में कथित अनियमितताओं की बात सामने आई।
आरोप यह था कि टेंडर की कुछ शर्तों में अंतिम समय पर बदलाव किए गए और बोली जमा करने की समय सीमा भी बढ़ाई गई। बाद की ऑडिट समीक्षा में भी रेलवे को अपेक्षित राजस्व नहीं मिलने से जुड़े सवाल उठाए गए।
रेलवे विजिलेंस के बाद CBI तक पहुंचा मामला
शिकायतों और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर जांच आगे बढ़ी। बताया जाता है कि 2006 में ही इस मामले को लेकर CBI के स्तर पर प्रारंभिक जांच की प्रक्रिया शुरू हुई थी।
उस समय लालू प्रसाद यादव केंद्र में रेल मंत्री थे। राजनीतिक परिस्थितियों के बीच मामला तत्काल बड़े कानूनी विवाद में तब्दील नहीं हुआ।
हालांकि, मामले से जुड़े दस्तावेज जांच एजेंसी के पास बने रहे। यही दस्तावेज आगे चलकर इस पूरे प्रकरण की जांच में महत्वपूर्ण आधार बने।
मामले का एक अहम राजनीतिक अध्याय 2008 में सामने आया, जब जदयू के तत्कालीन नेताओं शरद यादव और ललन सिंह की ओर से CBI को दस्तावेज उपलब्ध कराने और जांच की मांग किए जाने का दावा सामने आया।
सुशील कुमार मोदी ने कैसे उठाया पुराना मामला?
2017 में भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी ने इस मामले को जोरदार तरीके से सार्वजनिक मंच पर उठाया। उन्होंने लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार से जुड़े आरोपों को लेकर लगातार प्रेस कॉन्फ्रेंस कीं और दस्तावेज सामने रखे।
सुशील मोदी ने उस समय 114 दिनों के दौरान 44 प्रेस कॉन्फ्रेंस करने का दावा किया था। उन्होंने आरोपों से जुड़े दस्तावेजों को एकत्र करते हुए ‘लालू लीला’ नाम की किताब भी प्रकाशित की थी।
यही वह दौर था जब IRCTC से जुड़ा पुराना विवाद बिहार की राजनीति में फिर से प्रमुख मुद्दा बन गया।
हालांकि, किसी राजनीतिक नेता द्वारा लगाए गए आरोप अपने आप में न्यायिक रूप से अपराध साबित नहीं करते। मामले की कानूनी स्थिति जांच एजेंसियों की कार्रवाई, उपलब्ध साक्ष्यों और अदालत की प्रक्रिया से तय होती है।
5 जुलाई 2017 को CBI ने दर्ज की FIR
मामले में बड़ा कानूनी मोड़ 5 जुलाई 2017 को आया। CBI ने लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी, तेजस्वी यादव, सुजाता होटल्स के निदेशकों और तत्कालीन IRCTC अधिकारियों समेत कई लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की।
इसके दो दिन बाद 7 जुलाई को संबंधित परिसरों पर छापेमारी की कार्रवाई भी की गई। जांच एजेंसी ने छापेमारी से मिले दस्तावेजों और अन्य सामग्री को अपनी जांच का हिस्सा बनाया।
इसके बाद यह मामला केवल रेलवे टेंडर प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कथित वित्तीय लेनदेन और संपत्तियों से जुड़े पहलुओं की जांच भी शुरू हुई।
ED की एंट्री से मामला और गंभीर हुआ
CBI की FIR के आधार पर प्रवर्तन निदेशालय यानी ED ने 27 जुलाई 2017 को मनी लॉन्ड्रिंग के तहत ECIR दर्ज किया।
जांच आगे बढ़ने के साथ ED ने कथित वित्तीय लेनदेन और संपत्तियों की भी पड़ताल की। एजेंसी की कार्रवाई में पटना स्थित एक मॉल की जमीन और दिल्ली के न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी स्थित संपत्ति का मुद्दा भी सामने आया।
ED ने बाद में मामले में अदालत के समक्ष चार्जशीट दाखिल की। इस तरह IRCTC से जुड़ा विवाद रेलवे टेंडर से निकलकर कथित मनी लॉन्ड्रिंग की जांच तक पहुंच गया।
2025 में CBI कोर्ट ने तय किए आरोप
मामले में न्यायिक प्रक्रिया भी आगे बढ़ती रही। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, अक्टूबर 2025 में CBI की विशेष अदालत ने IRCTC मामले में लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी, तेजस्वी यादव, प्रेमचंद गुप्ता समेत कुल 14 आरोपियों के खिलाफ आरोप तय किए।
इसके बाद लैंड फॉर जॉब मामले में भी जनवरी 2026 में आरोप तय किए जाने की जानकारी सामने आई।
इन मामलों में आरोप तय होना दोष सिद्ध होना नहीं है। अंतिम फैसला अदालत में पेश होने वाले साक्ष्यों और सुनवाई के बाद ही होगा।
10 सितंबर 2026 को ED केस में भी आरोप तय
अब इस पूरे घटनाक्रम में 10 सितंबर 2026 को एक और महत्वपूर्ण मोड़ आया। दिल्ली के राउज एवेन्यू कोर्ट ने IRCTC से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी, तेजस्वी यादव समेत सात लोगों के खिलाफ आरोप तय किए हैं।
कोर्ट की ओर से प्रथम दृष्टया मजबूत संदेह की बात कही गई कि लालू प्रसाद यादव ने रेल मंत्री रहते हुए अपने पद का दुरुपयोग किया हो सकता है और रेलवे होटलों की लीज प्रक्रिया में कथित अनियमितताएं हुईं।
यहां यह समझना जरूरी है कि चार्ज फ्रेम होना अदालत द्वारा दोषी करार देना नहीं है। अब मामले में न्यायिक प्रक्रिया आगे चलेगी और अभियोजन पक्ष को अपने आरोपों के समर्थन में साक्ष्य प्रस्तुत करने होंगे।
आखिर किसने 'गड़े मुर्दे' को फिर से उठाया?
पूरे घटनाक्रम को देखें तो IRCTC मामले की शुरुआत रेलवे विजिलेंस की शिकायतों से हुई। इसके बाद CBI के पास दस्तावेज पहुंचे और जांच की प्रक्रिया आगे बढ़ी।
2008 में शरद यादव और ललन सिंह की ओर से दस्तावेज देने और जांच की मांग किए जाने का दावा भी सामने आया। लेकिन 2017 में सुशील कुमार मोदी ने इस मुद्दे को बड़े राजनीतिक अभियान के रूप में जनता के बीच उठाया।
उनकी लगातार प्रेस कॉन्फ्रेंस और दस्तावेजों के जरिए लगाए गए आरोपों के बाद मामला फिर सुर्खियों में आया और उसी वर्ष CBI FIR दर्ज होने के साथ कानूनी प्रक्रिया तेज हुई।
आज, करीब दो दशक बाद, IRCTC से जुड़े मामले में अदालत ने आरोप तय कर दिए हैं। अब इस कहानी का अगला अध्याय अदालत में होने वाली सुनवाई और साक्ष्यों की जांच से तय होगा।
