चौरचन पाबनि 2026: कब है चौठ चंद्र? जानें पूजा विधि, अर्घ्य और कथा

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बिहार के मिथिलांचल में मनाया जाने वाला चौरचन पाबनि सिर्फ एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि मिथिला की लोकसंस्कृति, परंपरा और पारिवारिक आस्था से जुड़ा खास त्योहार है। चौरचन पाबनि 2026 में 14 सितंबर, सोमवार को मनाई जाएगी। इस दिन शाम के समय चंद्रमा की पूजा कर उन्हें अर्घ्य देने की परंपरा है। चौरचन पाबनि को कई जगह चौठ चंद्र, चौठ चंद्र व्रत और चौरचंद के नाम से भी जाना जाता है।

यह पर्व खास तौर पर बिहार के मिथिला क्षेत्र में श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर सहित मिथिलांचल के कई हिस्सों में इसकी अलग-अलग स्थानीय परंपराएं देखने को मिलती हैं।

चौरचन पाबनि 2026 कब है?

साल 2026 में चौरचन पाबनि 14 सितंबर, सोमवार को मनाई जाएगी। यह पर्व भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से जुड़ा है।

उपलब्ध पंचांग गणनाओं के अनुसार, 14 सितंबर 2026 को चतुर्थी तिथि सुबह करीब 7:06 बजे शुरू होगी और 15 सितंबर की सुबह करीब 7:44 बजे तक रहेगी। चौरचन की पूजा शाम को चंद्रदर्शन के बाद की जाती है।

चौरचन 2026 की मुख्य जानकारी

पर्व का नाम: चौरचन पाबनि / चौठ चंद्र
तारीख: 14 सितंबर 2026, सोमवार
तिथि: भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी
चतुर्थी तिथि शुरू: 14 सितंबर, सुबह करीब 7:06 बजे
चतुर्थी तिथि समाप्त: 15 सितंबर, सुबह करीब 7:44 बजे
पूजा का समय: शाम को चंद्रदर्शन के बाद
मुख्य आराध्य: चंद्रदेव और भगवान गणेश
प्रमुख क्षेत्र: मिथिलांचल और बिहार के अन्य हिस्से

ध्यान रखें कि चंद्रदर्शन का समय शहर और स्थान के अनुसार कुछ मिनट आगे-पीछे हो सकता है। पटना के लिए उपलब्ध पंचांग जानकारी में चंद्रदर्शन लगभग शाम 7:40 बजे के आसपास बताया गया है। अपने स्थानीय पंचांग के अनुसार अंतिम समय देखना बेहतर रहेगा।

चौरचन को चौठ चंद्र क्यों कहा जाता है?

चौरचन को आम बोलचाल में चौठ चंद्र भी कहा जाता है। इसका संबंध भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से है।

मिथिला की लोकपरंपरा में इस दिन चंद्रदेव की विशेष पूजा की जाती है। शाम के समय महिलाएं और परिवार के अन्य सदस्य पूजा की तैयारी करते हैं। पूजा स्थल पर अरिपन बनाया जाता है और विभिन्न प्रकार के फल, पकवान तथा पारंपरिक प्रसाद सजाए जाते हैं।

इसके बाद चंद्रमा के दर्शन होने पर उन्हें अर्घ्य दिया जाता है। कई परिवारों में छलनी या अन्य पारंपरिक तरीके से चंद्रदर्शन करने की परंपरा भी देखने को मिलती है।

चौरचन और गणेश चतुर्थी का क्या संबंध है?

चौरचन और गणेश चतुर्थी दोनों का संबंध भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी से है। इसी कारण कई जगह दोनों पर्वों को एक ही दिन मनाया जाता है।

मिथिला की परंपरा में चौरचन के अवसर पर चंद्रदेव के साथ भगवान गणेश की भी पूजा की जाती है। लोकमान्यता के अनुसार भगवान गणेश और चंद्रदेव से जुड़ी पौराणिक कथा इस पर्व की धार्मिक पृष्ठभूमि को विशेष बनाती है।

2026 में गणेश चतुर्थी भी 14 सितंबर को ही पड़ रही है। हालांकि दोनों पर्वों की पूजा-पद्धति और स्थानीय परंपराएं अलग-अलग हो सकती हैं।

चौरचन पाबनि का धार्मिक महत्व

चंद्रमा को भारतीय धार्मिक परंपरा में शीतलता, मन और सौम्यता से जोड़ा जाता है। चौरचन के दिन चंद्रदेव की पूजा करके परिवार की सुख-शांति और समृद्धि की कामना की जाती है।

मिथिला में यह पर्व विशेष रूप से परिवार और लोकपरंपरा से जुड़ा हुआ है। घर की महिलाएं पूजा की तैयारी करती हैं और परिवार के सदस्य इसमें सहयोग करते हैं।

मान्यता है कि श्रद्धा और नियमपूर्वक चौठ चंद्र की पूजा करने से परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। हालांकि ऐसी धार्मिक मान्यताएं आस्था पर आधारित हैं और इनके परिणामों को वैज्ञानिक तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

चौरचन पाबनि की पूजा विधि क्या है?

चौरचन की पूजा मुख्य रूप से शाम के समय चंद्रदर्शन के बाद की जाती है। पूजा की स्थानीय विधि परिवार और क्षेत्र के अनुसार थोड़ी अलग हो सकती है।

1. सुबह से करें तैयारी

पर्व के दिन घर की साफ-सफाई की जाती है। पूजा के लिए आवश्यक सामग्री पहले से तैयार कर ली जाती है।

कई परिवारों में व्रत रखने वाली महिलाएं सुबह स्नान करके पूजा का संकल्प लेती हैं। व्रत की प्रकृति परिवार की परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है।

2. पूजा स्थल की सफाई

शाम से पहले पूजा स्थल को साफ किया जाता है। इसके बाद जमीन पर अरिपन बनाया जाता है।

मिथिला में अरिपन केवल सजावट नहीं है। यह लोककला और धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। चावल के घोल से बनाए जाने वाले पारंपरिक चित्रों में अलग-अलग प्रतीकों और आकृतियों का प्रयोग किया जाता है।

3. भगवान गणेश की पूजा

कई परिवारों में चौरचन पूजा की शुरुआत भगवान गणेश की पूजा से की जाती है।

गणेशजी को दूर्वा, फूल, अक्षत, चंदन और प्रसाद अर्पित किया जाता है। इसके बाद परिवार की परंपरा के अनुसार मंत्र, स्तुति या आरती की जाती है।

4. चंद्रमा के निकलने का इंतजार

पूजा सामग्री तैयार करने के बाद परिवार चंद्रमा के दर्शन का इंतजार करता है।

चंद्रमा दिखाई देने के बाद पूजा की मुख्य प्रक्रिया शुरू होती है। स्थानीय पंचांग के अनुसार समय में कुछ अंतर हो सकता है, इसलिए अपने शहर के चंद्रोदय समय को प्राथमिकता देना उचित है।

5. चंद्रदेव को अर्घ्य

चंद्रदर्शन के बाद चंद्रदेव को जल और अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है।

कई परिवारों में दूध, अक्षत, फूल आदि के साथ अर्घ्य देने की परंपरा है। इसके बाद चंद्रदेव की पूजा और आरती की जाती है।

6. व्रत और प्रसाद

पूजा पूरी होने के बाद परिवार की परंपरा के अनुसार व्रत का समापन किया जाता है। इसके बाद प्रसाद ग्रहण किया जाता है।

यहां भी अलग-अलग परिवारों में नियम अलग हो सकते हैं। इसलिए अपने घर की पारंपरिक पूजा-पद्धति का पालन करना सबसे उचित है।

चौरचन पूजा सामग्री की पूरी लिस्ट

अगर आप 2026 में चौरचन की पूजा करने जा रहे हैं, तो सामग्री पहले से तैयार कर लेना बेहतर रहेगा।

मुख्य पूजा सामग्री:

  • चंद्रमा की पूजा के लिए जल
  • पूजा की थाली
  • कलश
  • अक्षत यानी चावल
  • रोली या सिंदूर
  • चंदन
  • फूल
  • दूर्वा
  • धूप
  • दीपक
  • घी या तेल
  • कपूर
  • अगरबत्ती
  • फल
  • मिठाई
  • लड्डू
  • तिलकुट
  • पान और सुपारी
  • लौंग और इलायची
  • मौसमी फल
  • नारियल
  • केला
  • गन्ना या अन्य पारंपरिक फल, जहां स्थानीय परंपरा हो
  • पूजा के लिए वस्त्र
  • अरिपन बनाने के लिए चावल का घोल
  • छलनी, यदि परिवार की परंपरा में इसका इस्तेमाल होता है

सामग्री की सूची क्षेत्र और परिवार की परंपरा के अनुसार बदल सकती है। हर परिवार के लिए पूरी सूची एक जैसी होना जरूरी नहीं है।

चौरचन में अरिपन का क्या महत्व है?

अरिपन मिथिला की प्रसिद्ध लोकचित्रकला है। चौरचन के अवसर पर घर के आंगन या पूजा स्थल पर विशेष अरिपन बनाने की परंपरा कई परिवारों में आज भी कायम है।

चावल को पीसकर बनाए गए घोल से जमीन पर विभिन्न आकृतियां बनाई जाती हैं। इसके आसपास पूजा सामग्री रखी जाती है और उसी स्थान पर चंद्रदेव की पूजा की जाती है।

मिथिला में अरिपन केवल धार्मिक अनुष्ठान का हिस्सा नहीं बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही लोककला का भी प्रतीक है।

चौरचन की लोककथा और चंद्रदेव से जुड़ी मान्यता

चौरचन के साथ चंद्रमा से जुड़ी कई लोककथाएं और धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। इनमें भगवान गणेश और चंद्रदेव से जुड़ी कथा विशेष रूप से सुनाई जाती है।

लोकमान्यता के अनुसार भगवान गणेश के स्वरूप को देखकर चंद्रदेव द्वारा उपहास किए जाने की कथा से चंद्रमा को मिले श्राप का प्रसंग जुड़ा है। इसी कारण भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को चंद्रदर्शन और गणेशजी से संबंधित कई मान्यताएं देखने को मिलती हैं।

मिथिला की लोकपरंपरा ने इन मान्यताओं को अपनी अलग सांस्कृतिक पहचान के साथ अपनाया है। इसलिए चौरचन की कथा सिर्फ धार्मिक प्रसंग नहीं बल्कि स्थानीय लोकसंस्कृति का भी हिस्सा बन चुकी है।

ध्यान देने वाली बात यह है कि अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में इस कथा के संस्करण और पूजा की परंपरा अलग मिल सकती है।

चौरचन में क्या खाया और खिलाया जाता है?

चौरचन के प्रसाद में पारंपरिक पकवानों की खास भूमिका होती है। मिथिला में घर की महिलाएं पर्व से पहले कई तरह के पकवान तैयार करती हैं।

फल, मिठाई, लड्डू, तिलकुट और अन्य पारंपरिक व्यंजन पूजा में शामिल किए जा सकते हैं। कुछ परिवारों में स्थानीय परंपरा के अनुसार अलग-अलग पकवान बनाए जाते हैं।

इस पर्व की खासियत यह भी है कि प्रसाद केवल पूजा तक सीमित नहीं रहता। पूजा के बाद परिवार और रिश्तेदारों के बीच प्रसाद बांटने की परंपरा सामाजिक जुड़ाव को मजबूत करती है।

क्या चौरचन में व्रत रखना जरूरी है?

चौरचन में व्रत रखने की परंपरा कई परिवारों में है, लेकिन व्रत का तरीका सभी जगह समान नहीं है।

कुछ लोग पूरे दिन उपवास रखते हैं, जबकि कुछ परिवार अपनी परंपरा के अनुसार फलाहार या अन्य नियमों का पालन करते हैं।

स्वास्थ्य संबंधी परेशानी, गर्भावस्था, बुजुर्ग अवस्था या किसी चिकित्सकीय स्थिति में कठोर उपवास रखने से पहले डॉक्टर की सलाह लेना उचित है।

धार्मिक पर्व श्रद्धा और परंपरा से जुड़े हैं, इसलिए अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार व्रत रखना बेहतर है।

चौरचन की पूजा में किन बातों का ध्यान रखें?

चौरचन की पूजा के दौरान कुछ सामान्य बातों का ध्यान रखा जा सकता है।

पहली बात: पूजा स्थल साफ रखें।

दूसरी बात: चंद्रदर्शन के समय अपने शहर का स्थानीय समय देखें।

तीसरी बात: पूजा सामग्री पहले से तैयार रखें।

चौथी बात: परिवार की परंपरा के अनुसार अरिपन बनाएं।

पांचवीं बात: पूजा में जल्दबाजी न करें और श्रद्धा के साथ अर्घ्य दें।

छठी बात: व्रत रखने वाले लोग अपनी सेहत का ध्यान रखें।

सातवीं बात: धार्मिक मान्यताओं को आस्था के रूप में समझें और किसी भी दावे को वैज्ञानिक तथ्य न मानें।

2026 में चौरचन और गणेश चतुर्थी एक ही दिन

2026 का साल इस लिहाज से खास है कि चौरचन और गणेश चतुर्थी 14 सितंबर को एक ही दिन पड़ रहे हैं।

गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश की पूजा और स्थापना की जाती है, जबकि मिथिला की चौरचन परंपरा में शाम को चंद्रदेव को अर्घ्य देने का विशेष महत्व है।

इसलिए बिहार और मिथिलांचल में 14 सितंबर का दिन धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण रहने वाला है।

चौरचन पाबनि से जुड़े सवाल-जवाब

चौरचन पाबनि 2026 में कब है?

चौरचन पाबनि 2026 में 14 सितंबर, सोमवार को मनाई जाएगी।

चौरचन को और किस नाम से जाना जाता है?

इसे चौठ चंद्र, चौठ चंद्र व्रत और चौरचंद जैसे नामों से भी जाना जाता है।

चौरचन में किसकी पूजा होती है?

मुख्य रूप से चंद्रदेव की पूजा और अर्घ्य दिया जाता है। मिथिला की कई परंपराओं में भगवान गणेश की भी पूजा की जाती है।

चौरचन की पूजा कब होती है?

चौरचन की मुख्य पूजा शाम को चंद्रमा के दर्शन के बाद की जाती है।

पटना में चौरचन पर चंद्रदर्शन कब होगा?

2026 के लिए उपलब्ध जानकारी में पटना में चंद्रदर्शन लगभग शाम 7:40 बजे के आसपास बताया गया है। स्थानीय पंचांग से अंतिम समय की पुष्टि करना बेहतर है।

क्या चौरचन में अरिपन बनाया जाता है?

हां, मिथिला में चौरचन के अवसर पर पूजा स्थल पर पारंपरिक अरिपन बनाने की विशेष परंपरा है।

क्या चौरचन और गणेश चतुर्थी एक ही दिन हैं?

2026 में दोनों पर्व 14 सितंबर को पड़ रहे हैं। हालांकि दोनों की पूजा परंपराओं में अंतर है।

चौरचन पाबनि सिर्फ पूजा नहीं, मिथिला की पहचान है

चौरचन पाबनि मिथिला की उन परंपराओं में शामिल है, जिनमें धर्म के साथ लोकसंस्कृति भी दिखाई देती है। चंद्रमा को अर्घ्य देने से लेकर आंगन में अरिपन बनाने, पारंपरिक पकवान तैयार करने और परिवार के साथ पूजा करने तक, इस पर्व में मिथिला की संस्कृति की झलक मिलती है।

आज के समय में लोग देश और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में रहने लगे हैं, लेकिन चौरचन जैसे पर्व अपनी जड़ों से जुड़े रहने का अवसर देते हैं। यही वजह है कि मिथिला से बाहर रहने वाले परिवार भी इस पर्व को अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार मनाते हैं।

14 सितंबर 2026 को चौरचन पाबनि के मौके पर शाम को चंद्रदर्शन के बाद श्रद्धा के साथ चंद्रदेव को अर्घ्य दिया जाएगा। अलग-अलग शहरों में चंद्रदर्शन के समय में थोड़ा अंतर हो सकता है, इसलिए पूजा से पहले स्थानीय पंचांग से समय जरूर देख लें।

नोट: चौरचन की पूजा-विधि, व्रत के नियम, प्रसाद और लोककथाओं में क्षेत्र तथा परिवार के अनुसार अंतर हो सकता है। ऊपर दी गई जानकारी सामान्य धार्मिक एवं लोकपरंपराओं पर आधारित है।

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