AK-47 केस में अनंत सिंह की गिरफ्तारी से बरी होने तक की पूरी कहानी

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बिहार की राजनीति में अनंत सिंह AK-47 केस एक बार फिर चर्चा में है। अनंत सिंह AK-47 केस में 2019 की छापेमारी, गिरफ्तारी, ट्रायल कोर्ट की सजा और 2024 में पटना हाईकोर्ट से बरी होने तक कई महत्वपूर्ण मोड़ आए। हाईकोर्ट ने अभियोजन के सबूतों और जांच प्रक्रिया में कई कमियों को महत्वपूर्ण माना था।

यह मामला उस समय भी राजनीतिक चर्चा में रहा था और आज भी अनंत सिंह के राजनीतिक बयानों के बीच इसका जिक्र हो रहा है। हालांकि, यह कहना कि उन्हें निश्चित रूप से राजनीतिक साजिश के तहत फंसाया गया था, अदालत के फैसले से सीधे साबित नहीं होता। अदालत ने मुख्य रूप से अभियोजन के मामले को संदेह से परे साबित न होने के आधार पर राहत दी।

16 अगस्त 2019 को लदमा स्थित घर में छापेमारी

16 अगस्त 2019 को बाढ़ पुलिस ने अनंत सिंह के पैतृक आवास पर छापेमारी की थी। पुलिस के अनुसार, तलाशी के दौरान एक AK-47 राइफल, कारतूस और विस्फोटक सामग्री बरामद हुई।

अदालती रिकॉर्ड के अनुसार, घर बंद था और केयरटेकर सुनील राम के पास मिली चाबी से घर खोला गया। इसके बाद अलग-अलग कमरों की तलाशी ली गई और एक कमरे में अलमारी के पीछे रखे सामान से हथियार मिलने का दावा किया गया।

इस मामले में अनंत सिंह के खिलाफ आर्म्स एक्ट और विस्फोटक पदार्थ कानून समेत गंभीर धाराओं में केस दर्ज किया गया। प्राथमिकी में UAPA की धारा भी लगाई गई थी, हालांकि बाद की कानूनी प्रक्रिया में इस पहलू को लेकर भी सवाल उठे।

गिरफ्तारी से बचते रहे, फिर दिल्ली में किया सरेंडर

मामला दर्ज होने के बाद पुलिस अनंत सिंह की तलाश में जुट गई। उस समय वह अपने पटना स्थित विधायक आवास पर नहीं मिले और बाद में उन्होंने दिल्ली की साकेत अदालत में आत्मसमर्पण किया।

इसके बाद बिहार पुलिस उन्हें ट्रांजिट रिमांड पर पटना लाई। अदालत में पेशी के बाद उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया और AK-47 बरामदगी मामले की सुनवाई शुरू हुई।

इस दौरान अनंत सिंह ने खुद को राजनीतिक साजिश में फंसाए जाने का आरोप लगाया था। दूसरी ओर, पुलिस ने हथियार बरामदगी को अपने केस का प्रमुख आधार बनाया था।

ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी 10 साल की सजा

AK-47 मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने हथियार और अन्य बरामदगी को अदालत के सामने रखा। ट्रायल कोर्ट ने 14 जून 2022 को अनंत सिंह और सह-आरोपी को दोषी करार दिया।

अनंत सिंह को आर्म्स एक्ट और विस्फोटक पदार्थ से संबंधित धाराओं में कठोर सजा मिली। इस सजा के कारण उनकी विधानसभा सदस्यता भी चली गई और मोकामा सीट खाली हुई।

इसके बाद उन्होंने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी। यहीं से इस मामले की कहानी ने एक बड़ा कानूनी मोड़ लिया।

हाईकोर्ट में पुलिस की जांच पर क्यों उठे सवाल?

14 अगस्त 2024 को पटना हाईकोर्ट ने मामले में फैसला सुनाते हुए ट्रायल कोर्ट की सजा को पलट दिया और अनंत सिंह को बरी कर दिया।

हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में असफल रहा कि बरामद हथियार अनंत सिंह के सचेत कब्जे या जानकारी में था। अदालत ने यह भी देखा कि मकान पैतृक और संयुक्त रूप से उपयोग होने वाला था।

अदालत के सामने एक अहम सवाल यह भी था कि जिस कमरे से हथियार बरामद होने की बात कही गई, उस कमरे पर अनंत सिंह का विशेष कब्जा था, यह साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं दिए गए।

अदालती रिकॉर्ड में यह भी दर्ज है कि जिस ताले और चाबी के जरिए घर खोलने की बात कही गई थी, उन्हें जांच के दौरान जब्त कर अदालत में पेश नहीं किया गया।

AK-47 की बरामदगी और सीलिंग को लेकर क्या हुआ?

अभियोजन के अनुसार AK-47 की बरामदगी सुबह करीब 11:50 बजे हुई थी। लेकिन हथियार की जब्ती और सीलिंग को लेकर समय में बड़ा अंतर सामने आया।

अदालती रिकॉर्ड में गवाहों के बयानों से पता चलता है कि हथियार को मौके पर जब्त करने और जब्ती सूची तैयार करने की प्रक्रिया तत्काल नहीं हुई थी। अदालत ने बरामदगी और सीलिंग से जुड़े इन पहलुओं को मामले की विश्वसनीयता परखते समय ध्यान में रखा।

हथियार बाद में फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा गया। FSL रिपोर्ट में बरामद AK-47 को काम करने योग्य बताया गया था, लेकिन सिर्फ हथियार के तकनीकी रूप से वास्तविक होने से यह साबित नहीं होता कि वह अनंत सिंह के कब्जे में था। अदालत के सामने मुख्य सवाल यही था कि हथियार से उनका कानूनी संबंध कैसे स्थापित किया जाए।

27 अगस्त का अखबार और पुलिस की कहानी पर सवाल

मामले की सुनवाई के दौरान जब्ती से जुड़े दस्तावेज और बरामद सामान को लेकर भी कई सवाल सामने आए।

रिपोर्टों के अनुसार, छापेमारी 16 अगस्त 2019 को हुई थी, जबकि बरामद विस्फोटक सामग्री से जुड़े पैकेट में 27 अगस्त का अखबार मिलने की बात अदालत में उठाई गई। बचाव पक्ष ने इसी आधार पर बरामदगी की प्रक्रिया पर सवाल उठाया।

हाईकोर्ट ने जांच के कई पहलुओं में विरोधाभास और कमियों को ध्यान में रखा। इन कमियों के कारण अभियोजन के लिए पूरे मामले को विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर साबित करना मुश्किल हुआ।

क्या हाईकोर्ट ने राजनीतिक साजिश को माना था?

यह सवाल इस मामले का सबसे संवेदनशील हिस्सा है।

हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में बचाव पक्ष ने राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और तत्कालीन जांच अधिकारी लिपि सिंह की पृष्ठभूमि का हवाला देते हुए गलत फंसाने का तर्क दिया था। अभियोजन पक्ष ने इन आरोपों से इनकार किया था।

अदालत ने जांच में कमियों और अभियोजन के सबूतों की कमजोरी को गंभीरता से लिया। हालांकि, इसे इस रूप में कहना सही नहीं होगा कि अदालत ने निश्चित रूप से यह फैसला दिया कि पूरा केस राजनीतिक साजिश के तहत बनाया गया था।

मुख्य कानूनी निष्कर्ष यह था कि अभियोजन पक्ष अपराध और अनंत सिंह के सचेत कब्जे को पर्याप्त विश्वसनीय साक्ष्यों से साबित नहीं कर पाया। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने उन्हें बरी किया।

जेल से बाहर आने के बाद फिर सक्रिय हुई राजनीति

हाईकोर्ट के फैसले के बाद अनंत सिंह को जेल से रिहाई मिली। AK-47 मामले में बरी होने के बाद उनकी राजनीतिक गतिविधियां फिर तेज हुईं।

2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में वह मोकामा से जेडीयू के उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतरे और चुनाव जीता। मौजूदा राजनीतिक घटनाक्रम में उनके बयानों के साथ पुराने AK-47 मामले का जिक्र फिर सामने आ रहा है।

इस पूरे मामले से एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है—किसी आपराधिक मुकदमे में बरामदगी का दावा अपने आप दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं होता। अभियोजन को यह भी साबित करना होता है कि आरोपी का उस बरामद सामग्री पर कानूनी रूप से स्थापित कब्जा या जानकारी थी और पूरी जांच प्रक्रिया विश्वसनीय थी।

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