11 साल बाद राजभवन मार्च, 5 साल बाद सड़क पर उतरे तेजस्वी यादव
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👉 WhatsApp से जुड़ेंबिहार की राजनीति में तेजस्वी यादव का सड़क पर उतरना एक बार फिर चर्चा में है। तेजस्वी यादव बुधवार को पटना में राजभवन मार्च के दौरान पैदल चलते हुए आंदोलन करते नजर आए। छात्र आंदोलन, कथित पेपर लीक और प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई के मुद्दे को लेकर राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने गांधी मैदान के जेपी गोलंबर से लोकभवन तक मार्च निकाला। आयकर गोलंबर के पास पुलिस ने वाटर कैनन का इस्तेमाल किया और तेजस्वी समेत कई नेताओं को हिरासत में लिया गया। बाद में सभी को छोड़ दिया गया।
11 साल बाद RJD ने निकाला राजभवन मार्च
राजद के लिए यह मार्च इसलिए भी अहम है क्योंकि पार्टी ने करीब 11 साल बाद राजभवन मार्च किया। इससे पहले 2015 में राजद ने ऐसा मार्च निकाला था। उस समय पार्टी की ओर से 2011 की जनगणना के आंकड़ों से संबंधित जातीय गणना की रिपोर्ट जारी करने की मांग उठाई गई थी।
इस बार आंदोलन का मुद्दा अलग है। राजद ने छात्र आंदोलन के दौरान कथित फायरिंग, परीक्षा व्यवस्था और पेपर लीक जैसे सवालों को लेकर सरकार को घेरा है।
मार्च की शुरुआत गांधी मैदान स्थित जेपी गोलंबर से हुई। प्रशासन ने पहले से ही सुरक्षा और यातायात व्यवस्था को लेकर तैयारी कर रखी थी। डाकबंगला चौक के आसपास मार्च को रोकने की तैयारी थी, लेकिन कार्यकर्ताओं के आगे बढ़ने के बाद पुलिस ने आयकर गोलंबर के पास मार्च को रोक दिया।
पुलिस की कार्रवाई के दौरान वाटर कैनन चलाया गया। इसके बाद तेजस्वी यादव सहित पार्टी के कई नेताओं को हिरासत में लिया गया।
पांच साल बाद फिर आंदोलन की सड़क पर तेजस्वी
तेजस्वी यादव लंबे समय से सरकार के खिलाफ बयान, प्रेस कॉन्फ्रेंस, सोशल मीडिया पोस्ट और अलग-अलग राजनीतिक यात्राओं के जरिए सक्रिय रहे हैं। लेकिन पैदल मार्च के रूप में बड़े आंदोलन में उनके सड़क पर उतरने की घटना करीब पांच साल बाद देखने को मिली।
मार्च 2021 में भी तेजस्वी एक प्रस्तावित कानून के विरोध में सड़क पर उतरे थे। उस समय पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया था। विधानसभा परिसर में विपक्षी विधायकों के साथ कथित दुर्व्यवहार को लेकर भी बड़ा राजनीतिक विवाद हुआ था।
इसके बाद तेजस्वी अलग-अलग यात्राओं के जरिए जनता के बीच सक्रिय रहे। जनादेश अपमान यात्रा, आरक्षण बढ़ाओ यात्रा, बेरोजगारी हटाओ यात्रा, जन विश्वास यात्रा और वोटर अधिकार यात्रा उनके राजनीतिक अभियान का हिस्सा रहे हैं।
इसके बावजूद राजद के कार्यकर्ताओं के बीच लंबे समय से किसी बड़े और लगातार चलने वाले आंदोलन की कमी महसूस किए जाने की चर्चा होती रही है। ऐसे में राजभवन मार्च को पार्टी के पुराने आंदोलनकारी तेवर की वापसी के प्रयास के तौर पर देखा जा रहा है।
आखिर अभी सड़क पर उतरने की जरूरत क्यों पड़ी?
तेजस्वी के मार्च को सिर्फ तत्काल राजनीतिक मुद्दे से जोड़कर देखना पूरी तस्वीर नहीं बताता। इसके पीछे बिहार की बदलती राजनीतिक परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण हो सकती हैं।
राज्य में युवाओं और छात्रों से जुड़े मुद्दे लगातार राजनीति के केंद्र में हैं। परीक्षा, रोजगार, भर्ती और पेपर लीक जैसे विषय सीधे बड़ी युवा आबादी को प्रभावित करते हैं। ऐसे मुद्दों पर विपक्ष के लिए सड़क पर उतरना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है।
राजद के राष्ट्रीय प्रवक्ता जयंत जिज्ञासु ने भी मार्च को सरकार को जवाबदेह बनाने की कोशिश बताया। उनका कहना है कि प्रदर्शनकारियों की वाजिब मांगों पर सरकार को संवाद के जरिए रास्ता निकालना चाहिए।
उन्होंने कथित AK-47 फायरिंग को गंभीर विषय बताते हुए संबंधित अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग भी उठाई। साथ ही परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और समय पर परिणाम की जरूरत पर जोर दिया।
प्रशांत किशोर और जन सुराज की चुनौती भी अहम
तेजस्वी के सड़क पर उतरने के पीछे बिहार की राजनीति में उभरते तीसरे विकल्प को लेकर बढ़ती चर्चा को भी एक राजनीतिक विश्लेषण के रूप में देखा जा रहा है।
जन सुराज के राजनीतिक विस्तार और प्रशांत किशोर की सक्रियता ने राज्य की पारंपरिक दो ध्रुवीय राजनीति के सामने नई चुनौती खड़ी करने का प्रयास किया है। बांकीपुर के उपचुनाव में जन सुराज के प्रदर्शन और राजद के कमजोर नतीजे ने इस चर्चा को और हवा दी है।
हालांकि, किसी एक चुनावी परिणाम से पूरे बिहार में राजनीतिक समीकरण बदलने का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। लेकिन राजद के लिए यह जरूर संकेत है कि उसे अपने पारंपरिक सामाजिक आधार के साथ नए मतदाताओं और खासकर युवाओं तक पहुंच मजबूत करनी होगी।
बिहार की राजनीति में लंबे समय से राजद और एनडीए के बीच मुकाबला प्रमुख रहा है। तीसरे राजनीतिक विकल्प की संभावना इस समीकरण को चुनौती देती है। ऐसे में विपक्षी दलों के लिए आंदोलन, संगठन और जमीनी सक्रियता का महत्व बढ़ सकता है।
क्या तेजस्वी की राजनीति में दिख रहा है बदलाव?
राजभवन मार्च को तेजस्वी की राजनीतिक शैली में संभावित बदलाव के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है। अब तक उनकी राजनीति में चुनावी यात्राओं, सभाओं, मीडिया बयानों और सोशल मीडिया की भूमिका काफी महत्वपूर्ण रही है।
सड़क पर उतरकर कार्यकर्ताओं के साथ आंदोलन करना अलग तरह का राजनीतिक संदेश देता है। इससे पार्टी के समर्थकों और कार्यकर्ताओं में सक्रियता बढ़ाने की कोशिश भी हो सकती है।
राजद के लिए यह सिर्फ एक दिन का प्रदर्शन नहीं, बल्कि संगठन में संघर्ष की भावना मजबूत करने की परीक्षा भी है। अगर पार्टी आगे भी छात्र, रोजगार, परीक्षा और जनहित से जुड़े मुद्दों पर लगातार आंदोलन करती है, तो इसका असर राजनीतिक रूप से अधिक व्यापक हो सकता है।
आगे की राजनीति पर क्या पड़ेगा असर?
तेजस्वी यादव के इस मार्च का वास्तविक राजनीतिक असर आने वाले दिनों में दिखाई देगा। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि राजद ने सड़क की राजनीति में अपनी मौजूदगी को फिर प्रमुखता से सामने रखा है।
सरकार के सामने भी प्रदर्शनकारियों की मांगों पर जवाब देने और परीक्षा व्यवस्था से जुड़े सवालों को स्पष्ट करने की चुनौती है। दूसरी ओर राजद के सामने आंदोलन को केवल एक दिन के प्रदर्शन तक सीमित न रखने की चुनौती होगी।
बिहार की राजनीति में युवा मतदाता, रोजगार, शिक्षा और पारदर्शी भर्ती जैसे मुद्दे आने वाले समय में और महत्वपूर्ण हो सकते हैं। ऐसे में तेजस्वी का पांच साल बाद सड़क पर उतरना महज एक मार्च नहीं, बल्कि बदलते राजनीतिक माहौल में राजद की रणनीति का संकेत भी माना जा सकता है।
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