भिखारी ठाकुर के प्रपौत्र सुशील ठाकुर बर्खास्त, जानें क्या है वजह

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पटना में Sushil Thakur dismissed मामला सामने आने के बाद बिहार की लोक-संस्कृति से जुड़े लोगों के बीच चर्चा तेज हो गई है। Sushil Thakur dismissed मामले में राजभवन ने आशुलिपिक पद पर कार्यरत सुशील कुमार ठाकुर की सेवा समाप्त कर दी है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, कार्रवाई का मुख्य आधार दक्षता परीक्षा में शामिल नहीं होना और विभागीय निर्देशों का पालन नहीं करना बताया गया है। सुशील ठाकुर महान भोजपुरी लोक कलाकार और नाटककार भिखारी ठाकुर के प्रपौत्र हैं। उनकी नियुक्ति वर्ष 2026 की शुरुआत में राजभवन में स्टेनोग्राफर के पद पर परिवीक्षा अवधि में हुई थी।

राजभवन की कार्रवाई के बाद सुशील ठाकुर ने परीक्षा को लेकर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि नियुक्ति के समय ऐसी परीक्षा की शर्त लागू नहीं थी और बाद में नई व्यवस्था उनके ऊपर लागू की गई।

दक्षता परीक्षा में शामिल नहीं होने पर कार्रवाई

मामले के अनुसार, कर्मचारियों के कौशल मूल्यांकन के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया गया था। समिति के निर्देश पर 22 जुलाई 2026 को दक्षता परीक्षा आयोजित की गई।

सुशील ठाकुर इस परीक्षा में शामिल नहीं हुए। उन्होंने परीक्षा में शामिल होने से इनकार करते हुए तर्क दिया कि ऐसी परीक्षा नियुक्ति से पहले होनी चाहिए थी।

इसके बाद राजभवन प्रशासन ने उन्हें एक और अवसर दिया। 6 अगस्त 2026 को उन्हें परीक्षा में शामिल होने का अंतिम मौका दिया गया, लेकिन उपलब्ध जानकारी के अनुसार वह इस बार भी परीक्षा में उपस्थित नहीं हुए।

राजभवन प्रशासन ने लगातार अनुपस्थिति को विभागीय निर्देशों की अवहेलना और अनुशासनहीनता माना। इसके बाद सक्षम प्राधिकार ने उनकी सेवा समाप्त करने का निर्णय लिया।

राजभवन के आदेश में किन नियमों का हवाला?

सेवा समाप्ति से जुड़े आदेश में बिहार सरकारी सेवक परिवीक्षा अवधि नियम-2024 का उल्लेख किया गया है।

आदेश के अनुसार, परिवीक्षा अवधि में नियुक्त कर्मचारी के कामकाज या आचरण को संतोषजनक नहीं पाए जाने अथवा विभागीय निर्देशों का उल्लंघन होने की स्थिति में सेवा समाप्त की जा सकती है।

इस मामले में राजभवन प्रशासन ने दक्षता परीक्षा में शामिल नहीं होने और दिए गए अवसर के बावजूद अनुपस्थित रहने को कार्रवाई का आधार माना।

आदेश में सर्वोच्च न्यायालय के पुराने फैसले ‘पुरुषोत्तम लाल ढींगरा बनाम भारत संघ’ का भी संदर्भ दिया गया है। इसी कानूनी आधार को सेवा समाप्ति के आदेश में शामिल किया गया है।

सुशील ठाकुर ने उठाए परीक्षा पर सवाल

दूसरी ओर, सुशील कुमार ठाकुर ने राजभवन की कार्रवाई पर नाराजगी जताई है। उनका पक्ष है कि जब उन्हें नियुक्त किया गया था, उस समय ऐसी दक्षता परीक्षा की शर्त लागू नहीं थी।

उनका कहना है कि नियुक्ति के बाद नई शर्त लागू करना उचित नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि और भिखारी ठाकुर की विरासत को देखते हुए उन्हें नौकरी देकर आत्मनिर्भर बनने का अवसर दिया गया था।

इस कार्रवाई के बाद उन्होंने आर्थिक स्थिति को लेकर भी चिंता जताई है। हालांकि, राजभवन प्रशासन ने अपने निर्णय में प्रशासनिक नियमों और परिवीक्षा अवधि से जुड़े प्रावधानों को आधार बनाया है।

कैसे हुई थी राजभवन में नियुक्ति?

सुशील ठाकुर की राजभवन में नियुक्ति भी अपने आप में खास रही थी। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, तत्कालीन राज्यपाल डॉ. आरिफ मोहम्मद खान ने भिखारी ठाकुर की जन्मस्थली कुतुबपुर दियारा का दौरा किया था।

18 दिसंबर 2025 को गांव पहुंचने के दौरान उन्होंने भिखारी ठाकुर के परिवार के सदस्यों से मुलाकात की थी। इसी दौरान परिवार को आर्थिक सहारा देने और महान लोक कलाकार की विरासत के सम्मान के उद्देश्य से सुशील कुमार ठाकुर को नौकरी देने की घोषणा की गई थी।

इसके बाद 23 जनवरी 2026 को सुशील ठाकुर की राजभवन में आशुलिपिक यानी स्टेनोग्राफर के पद पर परिवीक्षा आधार पर नियुक्ति का आदेश जारी हुआ।

नियुक्ति के समय इस फैसले की लोक कलाकारों, साहित्य प्रेमियों और भिखारी ठाकुर से जुड़ी संस्थाओं ने सराहना की थी।

कौन थे भिखारी ठाकुर?

भिखारी ठाकुर भोजपुरी भाषा और लोक रंगमंच के सबसे चर्चित नामों में शामिल रहे हैं। उन्हें अक्सर भोजपुरी का ‘शेक्सपियर’ भी कहा जाता है।

उनका जन्म 1887 में हुआ और 1971 में उनका निधन हुआ। उन्होंने अपने नाटकों और रचनाओं के जरिए समाज में मौजूद कई कुरीतियों और सामाजिक समस्याओं को सामने रखा।

उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘बिदेसिया’, ‘गबरघिचोर’, ‘बेटी बेचवा’ और ‘विधवा विलाप’ शामिल हैं। उनके लोकनाटकों ने भोजपुरी समाज की सामाजिक परिस्थितियों को व्यापक स्तर पर आवाज दी।

उनकी रचनाओं का प्रभाव भोजपुरी लोक संस्कृति से आगे भी देखने को मिलता है। यही वजह है कि उनके परिवार से जुड़ी नियुक्ति को सांस्कृतिक विरासत के सम्मान से जोड़कर देखा गया था।

पढ़ाई और परिवार से जुड़ी जानकारी

सुशील कुमार ठाकुर ने जेपी विश्वविद्यालय, छपरा से हिंदी साहित्य में एमए की पढ़ाई पूरी की है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उन्हें कंप्यूटर टाइपिंग का भी अनुभव है।

वह भिखारी ठाकुर परिवार की चौथी पीढ़ी से जुड़े हैं। परिवार की ओर से भिखारी ठाकुर के योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान दिलाने की मांग भी समय-समय पर उठती रही है।

नौकरी मिलने के बाद परिवार और स्थानीय स्तर पर इसे आर्थिक आत्मनिर्भरता से जोड़कर देखा गया था। अब सेवा समाप्त होने के बाद यह मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है।

अब आगे क्या?

सुशील ठाकुर की सेवा समाप्ति के बाद मुख्य विवाद दक्षता परीक्षा की अनिवार्यता और परिवीक्षा अवधि में सेवा समाप्ति के नियमों को लेकर है।

राजभवन प्रशासन ने जहां अपने निर्णय के लिए विभागीय नियम और न्यायिक संदर्भों का आधार बताया है, वहीं सुशील ठाकुर परीक्षा की प्रक्रिया और नियुक्ति के समय लागू शर्तों पर सवाल उठा रहे हैं।

ऐसे में आगे इस मामले में कोई प्रशासनिक या कानूनी कदम उठाया जाता है या नहीं, इस पर नजर रहेगी। फिलहाल उपलब्ध तथ्यों के आधार पर इतना स्पष्ट है कि राजभवन ने दक्षता परीक्षा में दो बार अनुपस्थिति और विभागीय निर्देशों के पालन न करने को सेवा समाप्ति का आधार माना है।

यह मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि इसमें बिहार की भोजपुरी लोक-संस्कृति के महान कलाकार भिखारी ठाकुर की विरासत और उनके परिवार से जुड़ी नियुक्ति शामिल है।


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