ठुमरी की रानी सिद्धेश्वरी देवी, जिन्हें सुनने मंच पर आए थे सहगल

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बनारस की संगीत परंपरा से निकली सिद्धेश्वरी देवी ने अपनी आवाज से ठुमरी को नई पहचान दिलाई। सिद्धेश्वरी देवी की गायकी में प्रेम, विरह, भक्ति और दर्द की ऐसी गहराई थी कि श्रोता गीत के भावों से खुद को जुड़ा महसूस करते थे। इसी भावप्रधान शैली के कारण उन्हें संगीत जगत में ‘ठुमरी की रानी’ के नाम से जाना गया।

उनकी कला को देश के बड़े संगीतकारों और कलाकारों ने सम्मान दिया। उनके जीवन से जुड़ा एक चर्चित प्रसंग यह भी है कि 1930 में लाहौर में प्रस्तुति के दौरान मशहूर गायक केएल सहगल ने खुद मंच पर आकर दर्शकों से उनकी गायकी सुनने की अपील की थी।

संगीत के माहौल में हुआ सिद्धेश्वरी देवी का बचपन

सिद्धेश्वरी देवी का जन्म 8 अगस्त 1908 को वाराणसी में हुआ था। उनका परिवार संगीत से जुड़ा था। उनकी दादी मैना देवी अपने समय की प्रसिद्ध गायिका मानी जाती थीं।

कम उम्र में ही माता-पिता के निधन के बाद उनका पालन-पोषण उनकी मौसी राजेश्वरी देवी ने किया। राजेश्वरी देवी भी संगीत की अच्छी जानकार थीं और घर में संगीत का माहौल बना रहता था।

शुरुआत में सिद्धेश्वरी देवी का संगीत सीखने का कोई औपचारिक कार्यक्रम नहीं था। वह घर के सामान्य कामों में हाथ बंटाती थीं, जबकि उनकी मौसेरी बहन संगीत सीखती थीं।

एक कठिन धुन ने बदल दी जिंदगी

सिद्धेश्वरी देवी के संगीत जीवन की शुरुआत से जुड़ा एक रोचक प्रसंग काफी चर्चित है। बताया जाता है कि एक दिन उनकी मौसेरी बहन अपने गुरु पंडित सियाजी महाराज के सामने एक कठिन धुन ठीक से नहीं गा पाईं।

गुरु के नाराज होने के बीच सिद्धेश्वरी ने वही धुन खुद गाकर सुना दी। उनकी आवाज और पकड़ ने वहां मौजूद लोगों को चौंका दिया।

इस प्रतिभा को पहचानते हुए पंडित सियाजी महाराज ने उन्हें संगीत की शिक्षा देने का निर्णय लिया। यही घटना आगे चलकर भारतीय शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय की शुरुआत बनी।

बड़े गुरुओं से सीखी संगीत की बारीकियां

सिद्धेश्वरी देवी ने शुरुआती संगीत प्रशिक्षण सारंगी वादक पंडित सियाजी महाराज से लिया। इसके बाद उन्होंने उस्ताद राजब अली खान और उस्ताद इनायत खान जैसे दिग्गज कलाकारों से भी संगीत की बारीकियां सीखीं।

हालांकि, वह पंडित बड़े रामदास को अपना मुख्य गुरु मानती थीं। अलग-अलग गुरुओं से मिले प्रशिक्षण ने उनकी गायकी को और समृद्ध बनाया।

उनकी आवाज में बनारस घराने की मिठास के साथ भावों की गहरी अभिव्यक्ति दिखाई देती थी। यही उनकी गायकी की सबसे बड़ी खासियत बनी।

ठुमरी से मिली ‘ठुमरी की रानी’ की पहचान

सिद्धेश्वरी देवी की सबसे बड़ी पहचान ठुमरी गायिका के तौर पर बनी। ठुमरी में केवल सुर और ताल महत्वपूर्ण नहीं होते, बल्कि शब्दों के पीछे छिपे भावों को आवाज देना भी उतना ही जरूरी माना जाता है।

सिद्धेश्वरी देवी प्रेम, विरह, भक्ति और मानवीय भावनाओं को अपनी गायकी में बेहद सहजता से पिरोती थीं। उनकी प्रस्तुति में शब्द केवल गाए नहीं जाते थे, बल्कि महसूस होते थे।

ठुमरी के अलावा वह ख्याल, दादरा, कजरी, चैती, होरी और भजन भी गाती थीं। इन सभी शैलियों में उनकी भावपूर्ण गायकी ने अलग पहचान बनाई।

जब केएल सहगल ने खुद की थी अपील

सिद्धेश्वरी देवी के करियर से जुड़ा सबसे चर्चित किस्सा 1930 के लाहौर कार्यक्रम से जुड़ा है। बताया जाता है कि वहां दर्शक मुख्य रूप से मशहूर गायक केएल सहगल को सुनने पहुंचे थे।

जब एक युवा गायिका के रूप में सिद्धेश्वरी देवी का नाम मंच से घोषित हुआ, तब कुछ दर्शक उन्हें सुनने को लेकर उत्साहित नहीं थे। इसी दौरान बताया जाता है कि सहगल स्वयं मंच पर आए।

उन्होंने दर्शकों से सिद्धेश्वरी देवी की गायकी सुनने की अपील की। इसके बाद माहौल शांत हुआ और लोगों ने उनका कार्यक्रम सुना।

कहा जाता है कि सिद्धेश्वरी देवी की आवाज ने दर्शकों को प्रभावित किया और यह प्रस्तुति उनकी बढ़ती लोकप्रियता का एक यादगार पड़ाव बन गई। यह प्रसंग उनके जीवन पर लिखे कई लेखों में मिलता है।

राजदरबारों से रेडियो तक पहुंची आवाज

सिद्धेश्वरी देवी की प्रसिद्धि धीरे-धीरे पूरे देश में फैल गई। उन्होंने राजाओं के दरबारों से लेकर बड़े संगीत समारोहों तक अपनी कला का प्रदर्शन किया।

उनकी गायकी का प्रसार रेडियो और बाद में दूरदर्शन के माध्यम से भी हुआ। ऑल इंडिया रेडियो से उनका जुड़ाव रहा और उनकी आवाज देश के अलग-अलग हिस्सों के श्रोताओं तक पहुंची।

उनकी प्रस्तुतियों को लेकर संगीत प्रेमियों में खास उत्साह रहता था। कई बार श्रोता देर रात तक बैठकर उनकी गायकी सुनते थे।

एमएस सुब्बुलक्ष्मी ने भी सीखी उनसे भजन गायकी

सिद्धेश्वरी देवी का प्रभाव केवल बनारस या उत्तर भारत तक सीमित नहीं रहा। महान कर्नाटक गायिका एमएस सुब्बुलक्ष्मी ने भी उनसे भजन गायकी की बारीकियां सीखीं थीं।

यह उनके संगीत ज्ञान और प्रभाव का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है। सिद्धेश्वरी देवी ने अपनी गायकी के जरिए अलग-अलग संगीत परंपराओं के कलाकारों के बीच संवाद का रास्ता भी मजबूत किया।

उनकी शैली में शास्त्रीय अनुशासन और लोक भावनाओं का सुंदर मेल दिखाई देता था।

पद्मश्री समेत कई बड़े सम्मान

संगीत के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने 1966 में सिद्धेश्वरी देवी को पद्मश्री से सम्मानित किया। इसी वर्ष उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार भी मिला।

इसके अलावा उन्हें रविंद्र भारती विश्वविद्यालय से मानद डी.लिट की उपाधि और विश्व भारती विश्वविद्यालय से ‘देशिकोत्तम’ सम्मान भी प्रदान किया गया।

इन सम्मानों ने उनके संगीत योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित किया। हालांकि, उनकी सबसे बड़ी पहचान आज भी उनकी भावपूर्ण ठुमरी गायकी से जुड़ी है।

आखिरी दौर में कमजोर हुआ स्वास्थ्य

जीवन के अंतिम वर्षों में सिद्धेश्वरी देवी का स्वास्थ्य कमजोर होने लगा था। वर्ष 1976 में उन्हें लकवा हुआ, जिसके बाद उनकी चलने-फिरने की क्षमता प्रभावित हुई।

इसके करीब एक साल बाद 18 मार्च 1977 को नई दिल्ली में उनका निधन हो गया। वह अपने पीछे ऐसी संगीत विरासत छोड़ गईं, जिसमें बनारस की सांगीतिक परंपरा, ठुमरी की मिठास और मानवीय भावनाओं की गहरी अभिव्यक्ति शामिल थी।

आज भी जब भारतीय ठुमरी की महान गायिकाओं की चर्चा होती है, सिद्धेश्वरी देवी का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। उनकी आवाज ने यह साबित किया कि संगीत केवल सुरों का मेल नहीं, बल्कि भावनाओं को सीधे श्रोता के दिल तक पहुंचाने की कला भी है।

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