मुंबई में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में संजय राउत ने कहा कि महिला आरक्षण और महिला सशक्तिकरण को लेकर किसी को भी राजनीति नहीं करनी चाहिए। उन्होंने दावा किया कि फडणवीस ने पहले संसद में महिला आरक्षण कानून पारित होने का समर्थन किया था।
राउत ने आरोप लगाया कि एक ओर सरकार महिला आरक्षण की बात करती है, वहीं दूसरी ओर परिसीमन से जुड़े प्रावधानों को इसके साथ जोड़कर नया राजनीतिक विवाद खड़ा किया जा रहा है।
2023 में पारित कानून का मुद्दा फिर क्यों उठा?
संजय राउत ने कहा कि महिला आरक्षण से संबंधित कानून संसद में वर्ष 2023 में पारित हो चुका है। उनके मुताबिक विपक्ष की मांग इस कानून का विरोध करना नहीं, बल्कि उसे प्रभावी तरीके से लागू करना है।
राउत ने सवाल उठाया कि अगर कानून पहले ही संसद से पारित हो चुका है तो उसे दोबारा लाने की जरूरत क्यों महसूस की जा रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि महिला आरक्षण के मुद्दे पर बीजेपी और केंद्र सरकार राजनीतिक दिखावा कर रहे हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि महिला आरक्षण को परिसीमन के साथ जोड़ने का फैसला संविधान और संसदीय प्रक्रिया के संदर्भ में सवाल खड़े करता है। राउत ने पूछा कि एक ही कानून को दोबारा किस रूप में और किस उद्देश्य से लाया जा सकता है।
हालांकि, ये सभी दावे संजय राउत के राजनीतिक बयान का हिस्सा हैं। महिला आरक्षण कानून के प्रावधानों और उसके क्रियान्वयन को लेकर राजनीतिक दलों के बीच अलग-अलग मत रहे हैं।
फडणवीस ने राहुल गांधी पर क्या कहा था?
दरअसल, यह विवाद मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के राहुल गांधी पर किए गए हमले के बाद और तेज हुआ। फडणवीस ने रविवार को आरोप लगाया था कि राहुल गांधी मंच से महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं, लेकिन महत्वपूर्ण विधेयकों के समर्थन की बारी आने पर उनका रुख अलग हो जाता है।
फडणवीस ने महिला आरक्षण कानून को महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। उन्होंने दावा किया कि राहुल गांधी ने इस कानून का विरोध किया और मतदान के दौरान भी इसके खिलाफ रुख अपनाया।
मुख्यमंत्री ने राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए हिंदी की एक चर्चित कहावत का इस्तेमाल किया। उनका इशारा यह बताने की ओर था कि राहुल गांधी के कथित बयानों और राजनीतिक व्यवहार में अंतर दिखाई देता है।
फडणवीस के इसी बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए राउत ने कहा कि मुख्यमंत्री को पहले महिला आरक्षण कानून के इतिहास और उसके मौजूदा प्रावधानों को समझना चाहिए।
परिसीमन और महिला आरक्षण पर क्यों बढ़ी बहस?
महिला आरक्षण कानून को परिसीमन से जोड़ने का मुद्दा इस पूरे विवाद के केंद्र में है। संसद से पारित महिला आरक्षण कानून में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने का प्रावधान है। इसके लागू होने की प्रक्रिया को लेकर परिसीमन और संबंधित संवैधानिक प्रावधान महत्वपूर्ण हैं।
यही वजह है कि राजनीतिक दल इस मुद्दे को लेकर अलग-अलग दावे कर रहे हैं। एक पक्ष इसे महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने की दिशा में बड़ा कदम बताता है, जबकि विपक्ष कार्यान्वयन की प्रक्रिया और समयसीमा को लेकर सवाल उठाता रहा है।
संजय राउत ने अपने बयान में यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि उनकी आपत्ति महिला आरक्षण की अवधारणा से नहीं, बल्कि इसके क्रियान्वयन और परिसीमन से जुड़े राजनीतिक फैसलों से है।
महाराष्ट्र में सामने आया यह विवाद आने वाले दिनों में और गरमा सकता है। एक तरफ बीजेपी महिला आरक्षण को अपने प्रमुख राजनीतिक कदमों में गिनाती है, वहीं विपक्ष कानून को जमीन पर लागू करने और उसकी प्रक्रिया को लेकर सरकार से जवाब मांग रहा है।
इस पूरे विवाद के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि महिला आरक्षण कानून को लागू करने की दिशा में अगला ठोस कदम क्या होगा और इसका वास्तविक असर आगामी चुनावों में महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर कब दिखाई देगा।
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