राहुल गांधी ने मोदी सरकार पर दोहरी आर्थिक व्यवस्था का आरोप लगाया, NCLT को लेकर भी साधा निशाना
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नई दिल्ली: कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने गुरुवार को केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि देश में दो अलग-अलग आर्थिक व्यवस्थाएं बन गई हैं। राहुल गांधी के मुताबिक, एक व्यवस्था कुछ चुनिंदा अरबपतियों के लिए है, जबकि दूसरी आम लोगों, किसानों, नौकरीपेशा वर्ग और गरीब छात्रों के लिए है।
राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक मीडिया रिपोर्ट का हवाला देते हुए राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण यानी NCLT की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि कर्ज नहीं चुका पाने पर आम लोगों पर सख्ती होती है, जबकि कुछ प्रभावशाली कारोबारियों को बैंकों से अलग तरह का व्यवहार मिलता है।
किसानों और नौकरीपेशा लोगों को लेकर राहुल गांधी का दावा
राहुल गांधी ने अपने पोस्ट में किसानों और वेतनभोगी लोगों की आर्थिक परेशानियों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि यदि कोई किसान 50 हजार रुपये का कर्ज नहीं चुका पाता है तो उसकी जमीन नीलाम होने की स्थिति आ सकती है।
इसी तरह उन्होंने दावा किया कि नौकरीपेशा व्यक्ति की एक EMI छूटने पर बैंक की ओर से दबाव बढ़ जाता है। राहुल गांधी ने गरीब छात्रों की शिक्षा के लिए कर्ज मिलने में आने वाली कथित परेशानियों का भी मुद्दा उठाया।
उन्होंने आरोप लगाया कि दूसरी ओर कुछ चुनिंदा कारोबारी समूहों के लिए बैंक से मिलने वाला पैसा निजी संपत्ति की तरह इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि, ये आरोप कांग्रेस नेता की ओर से लगाए गए हैं और इनके समर्थन में उन्होंने जिस मीडिया रिपोर्ट का हवाला दिया, उसकी स्वतंत्र पुष्टि की जानकारी सामने नहीं है।
राहुल गांधी ने इसी संदर्भ में NCLT को लेकर तीखी टिप्पणी की और उसे “Leader-Company Loot Tribunal” कहकर निशाना बनाया।
सुभाष चंद्रा ने insolvency मामले पर दी सफाई
इसी बीच Essel Group के चेयरमैन सुभाष चंद्रा ने NCLT में चल रही अपनी व्यक्तिगत दिवालियापन प्रक्रिया से जुड़ी रिपोर्टों पर सफाई दी है। उन्होंने कहा कि उनके मामले को लेकर कुछ रिपोर्टों में दावों की वास्तविक स्थिति को सही तरीके से पेश नहीं किया गया।
चंद्रा के कार्यालय की ओर से जारी बयान में कहा गया कि वह संबंधित कंपनियों के ऋण के व्यक्तिगत उधारकर्ता नहीं थे, बल्कि कुछ मामलों में Personal Guarantor की भूमिका में थे।
उन्होंने बताया कि insolvency proceedings में कुल करीब 22,006 करोड़ रुपये के दावे दाखिल किए गए थे। इनमें से लगभग 21,696 करोड़ रुपये के दावे स्वीकार किए गए। हालांकि, उनके अनुसार जिन ऋणदाताओं ने repayment plan पर आपत्ति जताई, उनके दावों की राशि करीब 3,992 करोड़ रुपये थी।
सुभाष चंद्रा ने बताया कि इस रकम में से 620 करोड़ रुपये का निपटारा हो चुका है। उनके मुताबिक, इसके बाद संबंधित राशि करीब 3,372 करोड़ रुपये रह जाती है।
NCLT मामले में क्या है पूरा विवाद?
सुभाष चंद्रा के अनुसार, उनके खिलाफ चल रही प्रक्रिया उन कंपनियों से जुड़े ऋणों के लिए दी गई व्यक्तिगत गारंटी से संबंधित है, जो कभी Essel Group से जुड़ी थीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि ये ऐसे कर्ज नहीं थे, जिन्हें उन्होंने व्यक्तिगत रूप से उधार लिया था।
उनके बयान के मुताबिक, अधिकांश व्यक्तिगत गारंटी 24 जनवरी 2019 के बाद दी गई थीं। उस समय समूह से जुड़ी कंपनियों ने कथित तौर पर उन्हें भरोसा दिलाया था कि वे संबंधित ऋणों का भुगतान कर देंगी।
यह मामला NCLT में लंबे समय से चल रहा है। हालिया प्रक्रिया में न्यायाधिकरण के दो सदस्यों के बीच मतभेद सामने आने के बाद मामले को Third Member के पास भेजा गया था।
Third Member ने माना कि repayment plan को Insolvency and Bankruptcy Code की धारा 114 के तहत मंजूरी देने की आवश्यक शर्तें पूरी होती हैं। साथ ही, ऋणदाताओं की आपत्तियों को योजना खारिज करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं माना गया।
सुभाष चंद्रा ने मीडिया रिपोर्टों में उनके मामले को लेकर कथित गलत जानकारी पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने मीडिया संस्थानों से मामले के तथ्यों को सही तरीके से प्रकाशित करने और अदालत के आदेश की गलत व्याख्या से पैदा हुई जानकारी को हटाने की अपील की।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच राहुल गांधी की NCLT को लेकर टिप्पणी और सुभाष चंद्रा की सफाई ने एक बार फिर कर्ज, बैंकिंग व्यवस्था और कॉरपोरेट insolvency प्रक्रिया को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
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