SC-ST आरक्षण पर NDA में आर-पार, चिराग को संतोष मांझी का करारा जवाब
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👉 WhatsApp से जुड़ेंबिहार की राजनीति में SC-ST आरक्षण को लेकर NDA के भीतर विवाद और तेज हो गया है। SC-ST आरक्षण में सब-कोटा और क्रीमी लेयर के मुद्दे पर लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) के बीच तीखी बयानबाजी शुरू हो गई है। चिराग पासवान ने केंद्रीय मंत्री जीतनराम मांझी और उनके बेटे संतोष सुमन से इस्तीफा देने की मांग की थी। अब संतोष सुमन ने पलटवार करते हुए कहा है कि अगर इस्तीफे की बात हो रही है तो शुरुआत चिराग पासवान को खुद से करनी चाहिए।
संतोष सुमन ने चिराग पासवान को अपना छोटा भाई बताते हुए कहा कि उनकी पार्टी बड़ी है और उनके पास अधिक संख्याबल है। ऐसे में अगर चिराग पहले इस्तीफा देते हैं तो वह भी उनके साथ इस्तीफा देने के लिए तैयार हैं।
संतोष मांझी ने चिराग को क्या जवाब दिया?
संतोष कुमार सुमन ने शनिवार को सोशल मीडिया पर एक लंबा पोस्ट जारी कर चिराग पासवान के बयान पर जवाब दिया। उन्होंने कहा कि अगर इस्तीफे का सवाल उठाया जा रहा है तो वह इसके लिए तैयार हैं।
उनका तर्क था कि चिराग पासवान की पार्टी के पास उनसे अधिक राजनीतिक संख्याबल है और उनका राजनीतिक परिवार भी तीसरी पीढ़ी तक पहुंच चुका है। इसलिए उन्होंने चिराग को पहले इस्तीफा देने की चुनौती दी।
संतोष ने कहा कि यदि चिराग अपना पद छोड़ते हैं तो वह भी उनके साथ इस्तीफा देने को तैयार हैं। इस बयान के बाद NDA के भीतर चल रही आरक्षण की बहस और अधिक राजनीतिक हो गई है।
क्रीमी लेयर और सब-कोटा को लेकर क्या बोले संतोष?
संतोष सुमन ने अपने पोस्ट में स्पष्ट किया कि उनकी बात को चिराग पासवान ने सही तरीके से नहीं समझा। उनका कहना है कि उन्होंने SC/ST आरक्षण खत्म करने या क्रीमी लेयर के आधार पर लोगों को आरक्षण से बाहर करने की मांग नहीं की है।
उनके मुताबिक, क्रीमी लेयर और सब-कोटा यानी “कोटे के अंदर कोटा” दो अलग-अलग अवधारणाएं हैं। संतोष ने कहा कि दोनों मुद्दों को एक साथ जोड़कर देखने से लोगों के बीच भ्रम पैदा हो सकता है।
उनका जोर SC/ST वर्ग के भीतर उप-वर्गीकरण पर है। उनका तर्क है कि आरक्षण का लाभ उन समुदायों तक भी पहुंचे जो लंबे समय से सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक रूप से पीछे हैं।
मुसहर, भुइयां और अन्य समुदायों का दिया उदाहरण
संतोष सुमन ने अपने तर्क के समर्थन में मुसहर, भुइयां, हलखोर, नट और डोम जैसे समुदायों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इन समुदायों के कई लोग आज भी सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।
उन्होंने दावा किया कि कुछ समुदायों को अपने ही व्यापक सामाजिक वर्ग के भीतर भेदभाव और छुआछूत जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
संतोष का कहना है कि दलित आरक्षण खत्म करना उनका उद्देश्य नहीं है। वह चाहते हैं कि जिन जातियों को आरक्षण का लाभ अपेक्षाकृत कम मिला है, उनके लिए भी व्यवस्था में हिस्सेदारी सुनिश्चित करने पर चर्चा हो।
उन्होंने इस विषय पर डर या भ्रम के बजाय तथ्यों और संवाद के आधार पर बहस करने की अपील की।
चिराग पासवान ने क्यों मांगा था इस्तीफा?
इससे पहले LJP (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान ने आरक्षण में क्रीमी लेयर और सब-कोटा की चर्चा को लेकर जीतनराम मांझी और संतोष सुमन के रुख पर सवाल उठाए थे।
चिराग ने पटना में मीडिया से बातचीत के दौरान कहा था कि जो लोग दलित आरक्षण में इस तरह के बदलाव की बात कर रहे हैं, उन्हें मंत्री पद से इस्तीफा देना चाहिए।
उन्होंने अपनी पार्टी को SC/ST आरक्षण के सब-कैटगराइजेशन के खिलाफ बताया। चिराग का तर्क है कि ऐसी व्यवस्था आरक्षण को कमजोर कर सकती है और भविष्य में इसके दायरे पर असर पड़ सकता है।
यही बयान अब NDA के दोनों सहयोगी दलों के बीच राजनीतिक टकराव का मुख्य कारण बन गया है।
जीतनराम मांझी भी चिराग पर बरसे
संतोष सुमन के बाद उनके पिता और HAM (S) प्रमुख जीतनराम मांझी ने भी चिराग पासवान पर पलटवार किया।
मांझी ने कहा कि उनकी पार्टी आरक्षण खत्म करने या उसे कमजोर करने की बात नहीं कर रही है। उन्होंने संकेत दिया कि चिराग ने संतोष के बयान को सही संदर्भ में नहीं समझा।
इस्तीफे की मांग पर मांझी ने भी चिराग को जवाब देते हुए कहा कि अगर चिराग मंत्री पद से इस्तीफा देने की बात कर रहे हैं, तो पहले उन्हें खुद इस्तीफा देना चाहिए।
इस तरह अब दोनों पक्षों की ओर से इस्तीफे की मांग और उसके जवाब में इस्तीफे की चुनौती सामने आ चुकी है।
NDA में आरक्षण पर क्यों बढ़ा विवाद?
यह पूरा विवाद SC/ST वर्ग के भीतर उप-वर्गीकरण को लेकर अलग-अलग राजनीतिक दृष्टिकोण से जुड़ा है।
एक तरफ HAM (S) का तर्क है कि SC/ST वर्ग के भीतर भी सामाजिक और आर्थिक असमानता है। इसलिए सबसे पिछड़े समुदायों तक आरक्षण का लाभ पहुंचाने के लिए उप-वर्गीकरण पर विचार होना चाहिए।
दूसरी तरफ LJP (रामविलास) इस विचार का विरोध कर रही है। पार्टी का मानना है कि सब-कैटगराइजेशन आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था को कमजोर कर सकता है।
इस मतभेद ने NDA के भीतर सामाजिक न्याय और आरक्षण की नीति को लेकर एक नई राजनीतिक बहस खड़ी कर दी है।
क्या इस विवाद का असर NDA पर पड़ेगा?
फिलहाल दोनों दल NDA का हिस्सा हैं और उनके प्रमुख नेता केंद्र सरकार में मंत्री हैं। इसके बावजूद आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर उनके सार्वजनिक रुख अलग-अलग दिखाई दे रहे हैं।
बिहार की राजनीति में दलित और वंचित समुदायों का समर्थन महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में दोनों दलों की बयानबाजी का राजनीतिक महत्व भी है।
हालांकि, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि इस विवाद का गठबंधन के व्यापक समीकरणों पर क्या असर पड़ेगा। फिलहाल बहस मुख्य रूप से आरक्षण की नीति, उसके लाभ के वितरण और मंत्री पद से इस्तीफे की मांग तक केंद्रित है।
आने वाले दिनों में यदि दोनों पक्ष अपने रुख पर कायम रहते हैं, तो यह मुद्दा बिहार से लेकर दिल्ली तक NDA की राजनीति में चर्चा का बड़ा केंद्र बना रह सकता है।
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