शराबबंदी पर JDU में दो फाड़? देवेश ठाकुर ने समीक्षा की मांग की
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पटना: बिहार में शराबबंदी को लेकर एक बार फिर सियासी बहस तेज हो गई है। NCAER की रिपोर्ट सामने आने के बाद बिहार में शराबबंदी की सफलता, सामाजिक असर और आर्थिक नुकसान को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बहस शुरू हो गई है। खास बात यह है कि सत्तारूढ़ JDU के नेताओं के बयानों में भी इस मुद्दे पर अलग-अलग राय नजर आ रही है। सीतामढ़ी से JDU सांसद देवेश चंद्र ठाकुर ने कहा है कि शराब पर 100 प्रतिशत प्रतिबंध किसी भी जगह पूरी तरह सफल नहीं हो सकता। उन्होंने बिहार में शराबबंदी को करीब 70 से 75 प्रतिशत तक सफल बताते हुए इसकी समीक्षा की जरूरत जताई है। वहीं, JDU के मुख्य प्रवक्ता नीरज कुमार ने NCAER की रिपोर्ट के निष्कर्षों पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि शराबबंदी का मूल्यांकन केवल राजस्व के नुकसान से नहीं, बल्कि समाज में आए बदलावों के आधार पर भी किया जाना चाहिए।
देवेश ठाकुर ने क्यों उठाई शराबबंदी की समीक्षा की मांग?
JDU सांसद देवेश चंद्र ठाकुर ने शराबबंदी को लेकर व्यावहारिक नजरिया अपनाने की बात कही। उनका तर्क है कि दुनिया में कहीं भी शराब पर पूर्ण प्रतिबंध पूरी तरह सफल नहीं हुआ है। उनके मुताबिक बिहार में भी 100 प्रतिशत सफलता की उम्मीद करना व्यावहारिक नहीं है। हालांकि उन्होंने शराबबंदी को पूरी तरह असफल मानने से इनकार किया और इसे करीब 70 से 75 प्रतिशत तक सफल बताया। देवेश ठाकुर ने कहा कि समय-समय पर शराबबंदी की समीक्षा की जरूरत महसूस होती रही है। उनका सुझाव है कि कानून को कुछ नियंत्रण और सुधारों के साथ लागू किया जा सकता है। हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट किया कि समीक्षा का अर्थ शराब की पूरी छूट देना नहीं है। उनके बयान से यह संकेत मिलता है कि शराबबंदी की मौजूदा व्यवस्था में बदलाव या सुधार पर चर्चा की गुंजाइश हो सकती है।
JDU ने NCAER रिपोर्ट पर क्यों उठाए सवाल?
दूसरी ओर JDU के मुख्य प्रवक्ता नीरज कुमार ने NCAER की रिपोर्ट को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने रिपोर्ट के आंकड़ों को सवालों के घेरे में रखते हुए कहा कि शराबबंदी के सामाजिक प्रभावों को भी बराबर महत्व मिलना चाहिए। नीरज कुमार का दावा है कि शराबबंदी लागू करने के पीछे नीतीश कुमार का उद्देश्य समाज में सकारात्मक बदलाव लाना था। उनके अनुसार इस नीति से घरेलू हिंसा जैसे मामलों में कमी आई है। JDU प्रवक्ता ने कहा कि शराबबंदी का आकलन सिर्फ सरकार को होने वाले उत्पाद राजस्व के नुकसान से नहीं किया जा सकता। उनके मुताबिक सामाजिक बदलाव को भी इस बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
राजस्व नुकसान पर JDU का क्या तर्क है?
NCAER की रिपोर्ट में शराबबंदी के कारण राज्य के राजस्व पर पड़ने वाले असर का मुद्दा उठाया गया है। इसके जवाब में नीरज कुमार ने बिहार के मौजूदा बजट का हवाला दिया। उनका कहना है कि राज्य का बजट अब करीब 3.16 लाख करोड़ रुपये से अधिक है और शराब से मिलने वाला राजस्व कुल सरकारी आय का सीमित हिस्सा था। इसलिए JDU सामाजिक फायदे को आर्थिक नुकसान से अधिक महत्वपूर्ण मानता है। यानी सत्तारूढ़ दल की ओर से स्पष्ट संदेश है कि शराबबंदी को सिर्फ आर्थिक नजरिए से देखने के बजाय परिवार और समाज पर इसके प्रभाव को भी ध्यान में रखना चाहिए।
महिलाओं के मुद्दे को लेकर JDU का बड़ा दावा
नीरज कुमार ने शराबबंदी के समर्थन में महिलाओं के हितों को प्रमुख आधार बनाया। उन्होंने दावा किया कि शराबबंदी के बाद घरेलू हिंसा में उल्लेखनीय कमी आई है। उन्होंने यह भी कहा कि शराबबंदी बिहार की जनता का संकल्प है और इसे समाप्त करने की कोशिश का विरोध किया जाएगा। अपने बयान में उन्होंने विरोधियों के खिलाफ बेहद तीखे शब्दों का इस्तेमाल भी किया। JDU का तर्क है कि अगर शराब की बिक्री से सरकार को राजस्व मिलता भी है, तो उससे होने वाली आय की तुलना परिवारों और समाज पर पड़ने वाले प्रभावों से की जानी चाहिए।
जीतन राम मांझी की पार्टी भी समीक्षा के पक्ष में
इस बहस में जीतन राम मांझी की पार्टी की ओर से भी समीक्षा का संकेत मिला है। पार्टी नेता श्याम सुंदर शरण ने कहा कि सरकार को शराबबंदी की मौजूदा व्यवस्था को लेकर स्थिति को समझना चाहिए। उन्होंने याद दिलाया कि शराबबंदी लागू होने के बाद पहले भी इसमें कई बदलाव किए जा चुके हैं। उनके मुताबिक अब सम्राट चौधरी सरकार भी जरूरत के अनुसार समीक्षा कर सकती है और उचित कदम उठा सकती है। इस बयान से साफ है कि शराबबंदी पर सरकार के सहयोगी दलों के बीच भी नीतिगत चर्चा की गुंजाइश बनी हुई है।
कांग्रेस ने NCAER रिपोर्ट को बनाया सरकार पर हमला
विपक्षी कांग्रेस ने NCAER की रिपोर्ट को सरकार के लिए आईना बताया है। कांग्रेस प्रवक्ता असित नाथ तिवारी ने आरोप लगाया कि शराबबंदी लागू होने के बाद इसके प्रभावों पर व्यापक अध्ययन की कमी रही है। उनका कहना है कि रिपोर्ट सामने आने के बाद सरकार और सत्तारूढ़ दल इसके निष्कर्षों पर सवाल उठा रहे हैं। विपक्ष अब इस मुद्दे को सरकार की नीति की समीक्षा के सवाल से जोड़ रहा है।
अब सबसे बड़ा सवाल-शराबबंदी पर क्या होगा अगला कदम?
शराबबंदी पर मौजूदा बहस के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि सरकार आगे क्या फैसला लेती है। क्या मौजूदा कानून की व्यापक समीक्षा होगी या सरकार इसे उसी स्वरूप में जारी रखेगी?
दूसरा महत्वपूर्ण सवाल शराबबंदी के सामाजिक और आर्थिक प्रभावों को लेकर है। नीति का मूल्यांकन करते समय राजस्व, कानून-व्यवस्था, घरेलू हिंसा, महिलाओं की स्थिति और अवैध शराब जैसे सभी पहलुओं को साथ देखना होगा। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि NCAER रिपोर्ट के बाद बिहार में शराबबंदी एक बार फिर बड़े राजनीतिक मुद्दे के रूप में उभर आई है। JDU के भीतर से समीक्षा की आवाज और पार्टी नेतृत्व की ओर से शराबबंदी के बचाव ने बहस को और दिलचस्प बना दिया है। आने वाले दिनों में सरकार का रुख इस पूरे विवाद की दिशा तय कर सकता है। यदि समीक्षा होती है तो उसके स्वरूप और संभावित बदलावों पर भी राजनीतिक दलों के बीच बहस और तेज होने की संभावना है।