बिहार के 800 शिक्षकों पर गिरेगी गाज! PhD-MA के साथ फर्जी हाजिरी का खेल
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👉 WhatsApp से जुड़ेंबिहार में Bihar Teacher News के तहत सरकारी शिक्षकों से जुड़ा बड़ा मामला सामने आया है। Bihar Teacher News के मुताबिक, नौकरी के दौरान बिना विभागीय अनुमति रेगुलर कोर्स करने वाले करीब 800 शिक्षक शिक्षा विभाग के रडार पर हैं। इन शिक्षकों में PhD, MA, MSc, LLB और MEd जैसे पाठ्यक्रम करने वाले शिक्षक शामिल बताए जा रहे हैं। विभाग अब यह जांच करेगा कि रेगुलर पढ़ाई के दौरान उनकी स्कूल में मौजूदगी कैसे दर्ज होती रही।
मामला केवल उच्च शिक्षा हासिल करने तक सीमित नहीं है। विभाग को कुछ शिक्षकों की उपस्थिति को लेकर भी शिकायतें और सवाल मिले हैं। अब स्कूल की हाजिरी, विश्वविद्यालय के रिकॉर्ड और शिक्षकों की नौकरी से जुड़े दस्तावेजों का मिलान किया जा सकता है।
PhD, MA और LLB कर रहे शिक्षकों पर क्यों नजर?
जानकारी के अनुसार, करीब 800 सरकारी शिक्षक बिहार के अलावा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा और पंजाब के विभिन्न विश्वविद्यालयों से उच्च शिक्षा हासिल कर रहे हैं।
इनमें कई शिक्षक रेगुलर मोड में PhD, MA, MSc, LLB और MEd जैसे पाठ्यक्रमों में नामांकित बताए जा रहे हैं। शिक्षा विभाग की मुख्य चिंता यह है कि अगर कोई शिक्षक नियमित रूप से विश्वविद्यालय की कक्षाओं में शामिल हो रहा है, तो उसी अवधि में स्कूल में उसकी ड्यूटी कैसे पूरी हो रही थी।
विभाग इसी अंतर को रिकॉर्ड के जरिए समझने की कोशिश करेगा। जांच में यह भी देखा जाएगा कि संबंधित शिक्षक ने पढ़ाई के लिए विभाग से अनुमति या निर्धारित अवकाश लिया था या नहीं।
असली विवाद डिग्री नहीं, स्कूल की ड्यूटी है
शिक्षा विभाग का रुख यह नहीं है कि सरकारी शिक्षक अपनी योग्यता बढ़ाने के लिए आगे की पढ़ाई नहीं कर सकते। विवाद मुख्य रूप से उस स्थिति को लेकर है जब कोई शिक्षक बिना अनुमति रेगुलर कोर्स के लिए स्कूल की ड्यूटी से अनुपस्थित रहता है।
शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी के बयान के मुताबिक, शिक्षकों को अपनी शैक्षणिक योग्यता बढ़ाने की छूट है, लेकिन इसका असर स्कूल में बच्चों की पढ़ाई पर नहीं पड़ना चाहिए।
यानी विभाग यह देखना चाहता है कि शिक्षक ने पढ़ाई और सरकारी सेवा की जिम्मेदारी के बीच नियमों का पालन किया या नहीं।
‘आज मैं, कल आप’ से हाजिरी का आरोप
जांच में शिक्षकों की उपस्थिति को लेकर एक और गंभीर सवाल सामने आया है। आरोप है कि कुछ शिक्षक आपसी तालमेल से स्कूल में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते रहे।
बताया जा रहा है कि कथित तौर पर ‘आज मैं, कल आप’ जैसे तरीके से हाजिरी लगाने की व्यवस्था की जाती थी। कुछ मामलों में शिक्षक अपना मोबाइल या अन्य माध्यम किसी कर्मचारी के पास छोड़ देते थे, जिससे उनकी उपस्थिति दर्ज हो सके।
इसके बाद शिक्षक खुद रेगुलर कोर्स की कक्षाओं में शामिल होने चले जाते थे। हालांकि, ये फिलहाल आरोप हैं और इनकी पुष्टि जांच के बाद ही होगी।
अगर फर्जी हाजिरी का आरोप सही पाया जाता है तो यह मामला केवल बिना अनुमति पढ़ाई करने से अलग होकर सेवा नियमों के उल्लंघन का भी बन सकता है।
अब शिक्षा विभाग कैसे करेगा जांच?
शिक्षा विभाग रिकॉर्ड के आधार पर पूरे मामले की पड़ताल करने की तैयारी में है। जांच के दौरान कई स्तरों पर दस्तावेजों का मिलान किया जा सकता है।
संभावित जांच प्रक्रिया में ये बिंदु शामिल हो सकते हैं:
- प्रखंड स्तर से संबंधित शिक्षकों की रिपोर्ट लेना।
- विश्वविद्यालयों से एडमिशन और पाठ्यक्रम से जुड़ी जानकारी मांगना।
- रेगुलर या ओपन मोड में पढ़ाई की स्थिति की जांच करना।
- स्कूल की उपस्थिति और विश्वविद्यालय के रिकॉर्ड का मिलान करना।
- पढ़ाई के दौरान ली गई छुट्टी और विभागीय अनुमति की जांच करना।
- डिग्री हासिल करने की अवधि को शिक्षक के सेवा रिकॉर्ड से मिलाना।
इस प्रक्रिया से यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि शिक्षक वास्तव में किस अवधि में विश्वविद्यालय में पढ़ रहे थे और उसी दौरान स्कूल में उनकी उपस्थिति किस आधार पर दर्ज हुई।
बिना अनुमति रेगुलर कोर्स पर क्या हो सकता है?
नौकरी के दौरान उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए विभागीय नियमों का पालन जरूरी माना जाता है। यदि जांच में कोई शिक्षक बिना अनुमति रेगुलर कोर्स करता पाया जाता है, तो उसके खिलाफ सेवा नियमों के तहत कार्रवाई हो सकती है।
संभावित कार्रवाई में निलंबन, प्रमोशन रोकना और वेतन वृद्धि पर रोक जैसे कदम शामिल हो सकते हैं। हालांकि, किसी शिक्षक की नौकरी समाप्त होगी या नहीं, यह जांच के निष्कर्ष और लागू सेवा नियमों के आधार पर तय होगा।
इसलिए केवल जांच के दायरे में आने को कार्रवाई या नौकरी जाने के बराबर नहीं माना जा सकता।
Open University से पढ़ाई का विकल्प
शिक्षा विभाग उच्च शिक्षा हासिल करने के खिलाफ नहीं है। नौकरी के साथ पढ़ाई जारी रखने के लिए ओपन या डिस्टेंस मोड को अपेक्षाकृत व्यावहारिक विकल्प माना जाता है।
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (IGNOU) और नालंदा ओपन यूनिवर्सिटी जैसे संस्थानों के माध्यम से शिक्षक नौकरी की जिम्मेदारियों के साथ अपनी पढ़ाई जारी रख सकते हैं।
रेगुलर और ओपन मोड के बीच सबसे बड़ा अंतर उपस्थिति का है। रेगुलर कोर्स में नियमित कक्षाओं की जरूरत हो सकती है, जबकि ओपन या डिस्टेंस शिक्षा नौकरी करने वाले लोगों के लिए अधिक लचीली व्यवस्था उपलब्ध कराती है।
बच्चों की पढ़ाई पर असर सबसे अहम मुद्दा
पूरे मामले में शिक्षा विभाग के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि शिक्षकों की उच्च शिक्षा के कारण सरकारी स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो।
यदि कोई शिक्षक नियमों के तहत अनुमति लेकर पढ़ाई करता है और स्कूल की जिम्मेदारी प्रभावित नहीं होती, तो स्थिति अलग होगी। लेकिन अगर रेगुलर कोर्स के दौरान स्कूल से अनुपस्थिति और फर्जी हाजिरी की पुष्टि होती है, तो मामला गंभीर हो सकता है।
अब करीब 800 शिक्षकों के रिकॉर्ड की जांच इस विवाद की वास्तविक तस्वीर सामने ला सकती है। विश्वविद्यालयों और स्कूलों के रिकॉर्ड के मिलान के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि कितने शिक्षकों ने नियमों का पालन किया और कितने मामलों में कार्रवाई की जरूरत पड़ती है।
फिलहाल शिक्षकों के लिए सबसे अहम बात यही है कि उच्च शिक्षा के साथ सरकारी सेवा से जुड़े सभी नियमों और विभागीय अनुमति की प्रक्रिया का पालन किया जाए।
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